हिमालय की तबाही की असली कहानी – संजय राणा

श्रद्धा से पर्यटन तक
लेखक : संजय राणा
लेखक पूर्व पुलिस अधिकारी, हिमालयी अंचल के अध्येता और पर्यावरण मामलों के जानकार हैं।

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हिमालय जिसे भारत की देवभूमि और जल स्रोतों की जननी कहा जाता है,आज विनाश की ओर बढ़ रहा है। इसकी बरबादी के लिए केवल वहां के निवासी नहीं, बल्कि मैदानी क्षेत्रों के लोग और हमारी उपभोक्तावादी सोच भी समान रूप से जिम्मेदार है। केंद्र और राज्य सरकारें चार धाम यात्रा को “आर्थिक विकास” और “पर्यटन प्रोत्साहन” का प्रतीक बताकर चौड़ी सड़कों, पार्किंग स्थलों और होटलों का जाल बिछा रही हैं। ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट के अंतर्गत 889 किलोमीटर सड़कें काट दी गईं, जिनसे लाखों पेड़ उजड़ गए और उनके मलबे ने नदियों को मटमैला कर दिया। परिणामस्वरूप, भूस्खलन और बाढ़ की घटनाएँ तीन गुना बढ़ चुकी हैं।

गौरतलब है कि पहले चार धाम यात्रा श्रद्धा, संयम और प्रकृति के प्रति आदर का प्रतीक थी। लेकिन अब यह मनोरंजन हेतु यात्रा बन कर रह गई है। श्रद्धालुओं की जगह “सेल्फी पर्यटक” और “लक्जरी ट्रैवलर” ने ले ली है। हर कोई “ग्लेशियर व्यू” या “रिवर फेसिंग” कमरों की चाह में नदियों और गाड़-गदेरों के किनारे निर्माण करवा रहा है। पर्यटन की इस अंधी दौड़ में पहाड़ों की प्राकृतिक संरचना बुरी तरह प्रभावित हो रही है। इस बढ़ते पर्यटन का एक छिपा हुआ और खतरनाक पहलू ब्लैक कार्बन (Black Carbon) है । यह डीजल वाहनों, जनरेटरों, लकड़ी और कोयले के धुएँ से निकलने वाला सूक्ष्म कण है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, चार धाम मार्गों पर वाहनों और होटल गतिविधियों से निकलने वाला ब्लैक कार्बन ग्लेशियरों की सतह पर जमकर सूर्य की ऊष्मा को अवशोषित करता है, जिससे बर्फ तेजी से पिघलती है। पिछले एक दशक में उत्तराखंड और हिमाचल में ऐसी 300 से अधिक ग्लेशियर झीलें (Glacial Lakes) बनी हैं, जिनके फटने का खतरा लगातार बढ़ रहा है। इसे यदि यू कहें कि उनके फटने का खतरा हमेशा बना रहता है तो कुछ गलत नहीं होगा। ये झीलें नीचे के गांवों और कस्बों के लिए विनाशकारी बाढ़ का कारण बन सकती हैं।

हिमालय की नाजुकता और मानवीय हस्तक्षेप :
हिमालय भौगोलिक रूप से अत्यंत संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र है। यहां की मिट्टी भुरभुरी, ढाल तीव्र और पारिस्थितिकी अत्यंत नाजुक है। वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमालय क्षेत्र की वहन क्षमता (Carrying Capacity) सीमित है, यानी वहां उतने ही निर्माण और मानव दबाव को सहन किया जा सकता है जितना पर्यावरण अनुमति देता है। लेकिन पिछले दो दशकों में जिस तरह से सड़कें, होटल, होमस्टे और वाहन हिमालय में बढ़े हैं, उसने उसकी सहनशक्ति को खत्म कर दिया है।जहां तक मैदानी क्षेत्रों की पर्यटन संस्कृति के प्रभाव का सवाल है,
हिमालयी राज्यों की पर्यावरणीय समस्याओं का बड़ा कारण वहां के स्थानीय लोग नहीं, बल्कि मैदानी क्षेत्रों के पर्यटक हैं। हरिद्वार, देहरादून, ऋषिकेश से लेकर बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री तक, हर वर्ष लाखों वाहन पहुँच रहे हैं। चार धाम यात्रा में श्रद्धालुओं की जगह अब “सेल्फी पर्यटकों” की भीड़ अधिक दिखाई देती है। होटल और होमस्टे मालिक पर्यटकों की “ग्लेशियर फेसिंग”, “लेक फेसिंग” और “रिवर व्यू” जैसी मांगों को पूरा करने के लिए प्राकृतिक ढलानों पर भी निर्माण कर रहे हैं। परिणामस्वरूप, नदियों और गाड़-गदेरों के किनारे सीमेंट और प्लास्टिक ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है।

