
लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़, (राजस्थान)।
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हमारे प्रधानमंत्री को घूमने फिरने का बहुत शौक है। उनको देश की किसी भी समस्या से कोई भी लेना देना नहीं है। जनता भूखे मरे या जान से मरे उन्हें कोई मतलब नहीं है। यह हर जगह उद्घाटन करने पहुंच जाते हैं। कोई रेल भी होगी तो उसको हरी झंडी दिखाने पहुंच जाते हैं।
अभी हाल ही में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का उद्घाटन करने गए। भीड़ इकट्ठी करने के लिए विद्यालय कालेज में अवकाश तक घोषित कर दिया। देश में ऐसा पहली बार हुआ कि प्रधानमंत्री की रैली में भीड़ इकट्ठी करने के लिए अवकाश घोषित किया गया। उत्तर प्रदेश की गाजियाबाद सरकार ने लिखित आदेश भी जारी कर दिया लेकिन अत्यधिक किरकिरी होने के कारण उस आदेश को वापस ले लिया। सही मायने में लिया या औपचारिकता वश दिखावा किया। विद्यार्थियों को कहा गया कि रैली में जाने पर 2 दिन की अटेंडेंस मिलेगी और प्रशंसा पत्र भी मिलेगा। गलगेटिया यूनिवर्सिटी के द्वारा भी एक नोटिस जारी किया गया कि यूनिवर्सिटी में 7:45 पर पहुंचना है और उसके बाद मोदी की रैली में पहुंचना आवश्यक है।
यहां तक कि स्कूल कॉलेज के विद्यार्थियों से कहा गया कि वह स्कूल यूनिफॉर्म में रैली में न जाए सादे कपड़ों में जाएं। बताया जा सके कि मोदी की रैली में कितने युवाओं की भीड़ इकट्ठी हुई।
उत्तर प्रदेश में आम चुनाव होने वाले हैं। देश में ऊर्जा संकट का कठिन समय चल रहा है। लेकिन बाहर से बसे भर भर के भीड़ को बुलाया गया। तो क्या उसमें तेल डीजल पेट्रोल खर्च नहीं हुआ। मोदी जी का हर जगह उद्घाटन करने जाना जरूरी है क्या ? उनके जाने से कितना पैसा देश का लगता है और पूरी प्रशासनिक व्यवस्था उनकी खातिरदारी में लग जाती है। उद्घाटन ऑनलाइन भी किया जा सकता था। दूसरे देशों में हर जगह देश का प्रधानमंत्री उद्घाटन करने नहीं जाता है। सरकार को जनता के बुनियादी संकट की भी चिंता नहीं होती है। देश में उद्घाटन व्यवस्था में बदलाव होना चाहिए। छोटे-छोटे मंदिर अस्पतालों के उद्घाटन के लिए विधायक सांसद पहुंच जाते हैं इस पर कितना खर्चा आता है? क्यों स्थानीय नागरिकों, शहीदों की वीरांगनाओं या स्थानीय नेता या फिर किसी आम नागरिक ने स्थानीय स्तर पर कोई उल्लेखनीय कार्य किया हो तो क्या उनके द्वारा इस औपचारिकता को पूरा नहीं किया जा सकता? इससे समय व धन दोनों की बचत होगी। (लेखिका के अपने विचार हैं)