
टल अरेस्ट’ ठगी से सावधान, फर्जी नोटिस जांचने के लिए सीबीआई का ‘अभय’ पोर्टल
शैलेश माथुर की रिपोर्ट
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साभरझील। सितम्बर। साइबर अपराधों पर अंकुश लगाने और आमजन को साइबर ठगी के प्रति जागरूक करने के लिए लगातार अभियान चलाया जा रहा है। वर्तमान समय में ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर साइबर ठगी के मामले तेजी से बढ़े हैं। साइबर ठग स्वयं को सीबीआई, ईडी, कस्टम या एटीएस का अधिकारी बताकर लोगों को फर्जी वारंट, सम्मन और नोटिस भेजते हैं। इसके बाद वीडियो कॉल के जरिए पीड़ित को लगातार डराकर और निगरानी में रखकर उसकी गाढ़ी कमाई ठग लेते हैं। साइबर क्राइम के वीके सिंह ने बताया कि साइबर ठग विशेष रूप से उच्च सरकारी सेवाओं से सेवानिवृत्त व्यक्तियों, डॉक्टरों, प्रोफेसरों एवं अन्य वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बना रहे हैं। इसी गंभीर खतरे को देखते हुए नागरिकों को संदिग्ध पुलिस, न्यायालय अथवा जांच एजेंसियों के नोटिस की वास्तविकता जांचने के लिए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा ‘अभय’ पोर्टल शुरू किया गया है। यह एआई आधारित चैटबॉट है, जो संदिग्ध नोटिस और फर्जी वारंट की वास्तविकता जांचने में सहायता करता है।
साइबर क्राइम के अधिकारी बताते हैं कि साइबर ठग फोन कॉल, व्हाट्सऐप कॉल अथवा वीडियो कॉल के जरिए संपर्क करते हैं। वे खुद को एटीएस, सीबीआई, आरबीआई, एनआईए या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताते हुए कहते हैं कि पीड़ित के आधार कार्ड, बैंक खाते या सिम कार्ड का इस्तेमाल किसी अवैध गतिविधि में हआ है। पीड़ित को हवाला लेन-देन, आतंकवाद की फंडिंग, मनी लॉन्ड्रिंग अथवा किसी अन्य अपराध से जोड़कर गिरफ्तारी की धमकी दी जाती है। इसके बाद उसे सिग्नल, टेलीग्राम अथवा अन्य एप्लीकेशन डाउनलोड करने के लिए कहा जाता है और लगातार वीडियो कॉल पर रहने का दबाव बनाया जाता है। ठग वीडियो कॉल के दौरान पुलिस स्टेशन या सीबीआई कार्यालय जैसा सेटअप दिखाते हैं। कई बार पुलिस अथवा जांच एजेंसी की वर्दी पहने व्यक्ति स्क्रीन पर दिखाई देते हैं, ताकि पीड़ित को विश्वास हो जाए कि वास्तव में सरकारी एजेंसी उससे संपर्क कर रही है।
इसके बाद व्हाट्सऐप पर फर्जी गिरफ्तारी वारंट, न्यायालय के नोटिस अथवा आरबीआई के नोटिस भेजकर डराया जाता है। पीड़ित को परिवारजनों से बात करने से भी रोका जाता है और यहां तक बताया जाता है कि उसके घर के बाहर सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी तैनात हैं। डिजिटल अरेस्ट के दौरान साइबर ठग पीड़ित से उसके बचत खाते, एफडी और अन्य वित्तीय संसाधनों की जानकारी हासिल कर लेते हैं। इसके बाद उसकी पूरी जमा पूंजी को किसी अपराध से अर्जित धन बताते हुए वेरिफिकेशन के नाम पर कथित आरबीआई अधिकारी के बताए बैंक खाते में ट्रांसफर करवाते हैं। ठग यह भरोसा दिलाते हैं कि जांच पूरी होने के बाद रकम वापस कर दी जाएगी। लेकिन जैसे ही रकम उनके बताए खाते में पहुंचती है, उसे एटीएम, चेक अथवा क्रिप्टो करेंसी के माध्यम से तत्काल निकाल या दूसरे खातों में स्थानांतरित कर दिया जाता है।
डिजिटल अरेस्ट से बचने के लिए ये बातें हमेशा याद रखें
घबराएं नहीं, कॉल तुरंत काट दें: कोई भी सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से गिरफ्तारी की धमकी देकर पैसों की मांग नहीं करती। यदि कोई व्यक्ति खुद को अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर धमकाए तो घबराएं नहीं, कॉल काट दें और पुलिस से संपर्क करें। परिवार को तुरंत जानकारी दें: साइबर ठगों के दबाव में अकेले न रहें। घटना की जानकारी तत्काल परिवारजनों को दें और निकटतम पुलिस स्टेशन अथवा साइबर पुलिस स्टेशन से संपर्क करें। साइबर ठगों के कहने पर कोई अज्ञात एप्लीकेशन डाउनलोड न करें और न ही मोबाइल की स्क्रीन साझा करें। आधार नंबर, पैन कार्ड, बैंक खाता विवरण, ओटीपी, पिन, पासवर्ड या अन्य बैंकिंग जानकारी किसी अनजान व्यक्ति को न दें। यदि आपके साथ इस प्रकार की साइबर ठगी हो जाती है तो तुरंत 1930 पर कॉल करें। साथ ही निकटतम पुलिस स्टेशन/साइबर पुलिस स्टेशन अथवा साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल, साइबर हेल्पडेस्क 9256001930 /9257510100 और साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराएं।