
लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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जलवायु परिवर्तन से धरती की आकृति में बदलाव का खतरा बढ़ता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन से न केवल समुद्र के तापमान का स्तर बढ़ रहा है और मौसम में अनियमितता आ रही है, बल्कि इससे हमारे ग्रह के आकार में भी बदलाव आने की आशंका बलवती हो रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का बढ़ता जलस्तर केवल पर्यावरण की ही समस्या नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता के अस्तित्व और अर्थव्यस्था के लिए भी गहरा संकट है। यदि संयुक्त राष्ट्र की जलवायु रिपोर्ट की मानें तो आने वाले दिनों में विषैली गैसों का उत्सर्जन यदि इसी प्रकार जारी रहा तो इस बात की प्रबल आशंका है कि वर्ष 2100 तक समुद्री जलस्तर दो मीटर तक और ऊपर उठकर विशाल तटीय भूभाग को जलमग्न कर देगा। गौरतलब है कि वर्ष 2014 से 2023 के बीच वैश्विक स्तर पर समुद्र का जलस्तर 4.7 मिलीमीटर की दर से बढ़ा था लेकिन वर्ष 2024 में इसने पुराना रिकार्ड तोड़ा और 5.5 मिलीमीटर की चौंकाने वाली बढ़ोतरी दर्ज की। दुनिया के वैज्ञानिकों की इस बारे में एकमुश्त राय है कि सबसे अनुकूल परिस्थिति रहने पर भी इस सदी के अंत तक यानी 2100 तक समुद्र का जलस्तर कम से कम 0.55 मीटर तक बढ़ जायेगा। उस दौरान सबसे गंभीर स्थिति में यह बढ़ोतरी एक मीटर से अधिक तक होगी।
ऐसी स्थिति जिनमें एक वैश्विक तापमान बढ़ोतरी के चलते ध्रुवीय बर्फ की चादरों और विशालकाय हिमनदों का तेजी से पिघलना और दूसरा गर्म होते समुद्र के जल का तापीय प्रसार ये प्रमुख कारण हैं। जबकि मानव गतिविधियों से उत्पन्न होने वाली अतिरिक्त ऊष्मा का तकरीबन 91 फीसदी हिस्सा महासागर सोख रहे हैं। देखा जाये तो समुद्री जलस्तर में बढ़ोतरी का नुकसान अभीतक सबसे पहले और सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ रहा है जिनका उत्सर्जन योगदान नगण्य है। जबकि उन देशों के पास संसाधनों की भारी कमी है। गौरतलब है कि प्रशांत महासागर के बहुतेरे छोटे द्वीपों में जलस्तर बढ़ने की दर वैश्विक औसत से दोगुणी से भी ज्यादा है। देखा जाये तो ढाका, मुंबई, कोलकाता जैसे निचले डेल्टा शहरों में 1.4 करोड़ से अधिक लोगों के जीवन और आजीविका पर प्रत्यक्ष भयंकर खतरा मंडरा रहा है। इसके अलावा इससे मियामी, न्यूयार्क, गुआंगझू जैसे तटीय महानगरों को खरबों डालर का वित्तीय नुकसान सहना पड़ेगा। इसमें दो राय नहीं।

गौरतलब है कि मौजूदा दौर में दुनिया की लगभग दस फीसदी आबादी यानी करीब 77 करोड़ लोग समुद्र रेखा से पांच मीटर से भी कम ऊंचाई पर रहते हैं। यह बेहद खतरनाक स्तर है। यह भी कि समुद्र की आक्रामक लहरें आसपास की उपजाऊ कृषि भूमि और पीने के मीठे पानी के कुंओं को खारा बना रही हैं। इससे समुद्र तटीय बुनियादी ढांचे को अब तक लगभग 1.8 खरब डालर से भी अधिक का नुकसान पहुंच चुका है। यही स्थिति रही तो दुनिया को हर साल 1.4 खरब डालर का नुकसान उठाना पड़ेगा। फिर समुद्र का बढ़ता तापमान और जलस्तर बढ़ने के साथ उसकी परतों की संरचना बदल रही है जिससे ज्वार-भाटे की तीव्रता और ऊंचाई प्रभावित हो रही है जिससे तटीय इलाकों पर बाढ़ और कटाव का खतरा बढ़ सकता है। गौरतलब है कि ज्वार-भाटा तटीय रेखाओं और समुद्री पारिस्थितिकीय तंत्र को आकार देते हैं। इसके साथ-साथ वे तटीय समुदायों को भी खासा प्रभावित करते हैं। इसलिए जलवायु परिवर्तन के कारण महासागरीय बदलावों के बीच यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि बदलती समुद्री परिस्थितियां ज्वार-भाटे के स्वरूप को किस तरह प्रभावित कर रही हैं।हकीकत तो यह है कि वर्ष 1970 से लेकर 2020 तक छोटे द्वीपीय विकास शील देशों ने अबतक कुल मिलाकर जलवायु आपदाओं के चलते 153 अरब डालर का नुकसान उठाया है।

