देश कहां जा रहा है?

लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)
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सदियों से विश्व में भारत को विश्व गुरु का स्थान दिया गया है। लेकिन वर्तमान में वैश्विक स्तर पर देश की साख गिरती जा रही है। मोदी जी ने जिस हालत में देश को पहुंचा दिया है वो बड़ी शर्मनाक और निंदनीय होने के साथ साथ पूरे देश की प्रशासनिक व्यवस्था की भी पोल खोल कर रख दी है। मोदी जी फुटबॉल खेल रहे हैं, नाव पर फोटो शुट हो रहे है यानी कि सत्ता का भरपूर आनंद ले रहे हैं। चेहरे पर एक शिकन तक नहीं है। बेशर्मी की सारी हदें पार कर चुके हैं। एक ऐसा खौफनाक, दर्दनाक और शर्मनाक वाकया सामने आया है कि देश की जनता शर्मसार है। उड़ीसा के वियनाली वाली गांव में आदिवासी जीतु मुंडा नाम के आदमी की बहन कालरा मुंडा का देहावसान दो महीने पहले ही हो गया था। उसकी बहन का ओडिशा ग्रामीण बैंक में खाता था जिसमें मात्र उन्नीस हजार तीन सौ रुपए थे। जब वो खाते से पैसे निकालने गया तो अधिकारी ने खातेदार के हस्ताक्षर करवा कर लाने को कहा उसके बार-बार कहने के बावजूद की उसकी बहन की मौत हो चुकी है। अधिकारी एक रट लगा रहे थे कि खातेदार के साइन चाहिए। हार कर जीतू मूड़ा ने अपनी बहन की कब्र खोद कर उसने अपनी बहन के कंकाल को कंधे पर लादकर तीन किलोमीटर दूर चल कर बैंक गया और बोला इससे हस्ताक्षर करवा लें। आप कल्पना कर सकते हैं उस आदमी को कितनी तकलीफ हुई होगी। बैंक अधिकारियों के लिए कितनी शर्मनाक बात होगी।
दूसरा वाकया बिहार का है। एक महिला सरकारी कर्मचारी ने कार्यालय में फोन किया कि वो अस्वस्थ हैं और उसे अवकाश चाहिए सम्बन्धित अधिकारी ने कहा आप झूठ बोल रहे हैं सबूत दे कि आप बीमार है। कर्मचारी अपने हाथ में इंजेक्शन लगी हुई ड्रिप के साथ कार्यालय जाकर सबूत दिखा कर आई। अब आप सोचिए देश कहा जा रहा है। मानवता व संवेदनशीलता की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही है और प्रशासन भी मौन है। लेकिन देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की भी आदिवासी होने के बावजूद भी कोई अधिकारिक तौर पर टिप्पणी सामने नहीं आई है । प्रधानमंत्री जी ने भी मानवता को शर्मसार करने वाले इस हादसे की कोई संवेदना व्यक्त नहीं की है। (लेखिका का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)

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