यहां मानवाधिकारों का संघर्ष जारी है

10 दिसंबर अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस पर विशेष
लेखक : वेदव्यास
लेखक साहित्य मनीषी व वरिष्ठ पत्रकार हैं
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इस देश में एक दिन ऐसा भी है जिसके बारे में प्रायः कोई नहीं जानता। आम तौर पर लोग होली और दीवाली के बारे में जानते हैं, स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस को भी पहचानते हैं, रामनवमी और कृष्ण जन्माष्टमी को भी मानते हैं लेकिन यहां ‘मानवाधिकार दिवस‘ को कोई नहीं जानता। यहां सभी को वही दिन याद रहता है जिस दिन दफ्तर या कारोबार बंद रहता है। मानवाधिकार दिवस वस्तुतः दूसरे विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 1966 में स्वीकार किए गए एक नागरिक के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक अधिकार का घोषणा पत्र है।
हमारे वेद-पुराणों में जिस मनुष्य को केंद्र मानकर भूत, भविष्य और वर्तमान की प्रार्थनाएं की गई हैं। यह दिन उसी जीवन और जगत के महत्व की याद दिलाता है। मुसलमानों की तिलावते कुरान, ईसाइयों की बाइबिल, सिखों की जपुजी साहब, बौद्धों की धम्मपद और जैनियों की आगम और त्रिपिटक में जिस मनुष्य के लोकमंगल की कामना की गई है यह दिन उसी इंसानी बिरादरी को समर्पित है। क्योंकि मानवाधिकार दिवस किसी कैलेंडर और पंचांग में लाल स्याही से नहीं दर्शाया गया है इसलिए हमें इसे ध्यान में रखने में भी दिक्कत आती है। अतः याद रखिए कि हर वर्ष हर देश में 10 दिसंबर का दिन अब मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाया और समझा जाता है।
क्योंकि हमारा देश हजारों साल से एक गरीब देश है, निरक्षरों की प्रधानता वाला राष्ट्र है, यहां धर्म, सम्प्रदाय और जातियों के विभाजन ने सामाजिक न्याय और सामाजिक अधिकार की अवधारणाएं बदल दी हैं, इसलिए मानवाधिकार का स्वरूप यहां वैसा ही है जैसा कि ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस‘ वाली प्रचलित कहावत से हम समझते हैं। हम आज भी यथा राजा तथा प्रजा की बात मानते हैं। हम अभी तक यही सोचते हैं कि ‘हां जी हां जी, कहना, और इसी गांव में रहना।‘ हमें आज तक गरीब-अमीर होने का पता है, भाग्य और कर्म की जानकारी है, देवी-देवताओं के पते-ठिकाने मालूम हैं, सोमवार से रविवार तक की व्रत कथाएं याद हैं तथा हम अभी भी कर्तव्य की बात करते हुए भी अधिकार की कोई बात नहीं सोचते। हमें भेड़-बकरी, गाय-भैंस मक्खी-मच्छर और चराचर ग्रह-नक्षत्रों का तो पता है लेकिन हम यह नहीं जानते कि हम एक मनुष्य हैं और यह दुनिया और समय इसी मनुष्य के द्वारा बनाया और बिगाड़ा जाता है। ‘अहं ब्रह्मस्मि‘ का शताब्दियों पुराना स्वर हमें यही बताता है कि मनुष्य का जन्म एक पुण्य लाभ से होता है इसलिए तुम गौरव करो कि तुम एक मनुष्य हो। तुम्हारे पास सुनने के लिए कान हैं, देखने के लिए आंख है, चलने के लिए पांव है और काम करने के लिए दो हाथ हैं। तुम केवल रक्त और हाड़ मांस का पुतला ही नहीं हो अपितु तुम्हारे पास ज्ञान और विज्ञान को जन्म देने वाला दिल और दिमाग भी है।
अब यदि हम हजारों साल तक वेद-पुराण पढ़कर भी, चन्द्रमा तथा मंगल-ग्रह के चक्कर लगाकर भी और अणु एवं परमाणु बनाकर भी यही सोचें कि हमारा यह जीवन नरक है और हम इस धरती पर बोझ है तो यह हमारी बहुत बड़ी भूल और अज्ञानता है। हमें निरंतर इस बात पर भी सोचना चाहिए कि हम मनुष्य क्यों हैं। एक मनुष्य के नाते हमारे में और एक पशु में क्या फर्क है। हमें लगातार इस सवाल का जवाब तलाशना चाहिए कि हमें मनुष्य होने पर भी मनुष्य होने के कर्तव्य और अधिकार से कौन वंचित कर रहा है। हमें अनवरत यह खोज जारी रखनी चाहिए कि मनुष्य की लड़ाई केवल रोटी, कपड़ा और मकान की लड़ाई ही नहीं है। हमें बार-बार यह आवाज सुननी चाहिए कि हम मनुष्य हैं, एक देश के नागरिक हैं और इस धरती पर प्रकृति का वरदान हैं इसलिए हम संविधान, सरकार और सामाजिक-आर्थिक करोबार के निर्माता और नियंत्रक हैं। यह संविधान जनता के लिए हैं तथा जनता के द्वारा ही बनाया गया है। जिस तरह स्वतंत्रता हमारा अधिकार