
पुस्तक : Veda for Gen Z

लेखक: डा. परीक्षित सिंह (USA)

पुस्तक समीक्षक– डॉ. रिपुंजय सिंह
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आज की पीढ़ी सूचना के विस्फोट के बीच जी रही है। सोशल मीडिया, निरंतर तुलना, करियर की चिंता, अकेलापन और जीवन के उद्देश्य की तलाश ने आधुनिक मनुष्य को पहले से अधिक व्यस्त, लेकिन भीतर से अधिक बेचैन भी किया है। ऐसे समय में ‘Veda for Gen Z: एक रोचक और प्रासंगिक पुस्तक के रूप में सामने आती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह वेदों को अतीत की धूल से ढकी कोई धार्मिक पुस्तक मानकर नहीं चलती, बल्कि उन्हें आज के मनुष्य के जीवन, प्रश्नों और मानसिक उलझनों से जोड़कर देखने का प्रयास करती है।
पुस्तक का मूल विचार अत्यंत स्पष्ट है । वेद केवल धर्म या कर्मकांड की पुस्तक नहीं, बल्कि मनुष्य, चेतना, प्रकृति और जीवन के अर्थ को समझने की एक निरंतर खोज हैं। लेखक पाठक से अंधविश्वास या अंधस्वीकार की अपेक्षा नहीं करता। इसके विपरीत, वह प्रश्न पूछने, देखने, अनुभव करने और स्वयं सत्य को परखने के लिए प्रेरित करता है।
पुस्तक के अध्यायों के शीर्षक ही इसकी आधुनिक दृष्टि को स्पष्ट करते हैं कि प्रथम विद्रोही, एक सत्य, अनेक नाम, कोई भ्रम नहीं, ब्रह्मांड संयोग मात्र नहीं है, भीतर की अग्नि, वज्र जैसी प्रखर बुद्धि, मनोविज्ञान के जन्म से पहले, अंधकार शत्रु नहीं है,
जीवन एक यज्ञ है, थकान और तनाव के बिना अनुशासन, धर्म कोई नियम-पुस्तिका नहीं है, कर्म दंड नहीं है, एकाग्रता पवित्र है। जीवन का उद्देश्य केवल करियर नहीं है जैसे विषय प्राचीन वैदिक विचारों को समकालीन जीवन की भाषा में प्रस्तुत करते हैं।
पुस्तक का एक अत्यंत प्रभावशाली प्रसंग नचिकेता और यम का है। नचिकेता केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उसने मृत्यु के रहस्य पर प्रश्न किया, बल्कि इसलिए कि उसने आकर्षक लेकिन क्षणभंगुर वस्तुओं के बजाय उस सत्य को जानना चाहा जो स्थायी है। धन, सुख और शक्ति के प्रलोभन को अस्वीकार कर उसका प्रश्न “जो नष्ट नहीं होता, वह क्या है?” आज के उपभोक्तावादी समाज में भी उतना ही प्रासंगिक लगता है। यह प्रसंग पुस्तक के केंद्रीय संदेश को सामने लाता है कि वास्तविक ज्ञान की शुरुआत सही प्रश्न पूछने से होती है।
लेखक वेदों को ‘अपौरुषेय’ परंपरा से जोड़ते हुए यह विचार प्रस्तुत करता है कि ऋषि ज्ञान के ‘लेखक’ मात्र नहीं, बल्कि उसके द्रष्टा थे। अर्थात् सत्य का निर्माण नहीं, उसका साक्षात्कार किया गया। यह दृष्टिकोण पाठक को वेदों को किसी एक व्यक्ति या संप्रदाय की संपत्ति मानने के बजाय मानवता की एक प्राचीन ज्ञान-परंपरा के रूप में देखने का अवसर देता है।
पुस्तक की भाषा इसकी विशेष ताकत है। गंभीर दार्शनिक विषयों को बोझिल शास्त्रीय शैली में प्रस्तुत करने के बजाय लेखक उन्हें सहज, संवादात्मक और आधुनिक संदर्भों से जोड़ता है। आज जब युवाओं का ध्यान कुछ सेकंड में एक विषय से दूसरे विषय पर चला जाता है, तब ‘एकाग्रता पवित्र है ’ जैसी अवधारणा विशेष अर्थ रखती है। इसी प्रकार ‘जीवन का उद्देश्य केवल करियर नहीं है।’ यह याद दिलाता है कि जीवन का उद्देश्य केवल नौकरी, पद, आय या सामाजिक सफलता तक सीमित नहीं हो सकता।
पुस्तक का एक सुंदर संदेश यह भी है कि धर्म कोई कठोर नियम-पुस्तिका नहीं और कर्म कोई दंड व्यवस्था नहीं। वैदिक चिंतन को इस प्रकार देखने से धर्म और कर्म की अवधारणाएं अधिक व्यापक और जीवनोपयोगी बनती हैं। जीवन एक यज्ञ है और आप स्वयं उसकी आहुति हैं। जैसे अध्याय जीवन को केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों की यात्रा न मानकर एक व्यापक योगदान और सहभागिता के रूप में देखने की प्रेरणा देते हैं।
लेखक के अनुसार वैदिक ऋषि जीवन से भागने वाले लोग नहीं थे। वे जीवन को समझने, उसके रहस्यों को जानने और अस्तित्व में व्यवस्था तथा अर्थ खोजने वाले जिज्ञासु थे। इसी संदर्भ में पुस्तक में ऋषियों की हंसी का रूपक विशेष आकर्षक है। सत्य की अनुभूति के बाद उत्पन्न होने वाली वह सहज प्रसन्नता, जो किसी बाहरी उपलब्धि से नहीं बल्कि भीतर की स्पष्टता से आती है।
डॉ. परिक्षित सिंह (USA) स्वयं चिकित्सा के पेशे से जुड़े होने के साथ इंडोलॉजी और संस्कृत के गंभीर अध्येता हैं। वैदिक साहित्य, संस्कृत भाषा तथा श्री अरविंद के दर्शन पर उनके अध्ययन और लेखन ने उन्हें आधुनिक दृष्टि से भारतीय ज्ञान-परंपरा को समझने का विशिष्ट आधार दिया है। यही अंतर्विषयक दृष्टि इस पुस्तक में भी दिखाई देती है।