डॉ. बी.आर. आंबेडकर की चेतावनी और निर्वाचन आयुक्तों का कानून

नियुक्ति की स्वतंत्रता, सत्ता का प्रभाव और कानूनी जवाबदेही का संवैधानिक विश्लेषण
लेखक : श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर
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क्या पद की सुरक्षा ही संस्था की स्वतंत्रता की गारंटी है?
भारतीय लोकतंत्र में निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता केवल एक प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि संविधान की विश्वसनीयता और जनता के मताधिकार से जुड़ा प्रश्न है। चुनाव कराने वाली संस्था पर नागरिकों का भरोसा इस बात से भी निर्धारित होता है कि उसके पदाधिकारियों की नियुक्ति किस प्रक्रिया से होती है, वे राजनीतिक दबाव से कितने स्वतंत्र हैं और उनके आधिकारिक कार्यों के संबंध में जवाबदेही की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
16 जून 1949 को संविधान सभा में डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति पर चर्चा करते हुए एक ऐसी चिंता व्यक्त की थी, जिसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। उन्होंने कहा था कि निर्वाचन आयुक्त का कार्यकाल निश्चित और सुरक्षित कर देना पर्याप्त नहीं होगा, यदि संविधान में अनुपयुक्त व्यक्ति की नियुक्ति रोकने की पर्याप्त व्यवस्था न हो।
लगभग 74 वर्ष बाद, दिसंबर 2023 में संसद ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा की शर्तों तथा कार्यकाल से संबंधित नया कानून पारित किया। इस कानून ने चयन समिति की संरचना निर्धारित की और धारा 16 के माध्यम से आधिकारिक कर्तव्यों से संबंधित सिविल तथा आपराधिक न्यायिक कार्यवाहियों के विरुद्ध संरक्षण का प्रावधान किया।
इन दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखने पर एक गंभीर संवैधानिक प्रश्न सामने आता है: क्या निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए नियुक्ति की निष्पक्ष प्रक्रिया, पद की सुरक्षा और कानूनी जवाबदेही के बीच पर्याप्त संतुलन स्थापित किया गया है?
इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए इतिहास, संविधान, कानून और वर्तमान न्यायिक घटनाक्रम का तथ्यपरक विश्लेषण आवश्यक है। आंबेडकर ने 2023 के कानून पर कोई टिप्पणी नहीं की थी; उनकी 1949 की चिंता को आज की व्यवस्था पर लागू करना एक संवैधानिक विश्लेषण है, न कि उनके वक्तव्य को भविष्यवाणी के रूप में प्रस्तुत करना।

  1. 16 जून 1949: आंबेडकर ने नियुक्ति की प्रक्रिया पर क्या कहा था?
    संविधान सभा में निर्वाचन आयोग से संबंधित प्रावधानों पर चर्चा के दौरान नियुक्ति और पद से हटाने की व्यवस्था पर विचार किया जा रहा था। डॉ. आंबेडकर ने अपने उत्तर में स्वीकार किया कि निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति के संबंध में प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना द्वारा उठाई गई चिंता में पर्याप्त बल था।
    उन्होंने कहा:
    “There is no use making the tenure of the Election Commissioner a fixed and secure tenure if there is no provision in the Constitution to prevent either a fool or a knave or a person who is likely to be under the thumb of the Executive.”
