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मंडी। वैश्विक स्तर पर लचीली और वियरेबल इलेक्ट्रॉनिक्स की दिशा में_बड़ी मांग है, जिसमें मोड़ने योग्य स्मार्टफोन से लेकर ऐसे मेडिकल सेंसर शामिल हैं जो वास्तविक समय में स्वास्थ्य की निगरानी कर सकते हैं। इन तकनीकों की सफलता काफी हद तक एडवांस्ड मैटेरियल्स पर निर्भर करती है। ग्रैफीन, एक पतली 2डी सामग्री, अपने अद्वितीय गुणों के कारण अगले जनरेशन के फोटोडिटेक्टर, सेंसर, सुपरकैपेसिटर और फ्लेक्सिबल इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों के लिए आधार के रूप में मानी जाती है।
हालांकि, ग्रैफीन और अन्य 2डी मैटेरियल्स में कई कठिनाई हैं। पिछले चार वर्षों के अध्ययन में यह देखा गया कि डब्ल्यूएस₂ जैसी पतली 2डी सामग्रियों में ऑक्सीकरण और डिग्रेडेशन होता है, जिससे उपकरण की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। इसके अलावा, पारंपरिक ट्रांसफर टेक्नीकें अक्सर इन नाजुक मोनोलेयर परतों को नुकसान पहुँचाती हैं, जिससे परतों का फिसलना, कमजोर चिपकाव और ऑप्टिकल या इलेक्ट्रिकल गुणों की हानि होती है।
डब्ल्यूएस₂–पीडीएमएस कॉम्पोज़िट निर्माण का विकास:
इन्हीं चुनौतियों को हल करने के लिए आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने डब्ल्यूएस₂-पीडीएमएस कॉम्पोज़िट निर्माण तकनीक विकसित की है। यह एक लंबी उम्र वाली और लचीली सामग्री है जो अगले जनरेशन के वियरेबल गैजेट्स, मोड़ने योग्य स्मार्टफोन और हेल्थ मॉनिटरिंग उपकरणों को शक्ति प्रदान कर सकती है।
राष्ट्रीय महत्व:
इस नवाचार का राष्ट्रीय महत्व भी है। यह भारत के नेशनल क्वांटम मिशन में सीधे योगदान देता है, जो क्वांटम लाइट सोर्सेज़, सिंगल-फोटॉन एमिटर और सुरक्षित कम्युनिकेशन तकनीकों के लिए आवश्यक टिकाऊ 2डी मैटेरियल्स को सक्षम बनाता है। यह वैश्विक स्तर पर बढ़ती मांग – फ्लेक्सिबल इलेक्ट्रॉनिक्स, वियरेबल हेल्थकेयर सिस्टम और ऊर्जा-कुशल उपकरणों – के अनुरूप भी है। यह पहल भारत को क्वांटम कंप्यूटिंग, सुरक्षित कम्युनिकेशन और उन्नत क्वांटम मैटेरियल्स में वैश्विक नेता बनने की दिशा में अग्रसर कर सकती है।
प्रैक्टिकल उपयोग:
यह शोध फ्लेक्सिबल इलेक्ट्रॉनिक्स, वियरेबल मेडिकल सेंसर, हल्के सोलर सेल, अगली पीढ़ी के स्ट्रेन सेंसर और ट्यून करने योग्य ऑप्टिकल उपकरणों के निर्माण की मजबूत नींव रखता है।