4 दरवाज़ा के मौलाना ज़ियाउद्दीन शाह साहब का उर्स 9 मई से

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जयपुर। सुभाष चौक के पास चार दरवाज़ा इलाके में मौलाना ज़ियाउद्दीन शाह साहब की दरगाह स्थित है। जयपुर के महाराजा सवाई रामसिंह (द्वितीय) (1835–1880) के समय मौलाना ज़ियाउद्दीन चिश्ती दिल्ली से जयपुर आए थे। उनके पिता का नाम ख़्वाजा रफ़ीउद्दीन था और उन्हें रूहानी तालीम अपने गुरु ख़्वाजा फखरुद्दीन से मिली थी, जो मूल रूप से औरंगाबाद के रहने वाले थे लेकिन बाद में दिल्ली में बस गए थे।
जयपुर आने के बाद मौलाना ज़ियाउद्दीन ने 120 रुपये में एक बड़ी ज़मीन खरीदी, जहाँ उन्होंने अपना घर बनाया और उसके सामने ‘बागे सुबह-सादिक’ नाम का एक सुंदर बाग़ तैयार किया। इसी जगह पर उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी ग़रीब और परेशान लोगों की मदद करने और उनकी तकलीफ दूर करने में गुज़ार दी। वह अपनी ख़ानक़ाह में दिन-रात इबादत में लगे रहते थे और लोगों ने उनके कई करामात भी देखे, जिनका ज़िक्र पुराने ग्रंथों में मिलता है।
उनकी वफ़ात के बाद महाराजा सवाई रामसिंह (द्वितीय) के आदेश पर उनके सामंत नवाब फैज़ अली ने वहीं पर उनका मकबरा बनवाया। आज भी हर साल हिजरी महीने जुलक़दा की 20 से 25 तारीख़ के बीच उनका उर्स मनाया जाता है, जिसमें देशभर से करीब एक लाख ज़ायरीन आते हैं।
दरगाह का मुख्य दरवाज़ा बहुत ही खूबसूरत है, जो संगमरमर पर फूल-पत्तियों की नक्काशी से सजाया गया है। इसके दोनों तरफ 32 फीट ऊँचे दो स्तम्भ हैं, जिनका ऊपरी हिस्सा शंकु के आकार का है और ये दरवाज़े की खूबसूरती को और बढ़ाते हैं।
इस दरवाज़े से जुड़ी ऊँची दीवार पूरे दरगाह परिसर को किले की तरह चारों ओर से घेरती है। मौलाना ज़ियाउद्दीन द्वारा लगाया गया बाग़ आज भी दरगाह के अंदर प्रवेश करते ही दायीं और बायीं तरफ फूलों और पेड़-पौधों के रूप में दिखाई देता है।
अंदर जाने पर सामने एक और दरवाज़ा दिखाई देता है, जो मुख्य दरवाज़े जैसा ही है लेकिन थोड़ा छोटा है। इस दरवाज़े से अंदर जाने पर दायीं तरफ खुला बरामदा, मुख्य मज़ार, मस्जिद और वज़ू का हौज़ दिखाई देता है, जबकि बायीं तरफ कई मज़ारें हैं, जो शायद उनके परिवार वालों या उनके मानने वालों की हैं।
मुख्य मज़ार एक चौकोर प्लेटफॉर्म पर बनी है, जिसके चारों ओर बरामदा है। यह पूरी संरचना 20 काले स्तम्भों पर टिकी हुई है और चारों दिशाओं में पाँच-पाँच मेहराबदार दरवाज़े बने हुए हैं।

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