    इसका हिंदी भावार्थ है:
    “निर्वाचन आयुक्त का कार्यकाल निश्चित और सुरक्षित कर देने का कोई लाभ नहीं, यदि संविधान में ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति रोकने की व्यवस्था नहीं है जो अयोग्य, धूर्त अथवा कार्यपालिका के दबाव में रहने वाला हो।”
    इस उद्धरण का प्राथमिक स्रोत संविधान सभा की 16 जून 1949 की आधिकारिक कार्यवाही है। उसमें आंबेडकर ने यह भी स्वीकार किया था कि उनके प्रस्ताव में अनुपयुक्त व्यक्ति की नियुक्ति रोकने के लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं था। उन्होंने इसे एक गंभीर समस्या बताया और अमेरिकी संविधान में कुछ नियुक्तियों के लिए सीनेट की सहमति की व्यवस्था का उदाहरण दिया।
    यह ऐतिहासिक संदर्भ इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि आंबेडकर केवल निर्वाचन आयुक्त के कार्यकाल की सुरक्षा पर विचार नहीं कर रहे थे। वे नियुक्ति के समय उपयुक्त व्यक्ति के चयन की समस्या को भी संवैधानिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मान रहे थे।
    इस वक्तव्य का केंद्रीय संदेश यह है कि किसी पदाधिकारी को मनमाने ढंग से हटाए जाने से बचाना और उस पद पर उपयुक्त व्यक्ति की नियुक्ति सुनिश्चित करना दो अलग-अलग आवश्यकताएँ हैं। पहली व्यवस्था पद पर बने रहने की स्वतंत्रता से संबंधित है; दूसरी उस व्यक्ति के चयन की विश्वसनीयता से।
  2. तीन अभिव्यक्तियों का अर्थ: योग्यता, सत्यनिष्ठा और स्वतंत्रता
    आंबेडकर के वक्तव्य में प्रयुक्त तीन अभिव्यक्तियाँ निर्वाचन आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
    ‘A fool’ — अयोग्य व्यक्ति: किसी संवैधानिक पद पर नियुक्त व्यक्ति में उस पद की जिम्मेदारियों को समझने, कानून के अनुरूप निर्णय लेने और संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करने की क्षमता होनी चाहिए।
    ‘A knave’ — धूर्त या बेईमान व्यक्ति: सार्वजनिक पद पर सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता आवश्यक हैं। निर्वाचन आयोग के निर्णयों पर भरोसा इस बात से जुड़ा है कि वे किसी राजनीतिक पक्ष को अनुचित लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से न लिए जाएँ।
    ‘Under the thumb of the Executive’ — कार्यपालिका के अनुचित प्रभाव में रहने वाला व्यक्ति: यह अभिव्यक्ति नियुक्ति की प्रक्रिया और संस्थागत स्वतंत्रता के बीच संबंध को सामने लाती है। यदि चयन प्रक्रिया में एक ही राजनीतिक पक्ष का प्रभाव अत्यधिक हो, तो संस्था की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
    इन शब्दों को किसी वर्तमान निर्वाचन आयुक्त के विरुद्ध व्यक्तिगत आरोप के रूप में इस्तेमाल करना उचित नहीं होगा। किसी व्यक्ति की ईमानदारी, योग्यता या वास्तविक आचरण के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए प्रमाण आवश्यक हैं।
    आंबेडकर के वक्तव्य का उपयोग किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि उस संवैधानिक व्यवस्था का मूल्यांकन करने के लिए किया जाना चाहिए जिसमें नियुक्ति होती है।
  3. संविधान का अनुच्छेद 324: नियुक्ति और पद की सुरक्षा
    भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी देता है। इसी अनुच्छेद में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति तथा पद से हटाने से संबंधित प्रावधान भी हैं।
    अनुच्छेद 324(2) के अनुसार, निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जो संसद द्वारा बनाए गए कानून के अधीन होती है। अनुच्छेद 324(5) मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया और आधार निर्धारित करता है। अन्य निर्वाचन आयुक्तों को हटाने के मामले में मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश की संवैधानिक भूमिका है।
    इन प्रावधानों से तीन अलग प्रश्न सामने आते हैं:
    पहला, नियुक्ति किस प्रक्रिया से होगी और चयन में किन संस्थाओं की भूमिका होगी?
    दूसरा, पदाधिकारी को मनमाने ढंग से हटाए जाने या अनुचित दबाव से कैसे बचाया जाएगा?
    तीसरा, आधिकारिक कार्यों के संबंध में गंभीर आरोप लगाए जाने पर जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी?
