
प्रदूषण से सांसत में जान : अब कैसे बचेंगे प्रदूषण के चंगुल से….
लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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आज देश गंभीर वायु प्रदूषण के दौर से गुजर रहा है। इसका दुष्प्रभाव भयावह स्तर पर स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। दरअसल वायु प्रदूषण प्रमुख पर्यावरणीय समस्याओं में से एक है जिसका प्राणी जगत पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। चूंकि वायु पृथ्वी पर जीवन का एक महत्वपूर्ण और आवश्यक तत्व है, जीवन का आधार है, इससे प्राणी एवं जीव-जंतुओं को आक्सीजन प्राप्त होती है। लेकिन आज उसी पर भीषण संकट मंडरा रहा है। सच कहें तो इस संकट के लिए इंसान ही दोषी है जो हकीकत में इस संकट का जन्मदाता है। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। निष्कर्ष यह कि वायु प्रदूषण के लिए मानवजनित स्रोत ही वे अहम तत्व हैं जो बाहरी तत्वों से मिलकर वायु की गुणवत्ता में कमी लाते हैं जो मानव जाति और जीव-जंतुओं के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। इसी जानलेवा हवा में कार्बन डाई आक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड, सल्फर डाई आक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड, क्लोरीन, सीसा, अमोनिया, कैडमियम, धूल आदि मानवजनित वायु प्रदूषक तत्वों की अहम भूमिका होती है।

हमारा देश दुनिया के प्रदूषित देशों की सूची में शामिल है। यहां हर साल तकरीबन 20 लाख से ज्यादा लोग प्रदूषित हवा के चलते मौत के मुंह में चले जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज 93 फीसदी बच्चे प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। दरअसल इंसान ने आधुनिकता और वैज्ञानिकता के नाम पर प्रकृति का इतना अधिक दोहन किया है जिसके फलस्वरूप हमारे पंचमहाभूत जैसे धरती, आकाश, अग्नि, जल और वायु इस स्तर तक प्रदूषित हो गये हैं जिसके कारण प्राणीमात्र का जीना दूभर हो गया है। ये पांच तत्व हिन्दू धर्म और आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्मांड और मानव शरीर के आधार माने जाते हैं। दुखदायी तो यह है कि यह सब जानते-समझते हुए भी कि वायु प्रदूषण जानलेवा है और इस पर नियंत्रण समय की मांग है लेकिन फिर भी हम मौन हैं या यूं कहें कि इसके आगे हम खुद को बेबस पा रहे हैं। क्योंकि इस बाबत जैसे कि दावे किए जा रहे हैं, को मद्देनजर कोशिशें तो बराबर की जा रही हैं लेकिन उनका सुफल नगण्य है, आखिर क्यों? यह समझ से परे है। इसके पीछे अन्य कारकों के अलावा संतुलित जीवन शैली का अभाव अहम है जिसके चलते हमारी जिंदगी सांसत में है। ऐसा लगता है कि हम इसके आगे असहाय हैं और मौत को हम खुद-ब-खुद आमंत्रण दे रहे हैं।
दरअसल वायु गुणवत्ता का पृथ्वी की जलवायु और वैश्विक पारिस्थितिकीय तंत्र से गहरा संबंध है। वायु प्रदूषण में सर्वाधिक योगदान जीवाश्म ईंधन और बायोमास के जलाने से होता है जो परिवहन, ऊर्जा उत्पादन, विनिर्माण और कृषि क्षेत्रों में होते हैं। इन गतिविधियों से निकलने वाली गैसें जैसे कार्बन मोनोक्साइड, कार्बन आक्साइड, नाइट्रोजन डाय आक्साइड तथा सूक्ष्म कण पार्टिकुलेट मैटर यानी पी एम वायुमंडल को प्रदूषित करते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो यह साबित हो चुका है कि गरीब और मध्यम आय वर्ग के देश घरेलू और बाहरी दोनों तरह के वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। फिर भारत जैसे देश में अधिकतर जनसंख्या राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों से ज्यादा प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर है। यह काफी चिंताजनक है। वैज्ञानिक विश्लेषणों से यह साबित हो चुका है कि कोयला और परिवहन उत्सर्जन के दो प्रमुख स्रोत हैं। नाइट्रोजन आक्साइड यानी एन ओ 2 भी पी एम 2.5 ओजोन के बनने में अपना योगदान देते हैं। यह भी सच है कि ये दोनों वायु प्रदूषण के सबसे खतरनाक रूपों में बड़े भूभाग को प्रभावित करते हैं। हमारे देश में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, सोनभद्र, सिंगरौली, कोरबा तथा ओडिशा का तेलचर क्षेत्र दुनिया के उन एन ओ 2 हाटस्पाट वाले 50 शहरों की सूची में शामिल हैं जो ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र में जीवाश्म ईंधन जलने का वायु प्रदूषण से सीधा संबंध प्रमाणित करते हैं।

