केरलम में राजनीति छोड़ सरकारी सेवा में जाने की होड़

लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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आजादी तुरंत बाद जो लोग राजनीति में आये , उनका प्रमुख उद्देश्य आम जन की सेवा करना तथा उनको मिली जिम्मेदारियों को निभाना था . उनका उद्देश्य धन सम्पति बनाना नहीं था . उस काल के राजनीतिज्ञों , विशेषकर मंत्रियों , से जब भी कोई खामी हुई उसकी जिम्मेदारी लेने में कभी अधिक समय नहीं लिया . एक समय देश में एक बड़ी रेल दुर्घटना हुई, उस समय लाल बहादुर शास्त्री ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से त्याग पात्र दे दिया . उस समय सदस्यों को , उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद कोई वेतन अथवा अन्य सुविधाएँ नहीं मिलती थीं . गुलजारी लाल अपने अल्पकाल के लिए तीन बार देश के प्रधान मंत्री रहे . जब उनकी सदस्यता समाप्त हुई तब दिल्ली में उनके पास रहने का कोई ठिकाना नहीं था . वे एक कमरे में किरायेदार के रूप रहते थे .उनके पास किराया देने के पैसे तक नहीं थे . आखिर एक दिन मकान मालिक उनका घर सारा सामान सड़क पर रख दिया .
उस पीढ़ी के ऐसे राजनीतज्ञों का काल धीरे धीरे खत्म होने लगा . उनके समय संसद सदस्यों के वेतन तथा अन्य भत्ते बहुत की कम थे . लेकिन 60 और70 के दशक में संसद सदस्यों तथा विधानसभा सदस्यों के वेतन और भत्ते तो बढे ही साथ मुफ्त हवाई यात्रा जैसे सुविधाए में भी इजाफा हुआ . बाद में अपने क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए करोड़ों की राशि मिलने लगी . यह बात किसी से छिपी नहीं कि अधिकतर सांसद ऐसे विकास कार्यों के ठेके वे अपने चहेतों को देते है तथा इसके लिए उनसे भारी कमीशन वसूल करते है . यही हाल विधानसभा सदस्यों तथा पंचायत राज संस्थानों में है . राजस्थान सहित कई राज्यों में सरपंच बनने के कुछ समय बाद उनके पास महंगी कार आ जाती है।
पिछले कुछ समय से स्थिति यह हो गई कि अधिकतर लोग जो राजनीति में आते हैं उनका उद्देश्य कतई समाज सेवा नहीं . वे राजनीति को पेशे के रूप लेते है तथा धन सम्पति जुटाना उनका सबसे पहला लक्ष्य रहता है . पर अभी भी कुछ ऐसे लोग राजनीति में है जो ईमानदारी से अपना जिम्मेदारी निभाते है।
केरलम जैसे राज्य से अक्सर ऐसी ख़बरें आती रहती है कि कई पार्षद तथा पंच और सरपंच अपने पद से त्यागपत्र दे कर सरकारी तथा अच्छी निजी क्षेत्र की नौकरियों को प्राथमिकता दे रहे है . उनका कहना है उनको जो भत्ते मिल रहे है उनसे वे अपना घर नहीं चला सकते . ऐसे लोग गैर कानूनी तरीके से पैसा कमाने में विश्वास नहीं करते . उन्होंने इन पदों के लिए इस लिए चुनाव लड़ा ताकि वे अपने क्षेत्र के विकास के काम को गति दे सकें .इस राज्य में इस प्रकार के छोटे स्तर के राजनीतिज्ञ केवल एक पार्टी में नहीं है बल्कि लगभग सभी पार्टियों में है , जो राजनीति को पेशा समझ इस क्षेत्र में आगे बढ़ने की चाह नहीं रखते है . यानि विधायक , सांसद तथा मंत्री बनने की इच्छा रखते हों . हाल ही में केरलम में स्थानीय निकायों के लिए 38 उप चुनाव हुए थे . यह पद कई कारणों से खाली हुए थे. कुछ विधान सभा का चुनाव जीत चुके थे तथा कुछ की अकाल मृत्यु हो चुकी थी . लेकिन कम से कम सात स्थानों पर उप चुनाव इसलिये हुए क्योंकि उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था उनको या तो सरकारी नौकरी या फिर निज़ी क्षेत्र में अच्छी नियुक्ति मिल चुकी . इनमें से दो कांग्रेस , दो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी तथा तीन इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के थे . इन सबने इसलिए त्यागपत्र दे दिया क्योंकि उनको मिलने वाले भत्ते बहुत कम थे तथा परिवार चलना मुश्किल था . 2022 उनको ,मानद राशि 3000 रूपये मिलती थी . 2022 के बाद यह बढ़ा 8000 कर दी गई . एक मीटिंग में भाग लेने के उनका भत्ता 200 रूपये तय किया गया लेकिन इस मद में अधिकतम 1000 तक राशि ही ले सकते है मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की एक सदस्य , जो चार बार चुनी जा चुकी थी थी , ने इसलिए त्यागपत्र दे दिया क्योंकि उसे ईटली में अच्छी नौकरी मिल चुकी थी . उन्होंने बाकायदा पार्टी की अनुमति से ले कर ही त्यागपत्र दिया था . उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वे केवल वित्तीय कारणों से अपना त्यागपत्र दे रही है क्योंकि 8000 रूपये प्रति माह से उनका घर नहीं चल सकता।
कोच्ची के मेयर ने लगभग इन्ही कारणों से अपना त्यागपत्र दे दिया . उनका कहना था कि उन्हें एक स्थाई नौकरी मिल गई थी जहाँ उन्हें अच्छा वेतन मिलने वाला था . उनका कहना था कि उनकी तरह कई पार्षद भी अपना पद छोड़ने सोच रहे हैं . इनमें से अधिकतर युवा है तथा अच्छी और स्थाई नौकरी की तलाश कर रहे है . लेकिन कोच्ची एक पूर्व मेयर सौमिनी जैन का कहना है कि इस प्रकार चुने गए जन प्रतिनिधियों को अपने कार्यकाल के पूरा होने से पहले त्यागपत्र नहीं देना चाहिए . उन्होंने अपने इAलाके के मतदतायों को यह विश्वास दिलाया था कि वे निगम में अपने क्षेत्र का विकास करेंगे . पर इसके बावजूद राज्य में कई युवा राजनीतिज्ञ अच्छी नौकरी की तलाश कर रहे है ताकि उन्हें और उनके परिवार को वित्तीय सुरक्षा मिल सके। (लेखक के अपने विचार हैं)

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