    ये प्रश्न एक-दूसरे से जुड़े हैं, लेकिन इनके कानूनी उद्देश्य अलग हैं। नियुक्ति की प्रक्रिया पद पर आने वाले व्यक्ति के चयन से संबंधित है। कार्यकाल की सुरक्षा पदाधिकारी की स्वतंत्रता से और कानूनी प्रतिरक्षा कुछ परिस्थितियों में न्यायिक कार्यवाही पर लागू होने वाले संरक्षण से संबंधित है।
    इसलिए किसी एक व्यवस्था को मजबूत कर देना बाकी दोनों प्रश्नों का स्वतः समाधान नहीं करता।
  4. 2 मार्च 2023 का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
    2 मार्च 2023 को सर्वोच्च न्यायालय ने Anoop Baranwal v. Union of India मामले में निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के संबंध में महत्त्वपूर्ण निर्णय दिया।
    पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने निर्देश दिया कि जब तक संसद इस विषय पर कानून नहीं बनाती, तब तक नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता—या निर्धारित परिस्थिति में विपक्ष के सबसे बड़े दल के नेता—और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति की सलाह पर राष्ट्रपति नियुक्ति करेंगे।
    यह एक अंतरिम व्यवस्था थी, जिसका उद्देश्य नियुक्ति की प्रक्रिया में सरकार के साथ विपक्ष और न्यायपालिका की भागीदारी सुनिश्चित करना था।
    इस निर्णय और आंबेडकर के 1949 के वक्तव्य के बीच वैचारिक समानता दिखाई देती है। दोनों प्रसंगों में यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण है कि निर्वाचन आयोग की नियुक्ति में कार्यपालिका की शक्ति को किस प्रकार संतुलित किया जाए।
    लेकिन दोनों को एक ही कानूनी घटना मानना सही नहीं होगा। आंबेडकर संविधान के निर्माण के दौरान नियुक्ति की समस्या पर विचार कर रहे थे, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में लागू संविधान की व्याख्या करते हुए अंतरिम व्यवस्था निर्धारित की थी।
  5. दिसंबर 2023 का कानून: चयन समिति में क्या बदलाव हुआ?
    संसद ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें तथा पदावधि) अधिनियम, 2023 पारित किया। विधेयक 10 अगस्त 2023 को राज्यसभा में पेश हुआ, 12 दिसंबर को राज्यसभा और 21 दिसंबर को लोकसभा से पारित हुआ। राष्ट्रपति की स्वीकृति 28 दिसंबर 2023 को मिली और कानून 2 फरवरी 2024 से लागू हुआ।
    इस अधिनियम की धारा 7 के अनुसार चयन समिति में तीन सदस्य हैं:
  6. प्रधानमंत्री, जो समिति के अध्यक्ष हैं।
  7. लोकसभा में विपक्ष के नेता।
  8. प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री।
    इस प्रकार, मार्च 2023 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित अंतरिम समिति में शामिल भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह कानून में प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रखा गया।
    इस बदलाव पर दो प्रमुख दृष्टिकोण सामने आते हैं।
    आलोचकों का तर्क है कि प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित मंत्री, दोनों की भागीदारी से चयन समिति में सरकार का प्रभाव अधिक हो सकता है। उनके अनुसार, न्यायपालिका की भागीदारी नियुक्ति प्रक्रिया में एक अलग संस्थागत दृष्टिकोण उपलब्ध करा सकती थी।
    दूसरी ओर, कानून के समर्थन में यह तर्क दिया जा सकता है कि संविधान का अनुच्छेद 324(2) संसद को नियुक्ति की प्रक्रिया निर्धारित करने का अधिकार देता है और संसद ने उसी अधिकार के अंतर्गत कानून बनाया है।
    यहाँ दो प्रश्नों को अलग रखना आवश्यक है: संसद को कानून बनाने का अधिकार है या नहीं, और कानून द्वारा निर्धारित चयन प्रक्रिया निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है या नहीं।
    दूसरा प्रश्न नियुक्ति के मानदंडों, पारदर्शिता, चयन की पद्धति और संस्थागत संतुलन के आधार पर परखा जाना चाहिए। आंबेडकर का वक्तव्य इस मूल्यांकन के लिए उपयोगी संवैधानिक कसौटी प्रदान करता है।
  9. धारा 16: निर्वाचन आयुक्तों को किस प्रकार का संरक्षण मिलता है?