है उसी मनुष्य होने का हमारा अधिकार भी अपरिवर्तनशील है। क्योंकि इस दुनिया में और देश में मानव अधिकारों को सीमित करने वालों, बदलने वाली और नष्ट करने वाली सबसे बड़ी संगठित व्यवस्था एक राज्य शासन ही है इसलिए मनुष्य के अधिकारों की सारी लड़ाई आज सत्ता और व्यवस्था के खिलाफ है। आज अदालतों में दायर अधिकांश मुकदमों में आम नागरिक अथवा पीड़ित की शिकायत राज्य के अन्याय और अत्याचार के खिलाफ ही होती है। क्योंकि पुलिस, फौज, कानून-कायदे, जाति-धर्म के प्रपंच और धनबल-भुजबल के सारे हमले एक नागरिक अथवा मनुष्य पर राज्य शासन द्वारा ही होते हैं। क्योंकि हमारा संविधान एक लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था को हमें उससे अपने मानवाधिकारों की मांग करें, दबाव डालें और संघर्ष करें।
आज इसीलिए आदिवासी अपने जंगल, जल और जमीन के लिए लड़ रहा है, महिलाएं अपने सम्मान और सुरक्षा के लिए बात कह रही हैं, अनुसूचित जाति-जनजाति एवं अन्य पिछड़ी जातियां सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक न्याय के लिए संगठित हो रही हैं तथा बच्चे अपने बचपन को बचाने के लिए आवाज उठा रहे हैं। क्योंकि कोई इन मूलभूत मानव अधिकारों को उनसे छीन रहा है। एक सभ्य समाज में मनुष्य को उसके बुनियादी अधिकारों से वंचित करना एक प्राकृतिक अपराध है तथा कानूनन जुर्म भी है। स्वतंत्रता का अर्थ मानव अधिकारों से ही बनता है, इसीलिए हमारी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में ‘बहुजन हितायः बहुजन सुखाए की परिकल्पना की गई है। मानवाधिकार का अर्थ इस धरती पर समानता से, निर्भयता से और सभी प्रकार के उत्पीड़न से मुक्ति की याद दिलाता है। अतः लोकतंत्र का प्राण तत्व मानवाधिकार में ही निवास करता है तथा मनुष्य से उसके मनुष्य होने और बनने का यह मूल अधिकार कभी कोई शासन और शक्तिशाली नहीं छीन सकता।
भारत में मानव अधिकारों के संरक्षण तथा प्रोत्साहन के लिए 1993 में गठित ‘राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग‘ कहता है कि हमें भारत संविधान में वर्णित एक नागरिक के उन सभी अधिकारों की रक्षा करनी है जिससे वह अपनी स्वतंत्रता, विकास और भेद रहित जीवन प्रणाली को बचा सके। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के सभी संस्थान/स्वरूप/विधान और प्रवृत्तियां मानव अधिकारों के प्रति जवाबदेह हैं तथा ‘मानवाधिकार दिवस‘ हमें उस जन शक्ति का अहसास कराता हैं जो हमें प्रकृति के न्याय सिद्धांत से मिली है। अतः हमें लगातार महिला उत्पीड़़न के सभी तरह के मामलों पर, बाल अधिकार, बाल श्रम और बंधुवा मजदूरी संबंधी मामलों पर, पुलिस और सेना के सभी अमानवीय आचरण और नियम उल्लंघन के मामलों पर, हिरासत में मृत्यु, बलात्कार, उत्पीड़न एवं अमानवीय आचरण पर जंगल, जमीन और जल से वंचित किए जाने वाले मामलों पर तथा हमें एक मनुष्य की जगह दास और शोषित बनाने वाली सभी प्रवृत्तियों और मानसिकताओं के खिलाफ एकजुट होना चाहिए। हमें शिक्षित और संगठित होकर मानवाधिकार के इस अनिवार्य संघर्ष को आगे बढ़ाना चाहिए। याद रखिए कि जब विधि द्वारा स्थापित कोई राज्य और व्यवस्था धनबल, भुजबल और भ्रष्ट कार्य व्यवस्था द्वारा मनुष्य पर अत्याचार करती है तब गैर सरकारी और गैर राजनैतिक जन संगठनों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए आगे आइए, अपने मनुष्य होने के मतलब को समझिए तथा अपनी समानता पर आधारित जीवन प्रणाली और विकास के लिए एकजुट संघर्ष करिए। मानवाधिकार दिवस हमें इसी आत्मसम्मान का रास्ता दिखाता है। मानव अधिकार ही हमें सक्रिय नागरिक बनाता है तथा राज्य शासन, भूमिपति, धनपति और भ्रष्ट सामाजिक पाखण्डों से मुक्ति दिलाता है। मानव अधिकार का संघर्ष सभी प्रकार के भेदभाव और उत्पीड़न के खिलाफ आवाज है।
अतः मानवाधिकार दिवस मनाते हुए हमें उन सभी बातों पर विचार करना चाहिए कि निर्बल पर बलवान का यह हमला कैसे रोका जाए ताकि मनुष्य को एक नागरिक के रूप में जीवन-भरण और विकास के सभी रास्ते निर्भय होकर मिल सकें। (लेखक के अपने विचार हैं)

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