अब जरा विकास के नाम पर विनाश की लीला की ओर नजर दौड़ाएं तो पाते हैं कि केंद्र और राज्य सरकारें “आर्थिक विकास” और “पर्यटन प्रोत्साहन” के नाम पर चौड़ी सड़कों का जाल बिछा रही हैं। ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट (चार धाम सड़क परियोजना) के अंतर्गत 889 किलोमीटर लंबी सड़कें काटी जा रही हैं। इस परियोजना में लाखों पेड़ काटे गए और हजारों टन मिट्टी व चट्टानें नदियों में जा मिलीं, जिससे जल धाराएँ मटमैली और अस्थिर हो गईं हैं। केदारनाथ और बदरीनाथ मार्गों पर सड़क चौड़ीकरण के कारण भूस्खलन की घटनाएँ 2010 से 2025 के बीच तीन गुना बढ़ चुकी हैं। इस सबका असर स्थानीय जीवन, जलस्रोतों और जैव विविधता पर पड़ा है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता।
श्रद्धा बनाम मनोरंजन पर यदि दृष्टिपात करें तो यह कटु सत्य है कि
चार धाम यात्रा कभी आस्था और तप का प्रतीक हुआ करती थी। लोग सीमित साधनों के साथ पैदल यात्रा करते थे, नदियों में स्नान को पवित्र मानते थे और पर्यावरण का आदर करते थे। आज की यात्रा मनोरंजन यात्रा बन गई है। और तो और शराब, डिस्पोज़ेबल प्लास्टिक, स्पीकर, डीजे और पर्यटकों की भीड़ से इस पूरे हिमालयी क्षेत्र का वातावरण अशांत हो गया है। नदियों और झरनों में कचरा डालने की घटनाएँ बढ़ी हैं। स्थानीय समाज और संस्कृति पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

होम स्टे और अंधाधुंध निर्माण की बाढ़ की बढ़ती प्रवृत्ति का परिणाम यह हुआ कि पर्यटन के बहाने हर गांव में होम स्टे खुल रहे हैं। 2010 में उत्तराखंड में जहाँ 500 से भी कम पंजीकृत होम स्टे थे, वहीं 2024 तक यह संख्या 10,000 से अधिक हो गई है। अधिकांश निर्माण नदियों और गदेरों के किनारे बिना पर्यावरणीय अनुमति के किए गए हैं। इन निर्माणों में हिमालय संस्कृति के बजाय मैदानी संस्कृति को अपनाया जा है अर्थात ईंट-रोड़ी आदि का इस्तेमाल ज्यादा किया जा रहा है। इससे भू-स्खलन, बाढ़ और जल स्रोतों के सूखने की घटनाएँ तेज़ी से बढ़ी हैं।
हिमालय अब केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि मानवीय संकट के मुहाने पर खड़ा है। यदि हमने इस उपभोगवादी पर्यटन मॉडल को नहीं रोका, तो यह श्रद्धा की भूमि विनाश की भूमि बन जाएगी। हिमालय को बचाने के लिए सख्त नीति बेहद जरुरी है जिसके तहत यात्रियों की संख्या सीमित की जाए, वाहनों और निर्माण पर नियंत्रण लगाया जाए,
यात्रा को “सस्टेनेबल टूरिज़्म” के रूप में पुनर्परिभाषित किया जाए। हिमालय की रक्षा, हमारी जल, जलवायु और जीवन सुरक्षा की रक्षा है। जब तक हम इसे श्रद्धा की भूमि मानकर नहीं चलेंगे, तब तक उसका विनाश हमारी नियति बनता जाएगा। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)

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