    2023 के कानून की धारा 16 का शीर्षक है—मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों का संरक्षण।
    इसका मूल प्रावधान कहता है कि कोई न्यायालय ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध सिविल या आपराधिक कार्यवाही शुरू या जारी नहीं करेगा, जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त या निर्वाचन आयुक्त है अथवा रहा है, यदि मामला उसके आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन में, अथवा ऐसा करने का दावा करते हुए, किए गए कार्य, गतिविधि या कथन से संबंधित हो।
    इस प्रावधान के चार प्रमुख पहलू हैं।
    पहला, इसमें सिविल और आपराधिक दोनों प्रकार की न्यायिक कार्यवाहियों का उल्लेख है।
    दूसरा, इसमें वर्तमान और पूर्व पदाधिकारियों दोनों को शामिल किया गया है।
    तीसरा, सुरक्षा का संबंध आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन में, अथवा ऐसा करने का दावा करते हुए, किए गए कार्यों से है। इसे हर निजी गतिविधि के लिए सामान्य कानूनी छूट कहना सही नहीं होगा।
    चौथा, इसका शब्दांकन न्यायालय द्वारा संबंधित कार्यवाही शुरू करने या जारी रखने पर रोक लगाता है। इसलिए गंभीर आरोपों की स्थिति में इस सुरक्षा की सीमा और उसके न्यायिक प्रभाव का प्रश्न महत्त्वपूर्ण है।
    इस प्रावधान के समर्थन में यह तर्क दिया जा सकता है कि निर्वाचन आयुक्तों को उनके आधिकारिक निर्णयों के कारण निराधार या दुर्भावनापूर्ण मुकदमों से बचाना आवश्यक है, ताकि वे स्वतंत्र रूप से अपने दायित्व निभा सकें।
    इसके विपरीत, आलोचकों की चिंता है कि यदि संरक्षण का दायरा बहुत व्यापक हो, तो आधिकारिक कार्यों से संबंधित गंभीर आरोपों की न्यायिक जाँच में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
    इसलिए मूल प्रश्न केवल यह नहीं है कि कानूनी सुरक्षा होनी चाहिए या नहीं। प्रश्न यह है कि सुरक्षा कितनी व्यापक हो, उसकी सीमाएँ क्या हों और गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जाँच का रास्ता किस प्रकार सुरक्षित रखा जाए।
  10. धारा 16 मूल विधेयक में नहीं थी: संसदीय प्रक्रिया का प्रश्न
    Association for Democratic Reforms (ADR) के अनुसार, धारा 16 मूल विधेयक में शामिल नहीं थी और बाद में जोड़ी गई। संगठन ने अपनी याचिका में यह भी तर्क दिया है कि प्रावधान जोड़े जाने के समय विपक्ष के अनेक सांसद निलंबित थे।
    इन दावों को सावधानी से प्रस्तुत करना आवश्यक है। किसी विधेयक में बाद में प्रावधान जोड़ना अपने आप उस प्रावधान को असंवैधानिक नहीं बनाता। इसी तरह, विपक्षी सांसदों की अनुपस्थिति अपने आप कानून की वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं है।
    फिर भी संशोधन की प्रक्रिया, उसके कारण और संसदीय विचार-विमर्श की पर्याप्तता लोकतांत्रिक जवाबदेही के दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं।
    धारा 16 के संदर्भ में यह विचार करना आवश्यक है कि निर्वाचन आयुक्तों को निराधार मुकदमों से संरक्षण देते हुए गंभीर आरोपों के न्यायिक परीक्षण की संभावना को कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है। इस प्रश्न का उत्तर कानून के वास्तविक पाठ, उसके उद्देश्य और उसके संवैधानिक प्रभाव के आधार पर दिया जाना चाहिए।
  11. अक्टूबर 2026: धारा 16 को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती
    ADR ने अक्टूबर 2026 में सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी। संगठन के प्रकाशित विवरण के अनुसार, 13 अक्टूबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर जवाब माँगा।
    याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह प्रावधान निर्वाचन आयुक्तों को अत्यधिक व्यापक और पद छोड़ने के बाद भी लागू रहने वाला संरक्षण देता है। याचिका में समानता, न्याय तक पहुँच और संवैधानिक जवाबदेही से जुड़े प्रश्न उठाए गए हैं।
    यहाँ तथ्यात्मक अंतर स्पष्ट रहना चाहिए। नोटिस जारी होना धारा 16 को असंवैधानिक घोषित करना नहीं है। इसका अर्थ है कि न्यायालय ने संबंधित पक्षों से जवाब माँगा है। 27 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध जानकारी के आधार पर इस चुनौती पर अंतिम निर्णय की पुष्टि नहीं की जा सकती।
    यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि नियुक्ति समिति की संरचना और धारा 16 दो अलग कानूनी मुद्दे हैं। पहला नियुक्ति की प्रक्रिया से संबंधित है, जबकि दूसरा आधिकारिक कार्यों के लिए कानूनी संरक्षण के दायरे से।
    इन दोनों का संबंध व्यापक संवैधानिक स्वतंत्रता और जवाबदेही से है, लेकिन इनके कानूनी परीक्षण अलग हैं।
  12. आंबेडकर की चेतावनी और 2023 का कानून: वास्तविक संबंध क्या है?
