गाँव और पानी के लिए लड़ने वाला योद्धा : डॉ. अविनाश पोल

‘400 मिमी बारिश भी पर्याप्त है’
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कोल्हापुर के मित्र त्यागराजु ने व्हॉट्सऐप पर एक वीडियो भेजा था। उसी से सातारा के जल-योद्धा डॉ. अविनाश पोल के काम की जानकारी मिली।
सातारा के कुछ लोग रोज़ाना अजिंक्यतारा किले पर श्रमदान करते हैं। वे पानी को जमीन में उतारने का काम करते हैं, जिससे बड़ा परिवर्तन हुआ है। उत्सुकता बढ़ी। गूगल की मदद से डॉ. पोल का नंबर भी मिल गया।
डॉक्टर ने कहा— “अजिंक्यतारा तो सिर्फ एक जगह है, हम कई जगह पानी का काम कर रहे हैं।”
जून में एक दिन तय करके मैं और त्यागराजु उनके साथ गए। दो दिन का वह अनुभव अविस्मरणीय था।
एक दंतवैद्य… और इतना बड़ा परिवर्तन!
बिना किसी प्रचार-प्रसार के, बहुत शांत स्वभाव से इस दंतवैद्य ने उपेक्षित गाँवों का भविष्य वहाँ के लोगों के माध्यम से बदल दिया।
डॉ. अविनाश प्रतिदिन १८ घंटे काम करते हैं, न गुस्सा, न असहिष्णुता, न आलोचना—और न ही वे राजनीति या मीडिया के पीछे भागते हैं।
जलस्तर बढ़ाना और गाँवों की क्षमता बढ़ाना, यही ‘पानी के डॉक्टर’ का अद्भुत काम है।
ग्रामवासियों के साथ एक दिन घूमने पर ही उनके ज्ञान की गहराई समझ में आ जाती है। वे समुदाय की शक्ति और श्रमदान पर सबसे अधिक जोर देते हैं।
श्रमदान से लोगों में पानी के प्रति प्रेम, संरचनाओं के रख-रखाव और पानी बचाने की आदत विकसित होती है।
सरकारी योजनाओं को गाँव तक पहुँचाने की उनकी क्षमता, नेटवर्क और कार्यपद्धति का ज्ञान अद्वितीय है।
काम की उनकी युक्तियाँ
वे अपने व्यवसाय पर असर न होने देते हुए रोज़ हजारों लोगों से बात करते हैं, समस्याएँ सुनते हैं। दूरस्थ गाँवों से मोबाइल पर ही ग्रामसभा लेते हैं।
वे कहते हैं—
“मैं आपको आइडिया देता हूँ, पर हर काम में मेरे साथ रहने की अपेक्षा मत रखो*
उनका मत है—
“निवेश योजनाओं पर नहीं, मानव क्षमता पर होना चाहिए।”
गाँव को देखते ही वे दो तरह की जाँच करते हैं—

