
लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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ऐसे समय जब कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता शशि थरूर की पार्टी से दूरियां बढ़ रहीं है, केरल में एक ऐसा चुनावी सर्वेक्षण सामने आया है , जिसमें वे राज्य के सबसे अधिक लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे कर सामने आये है. यह सर्वेक्षण के एक नामी गिरामी चुनाव सर्वेक्षण संस्था ने इसी महीने में किया था। इस सर्वेक्षण में अगले साल मई में होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले सयुंक्त लोकतान्त्रिक मोर्चे के सत्ता में आने के संभावना जताई गई है।
इस चुनावी सर्वेक्षण में एक इस अधिक नजरिये से राज्य की राजनीतिक का विश्लेषण किया गया है। दक्षिण के इस राज्य में सारी राजनीति दो धुरों में बंटी हुई है.विगत कई दशकों से राज्य में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाला वाम लोकतांत्रिक मोर्चा और कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतान्त्रिक मोर्चा बारी-बारी से हर पांच साल बाद सत्ता में आता रहे हैं। लेकिन 2021 के विधानसभा चुनावों में इस राज्य में पहली बार ऐसा हुआ जब वाम मोर्चा लगातार दूसरी बार सत्ता में आने में सफल रहा. इस सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 60 प्रतिशत लोगों ने यह राय व्यक्त की है कि वर्तमान सरकार लगातार तीसरी बार सत्ता में नहीं आ सकती.इस सर्वेक्षण के अनुसार अगर कांग्रेस नीत मोर्चा सत्ता में आता है तो शशि थरूर को राज्य का मुख्यमंत्री बनना चाहिए। उनके पक्ष में राय देने वालों की संख्या लगभग 28 प्रतिशत है। कांग्रेस पार्टी के किसी अन्य नेता की लोकप्रियता 10 प्रतिशत से अधिक नहीं है। उधर वाम मोर्चे की सरकार के मुख्यमंत्री विजयन पिनराई की लोकप्रियता मात्र 17 प्रतिशत ही है। आश्चर्य की बात यह है कि पिनराई की सरकार में मंत्री के.के शैलजा की लोकप्रियता 27 प्रतिशत है। अधिकतर मतदाता इस राय के दोनों मोर्चों के पुराने नेताओं की लोकप्रियता कम हो रही है।
राज्य में पिछली महीने ही नीलाम्बुर विधानसभा की सीट पर हुए उप चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार के जीत हुई थी जबकि पिछले विधानसभा चुनावों में यह सीट वाम मोर्चे के उम्मीदवार ने जीती थी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रदेश में राजनीतिक हवा बदल रही है। राज्य नवम्बर के महीने में 23 हज़ार से अधिक स्थानीय निकायों तथा पंचायत राज संस्थायों के चुनाव होने है। इन्हें विधानसभा चुनावों का सेमी फाइनल कहा जा रहा है।
अगर राज्य में हर पिछले चुनाव में होने मतों को देखा जाये तो लोकसभा चुनावों में वोटरों ने कांग्रेस नीत मोर्चे को अधिक पसंद किया जबकि विधानसभा चुनावों में उनकी पसंद वाम मोर्चा ही रहा है। इसी प्रकार स्थानीय निकायों और पंचायत राज संस्थायों के चुनावों में वाम मोर्चे को बढ़त मिलती रही है।
अब वापिस लौटते है शशि थरूर पर, जिनकी अपनी पार्टी से दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। वे बहु आयाम वाले व्यक्ति के रूप में जाने जाते है। वे लम्बे समय तक संयुक्त राष्ट्र संघ के उप महासचिव रहे। एक समय वे इस संस्था के महासचिव पद के दावेदार थे। लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो वे देश लौट आये। कांग्रेस की टिकट पर राज्य की राजधानी से 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा। जीत के बाद देश की मनमोहन सिंह की सरकार में विदेश राज्यमंत्री बने। वे अगले तीन च लोकसभा चुनाव भी जीते लेकिन कांग्रेस के फ्रंट लाइन नेता बनने सफल नहीं हुए। उन्होंने मल्लिकार्जुन खरगे के खिलाफ पार्टी के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा लेकिन वे हार गए। बाद में उनको पार्टी की केंद्रीय कार्यकारिणी का सदस्य बना दिया गया। लेकिन इन सबके के बावजूद उनको पार्टी की राज्य ईकाई में कोई रुतबा नहीं बन सका। कुछ समय पूर्व उनको उम्मीद थी कि उन्हें पार्टी की राज्य ईकाई का अध्यक्ष बनाया जायेगा। यह राज्य के मुख्यमंत्री बनने की दिशा की ओर पहला कदम होगा। पर पार्टी ने उनके स्थान पर सन्नी जोसफ को इस पद पर नियुक्त किया। उसी समय से उनकी कांग्रेस पार्टी से दूरियां बढ़ने लगी। ऑपरेशन सिंदूर के बाद जब कई देशों में सर्वदलीय प्रतिनिधि दल भेजे गए तो वे पार्टी नेतृत्व की अनुमति के बिना इसमें शामिल हो गए पिछले दिनों जब बीजेपी और उनके साथी दलों ने आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने पर खुल कर कांग्रेस पार्टी की निंदा की तो कांग्रेस के नेता होने के बावजूद शशि थरूर ने एक बड़े इंग्लिश अख़बार में आपातकाल के विरोध में एक लेख लिखा। जब उनसे इसके बारे में पूछ गया तो उन्होंने कहा कि वे पार्टी से अधिक देश के हितों को आगे रखते है .वे कई बार दोहरा चुके है कि उनके पास कई विकल्प हैं। अगर वे बीजेपी में जाते है तो इससे केरल में इसका आधार बढ़ सकता है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)