दुनिया के वैज्ञानिक तो तकरीबन एक दशक से भी पहले यह चेतावनी दे चुके हैं कि जलवायु परिवर्तन से अंटार्कटिका के तापमान में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचने पर ग्लेशियर और तेजी से पिघलेंगे।फिर वहां बर्फ की परतें पहले की अपेक्षाकृत अधिक तेजी से पिघलने लगी हैं जो ज्यादा घातक साबित होंगीं। इससे अधिक कटाव और क्षरण होगा। पिघलते ग्लेशियरों के इस क्षरण से घाटियां और ज्यादा गहरी हो जायेंगीं और समुद्रों में अपेक्षाकृत और ज्यादा गाद जमा होगी। हकीकत यह है कि तेजी से सरक रहे या यूं कहें कि पिघल रहे ग्लेशियर अपने प्रवाह मार्ग की घाटियों और महाद्वीपीय मैदानी क्षेत्रों में अधिक गाद इकट्ठा कर देते हैं। इससे पेयजल की उपलब्धता प्रभावित होती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ध्रुवीय और महाद्वीपीय इलाकों का जहां मिलन होता है, वह संधिक्षेत्र जैव विविधता के लिहाज से बेहद संपन्न है। अगर पानी में ज्यादा गाद जमा होगी तो इसका सीधा दुष्प्रभाव जलीय जीवों के पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ेगा। यूनिवर्सिटी आफ ब्रिटिश कोलंबिया के प्रोफेसर और शोध प्रमुख मिशेल कोप्पस का कहना है कि हम लोगों ने पाया है कि अंटार्कटिका के ग्लेशियरों की तुलना में पेंटागोनिया के ग्लेशियर 100 से एक हजार गुणा तेजी से क्षरित हुए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि गर्म तापमान और बर्फ के पिघलने के कारण ग्लेशियर के आधार में अधिक फिसलन बनी जिससे उनका तेजी से क्षरण हुआ। इससे पृथ्वी के आकार में बदलाव की संभावनओं को नकारा नहीं जा सकता।

फिर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि धरती को इंसानों और दूसरे जीवों के रहने लायक बनाये रखने वाली प्राकृतिक व्यवस्थाओं पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि धरती की सेहत को मापने वाली नौ अहम सीमाओं में से सात को इंसानी कारगुजारियों ने लांघ दिया है। दरअसल इसमें जलवायु परिवर्तन, जैव मंडल में, भूमि के उपयोग में, मीठे पानी और जैव भूरासायनिक प्रवाह में बदलाव, नये मानव निर्मित पदार्थों का पर्यावरण में प्रवेश और समुद्र के अम्लीकरण की अहम भूमिका है।इसका नकारात्मक प्रभाव जंगलों और समुद्री पारिस्थितिकीय तंत्र पर पड़ा है। जाहिर है इससे जंगलों और समुद्रों पर खतरा और गहरा गया है।

दरअसल जिन सीमाओं को इंसान लांघ रहा है, उन्हें ‘प्लैनेटरी बाउंड्री’ कहा जाता है। ये ऐसी सुरक्षित सीमायें हैं जिनके अंदर रहकर धरती का पर्यावरण स्थिर और जीवन के लिए अनुकूल बना रह सकता है। जब इंसानी गतिविधियों से यह सीमायें तोड़ी जाने लगती हैं, तब जलवायु, पानी, जंगल, समुद्र और जीव-जंतुओं पर खतरा बढ़ जाता है। इसका खुलासा जर्मनी की पोट्सडैम इंस्टीट्यूट आफ क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च की प्लेनेटरी हैल्थ चेक की रिपोर्ट में किया गया है। रिपोर्ट का संदेश गंभीर है लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि धरती तुरंत खत्म हो जायेगी। इस बाबत वैज्ञानिकों का मानना है कि लांघ गयी सीमाओं को सुरक्षित दायरे में लाने के लिए अभी भी कार्रवाई की गुंजाइश मौजूद है। सभी प्लेनेटरी बाउंड्री को सुरक्षित दायरे में लाने के लिए तेज कदम उठाने जरूरी हैं। धरती की स्थिरता और प्राकृतिक क्षमता को बचाने के लिए तत्काल प्रयास किये जाने चाहिए। इनमें जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करना होगा, दुनिया को स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ना होगा, समुद्री पारिस्थितिकीय तंत्र का संरक्षण कर जीवों को बचाना और जंगलों की कटाई पर पूरी तरह रोक लगाना होगा। सबसे बड़ी बात कि इन समाधानों पर तत्काल लागू किये जाने की कार्रवाई किये बिना धरती बची रह पायेगी, इसमें संदेह है और यही सबसे बड़ी चिंता का विषय है। (लेखक के अपने विचार हैं)