    अब मूल प्रश्न पर लौटना आवश्यक है—क्या 1949 की चेतावनी और 2023 का कानून एक-दूसरे से जुड़े हैं?
    इसका उत्तर है: हाँ, संवैधानिक विचार के स्तर पर; लेकिन इसे प्रत्यक्ष ऐतिहासिक भविष्यवाणी के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा।
    1949 में आंबेडकर ने नियुक्ति की प्रक्रिया में अनुपयुक्त व्यक्ति के चयन को रोकने की समस्या उठाई थी। 2023 के कानून ने चयन समिति की संरचना निर्धारित की और धारा 16 के माध्यम से आधिकारिक कर्तव्यों से संबंधित कानूनी संरक्षण प्रदान किया।
    दोनों के बीच संबंध निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और जवाबदेही से जुड़ा है। लेकिन नियुक्ति की प्रक्रिया, कार्यकाल की सुरक्षा और कानूनी प्रतिरक्षा तीन अलग व्यवस्थाएँ हैं।
    आंबेडकर के वक्तव्य को आज की बहस में निम्नलिखित प्रश्नों की कसौटी के रूप में देखा जा सकता है:
  • क्या नियुक्ति के मानदंड स्पष्ट और पारदर्शी हैं?
  • क्या चयन समिति में पर्याप्त संस्थागत संतुलन है?
  • क्या उम्मीदवारों की योग्यता और निष्पक्षता का विश्वसनीय मूल्यांकन होता है?
  • क्या कानूनी संरक्षण स्वतंत्र निर्णय लेने में सहायता करता है?
  • क्या गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जाँच और न्यायिक जवाबदेही का रास्ता सुरक्षित रहता है?
    इन प्रश्नों का उत्तर किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में निष्कर्ष निकालने के लिए नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था का तथ्यपरक मूल्यांकन करने के लिए दिया जाना चाहिए।
    निष्कर्ष: लोकतंत्र की विश्वसनीयता नियुक्ति, स्वतंत्रता और जवाबदेही के संतुलन में है
    डॉ. बी. आर. आंबेडकर का 16 जून 1949 का वक्तव्य निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता से संबंधित भारतीय संवैधानिक इतिहास का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि सुरक्षित कार्यकाल तभी पर्याप्त होगा, जब अनुपयुक्त व्यक्ति की नियुक्ति रोकने की व्यवस्था भी हो।
    2023 के कानून ने नियुक्ति समिति की संरचना बदली और धारा 16 के माध्यम से आधिकारिक कर्तव्यों से संबंधित सिविल तथा आपराधिक कार्यवाहियों के विरुद्ध संरक्षण प्रदान किया। इन प्रावधानों की संवैधानिक समीक्षा और सार्वजनिक बहस को आंबेडकर के विचारों के प्रकाश में समझना उपयोगी है, लेकिन उनके ऐतिहासिक वक्तव्य को किसी वर्तमान पदाधिकारी के विरुद्ध आरोप या कानून की असंवैधानिकता का स्वतः प्रमाण नहीं बनाया जा सकता।
    लोकतंत्र में निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता का प्रश्न केवल यह नहीं है कि उसके आयुक्तों को कितनी सुरक्षा मिले। यह भी है कि उनकी नियुक्ति कितनी निष्पक्ष प्रक्रिया से हो, वे कितने स्वतंत्र निर्णय ले सकें और गंभीर आरोपों की स्थिति में जवाबदेही कैसे सुनिश्चित की जाए।
    किसी संवैधानिक संस्था की वास्तविक मजबूती निष्पक्ष नियुक्ति, स्वतंत्र निर्णय, पद की सुरक्षा और न्यायसंगत जवाबदेही के संतुलन में निहित होती है।
    आंबेडकर की 1949 की चिंता आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि वह हमें किसी एक कानून के पक्ष या विपक्ष में तत्काल निष्कर्ष निकालने के बजाय पूरी संवैधानिक व्यवस्था का मूल्यांकन करने की प्रेरणा देती है। यही लोकतांत्रिक विमर्श, ऐतिहासिक तथ्यों और संवैधानिक मूल्यों के प्रति गंभीर दृष्टिकोण है। (लेखक के अपने विचार हैं)

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