  1. कहाँ क्या करने से जलस्तर बढ़ेगा?
  2. कौन-कौन लोग निःस्वार्थ भाव से काम करने को तैयार हैं?
    ऐसे लोगों को पहचानकर, प्रोत्साहित कर, नेतृत्व के लिए तैयार करना—यह उनकी अनोखी कला है।
    वे कहते हैं—
    “मैं एक सरकारी प्रतिनिधि और एक ग्रामीण को जोड़ता हूँ। इसलिए हर काम में मेरी जरूरत नहीं रहती।”
    देणगी स्वीकारने का उनका नियम
    देणगी वे कभी स्वयं नहीं लेते। न ही ग्रामीणों को लेने देते हैं।
    वे कहते हैं—
    “अनुमानित खर्च के आधार पर सीधे सामग्री-सप्लायर को बैंक से भुगतान करो।”
    जालना शहर को मार्गदर्शन
    जालना शहर पानी के लिए त्रस्त था। 1500 बोरवेल सूख चुके थे। कई-कई दिनों बाद पानी मिलता था। उद्योग भी थक चुके थे। बड़े नेता आते-जाते थे, पर उपाय नहीं।
    तभी कुछ संगठनों ने एक महान व्यक्तित्व को बुलाया।
    उन्होंने शहर का दौरा किया। चारों तालाब गाद से भरे थे। सरकार जायकवाड़ी से पानी लाने पर 250 करोड़ खर्च करने वाली थी—लेकिन धरण में पानी ही नहीं!
    शहर से तीन किलोमीटर दूर घाणेवाड़ी तलाव था, जो निज़ामों के समय का था। उसमें भी गाळ (silt) थी, पर गुरुत्वाकर्षण से सीधे शहर में पानी ला सकता था।
    उस महान व्यक्ति ने कहा—
    “तालाब की गाल निकालो और वही पानी इस्तेमाल करो।”
    उसी सभा में एक मित्र ने 25 लाख की देणगी दी। कुछ घंटों में 1 करोड़ जुट गया! आगे और धन मिला। कई वर्षों तक गाद निकलती रही और शहर की पानी-समस्या सुधरती गई।
    वह महान व्यक्ति कोई अफसर नहीं, कोई उद्योगपति नहीं—
    वे थे सातारा के एक साधारण दंतवैद्य… डॉ. अविनाश पोल।
    वेळू : टँकर को ‘बाय बाय ‘
    वेळू गाँव वर्षों से टैंकर-आश्रित था। औसत 300–350 मिमी बारिश के बदले आधी ही बारिश होती थी। अभि 400 मि.मी की बारिश भी गाँव को खुश कर रही है —क्योंकि हज़ारों जलरचनाएँ तैयार थीं।
    दो नालों पर सीमेंट साखळी बंधारे, पत्थरबांध, CCTs, ड्रिप सिंचाई—सब कुछ।
    सूखी कुओं में अब पानी भर गया और सालभर पानी रहेगा।
    यह बदलाव—
    डॉ. अविनाश पोल के शांत, अदृश्य काम का परिणाम है।
    गाँव वाले कहते हैं—
    “डॉक्टर नहीं आते तो आज भी हम पिछड़े होते। वे हमारे लिए भगवान हैं।”
    अब गाँव ज़ीरो रन-ऑफ बना है।
    किसानों में आत्मविश्वास लौट आया है।
    जाखणगांव
    दस वर्षों का दुष्काळ, सुखे के कारण उपजावू 1530 हेक्टर जमीन घटकर 25 हेक्टर तक आ गई…
    गाव का नाला जिसके बहते हुए पानी से बहुत सारे किसानो की खेती होती थी लेकिन ओ गाद से भर चुका था, बंधारे बेकार हो चुके थे।
    डॉ. पोल आए, सर्वे किया और कहा—
    “ओढ़े से गाद निकालो और पानी रोकने की क्षमता बढ़ाओ।”
    ग्रामवासियों ने उत्साह से काम किया।
    के.टी. वेयर की मरम्मत खुद गाँववालों ने की।
    14 गॅबियन बंधारे बनवाये अगर एक काम सरकार से होते तो 15 लाख लगते, गाव वालो ने एक काम सिर्फ 3 लाख में किए।
    4 सालों में 48 बंधारे, 133 एकड़ में CCTs, जलस्तर बढ़ा, सिंचाई सुधरी।
    खेती पुनः खिल गई—हिरवी मिर्च, आलू, दूध उत्पादन 3000 लीटर प्रतिदिन हो गया….
    मोबाइल टॉवर आए। लोग मुंबई मे रोजगार के लिए गये थे वॊ वापस लौटने लगे।
    वे कहते हैं—
    “मुंबई मजबूरी थी, खुशी नहीं। गाँव में पानी और सुविधा होगी तो हम वापस आएंगे।”
    डॉ. अविनाश पोल की कार्यशैली
    शांत, निःस्वार्थ
    25 वर्षों से ग्रामविकास
    थकान नहीं दिखती
    कहते हैं—
    “मुझे नहीं लगता मैं काम करता हूँ—मुझसे काम होता है।”
    NGO क्यों नहीं?
    वे कहते हैं—
    “NGO बनाऊँगा तो काम में अड़चन आएगी। मै अपने आनंद के लिए एक काम करता हु!
    सरकारी अधिकारी और ग्रामीणों से अच्छे संबंध हों तो काम आसान है।”
    समस्या का निदान
    पहली यात्रा में पूरा गाँव घूमते हैं।
    वे कहते हैं—
    “जैसे मरीज का मुँह देखकर दाँतों की समस्या समझता हूँ, वैसे गाँव देखकर उसकी प्रगति का रास्ता दिखता है।”
    सरकारी योजनाओं का प्रभावी उपयोग करता हु!
    उनकी पत्नी कहती हैं—
    “मै सरकारी योजनाओं का इतना उनका ज्ञान देखकर अचंबित होती हूं।”
    दो बार वॊ किसानों को सिक्किम और चीन तक अध्ययन दौरे पर लेके गये थे वॊ भी सरकार की योजना से ।
    अजिंक्यतारा किले पर श्रमदान
    2013 से शुरू हुआ श्रमदान—अब 40 लोगों की टीम।
    7000 पौधे, 65 एकड़ में जलसंवर्धन।
    नीचे के बोरवेल 200 फुट से बढ़कर अब 40 फुट पर पानी दे रही है।
    वे कहते हैं—
    “हमारे हाथों में अपार शक्ति है—उसे पहचानना है।”
    अन्य संस्थाओं का सहभाग
    अभिनेता आमिर खान स्थापित ‘पानी फाउंडेशन’ ने डॉ. पोल काम से प्रभावित होकर उन्हे फाउंडेशन का मुख्य मार्गदर्शक बनाया है।
    सबसे बड़ा जीवन-धड़ा
    जब पूछा गया—सबसे महत्वपूर्ण धड़ा क्या सीखा?
    डॉ. पोल ने तुरंत कहा—
    सिर पर बर्फ रखो,
    जीभ पर शक्कर रखो,
    तुम निश्चित जीतोगे।….. (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)
    लेखन… Shree Padree
    (साभार : कर्नाटक से प्रकाशित किसानों की पत्रिका ‘अड्डीके ‘ के संपादक श्री पेड्री के लेख का हिन्दी अनुवाद)

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