यह भी किसी से छिपा नहीं है कि वायु प्रदूषण से जुड़ी होने वाली स्वास्थ्य समस्यायें अक्सर एयरोसोल से जुड़ी होती हैं। एयरोसोल हवा में निलंबित सूक्ष्म ठोस या तरल लवण होते हैं जो अक्सर दिखाई नहीं देते। इनका निर्माण प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों स्रोतों से होता है। इनका आकार कुछ नैनोमीटर से लेकर कई माइक्रोमीटर तक हो सकता है। एयरोसोल मानव आंखों को मुश्किल से दिखाई देते हैं। इसे कणों के आधार पर पी एम 2.5 आदि नामों से जाना जाता है। एयरोसोल में यह धुंआ, कोहरा और औद्योगिक प्रदूषण कण हैं। ये कण वायुमंडल में निलंबित धूल, समुद्री नमक, ज्वालामुखी की राख, धुंआ, पेड़ों से निकलने वाला रसायन और विभिन्न प्रकार के उत्सर्जन जैसे जीवाश्म ईंधन जलने यथा कारों और कारखानों से निकलने वाला प्रदूषण और औद्योगिक प्रदूषण आदि रूपों में पाया जाता है। यह जलवायु, मौसम और स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। एयरोसोल में मौजूद विषाक्त पदार्थ शरीर में विषाक्तता सम्बंधित प्रतिक्रियाओं को जन्म देते हैं। एयरोसोल रसायनों के चलते श्वसन सम्बंधी, लीवर,तंत्रिका तंत्र ,आंख और त्वचा की समस्या पैदा होती है। इसके लम्बे समय तक संपर्क में रहने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। यहां तक कि इसके प्रभाव से पौधे और जानवर भी अछूते नहीं रह गये हैं। एयरोसोल के कण फेफड़ों में जलन पैदा कर सकते हैं और अत्याधिक सान्द्रता के कारण श्वसन तंत्र को अवरुद्ध भी कर सकते हैं। यहां तक कि यह मृत्यु का कारण भी बन सकते हैं। इसके सूक्ष्म कणों से होने वाले वायु प्रदूषण से हृदय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है। इस बारे में मेदांता में इंटरनल मेडिसिन रेस्पेरेटटी एण्ड स्लीप मेडिसिन के अध्यक्ष व एम्स दिल्ली के पूर्व निदेशक डा 0 रणदीप गुलेरिया कहते हैं कि वायु प्रदूषण आपके फेफड़े, दिल, दिमाग ही नहीं, पूरे शरीर को नुकसान पहुंचाता है। शरीर का कोई अंग ऐसा नहीं है जो इसके प्रभाव से अछूता हो।
असलियत में देश में अब वायु प्रदूषण केवल सर्दियों के मौसम का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि सालभर जारी रहने वाला गंभीर स्वास्थ्य खतरा बन चुका है। इस बाबत देश के 80 से ज्यादा पद्म पुरस्कार प्राप्त डाक्टरों ने चिंता जाहिर करते हुए कुछ सुझाव दिये हैं। उनके अनुसार भारत में सभी श्वसन संबंधी मौतों में से एक तिहाई से अधिक वायु गुणवत्ता से जुड़ी हैं। इसके अलावा स्ट्रोक से होने वाली लगभग 40 फीसदी मौतों के लिए वायु प्रदूषण जिम्मेदार है। उन्होंने कहा है कि जिन परिवारों के पास एयर प्यूरीफायर नहीं है, उनको रोजाना गीले कपड़े से सफाई करना, अगरबत्ती, धूपवत्ती, कपूर और मास्को कौइल से बचना चाहिए। रसोई में उचित वेंटिलेटर रखना, ट्रिपिंग लेयर मास्क उपयोग करना और बाहर की गतिविधियों में कमी लानी चाहिए। उनकी सलाह है कि बच्चे उच्च एक्यूआई वाले दिनों में बाहर खेलने और स्कूल एसेम्बली में शामिल होने से बचें। उन्होंने सरकार से गंभीर प्रदूषण के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने, ग्रैप के मानकों को वैज्ञानिक आधार पर संशोधित करने, औद्योगिक उत्सर्जन, कचरा जलाने और डीजल आधारित जेनरेटर पर कड़ा नियंत्रण करने की मांग की है ताकि हवा साफ हो सके। हालात की भयावहता का सबूत यह है कि देश की 70 फीसदी से ज्यादा आबादी रोजाना असुरक्षित हवा में सांस ले रही है। प्रदूषण का असर अब दमा, हृदय रोगों से भी कहीं आगे बढ़ गया है। अब यह कैंसर और मेटाबोलिक विकार को भी पार कर गया है। अब वातावरण में मानक से भी ढाई गुणा प्रदूषक कण मौजूद हैं। यह खतरनाक स्थिति है।

यदि देश की राजधानी दिल्ली की बात करें तो दिल्ली वासी पिछले तीन महीनों से प्रदूषित जानलेवा हवा में सांस ले रहे हैं। हालात की गंभीरता का प्रमाण यह है कि डाक्टर दिल्ली वालों को कुछ दिनों के लिए पहाड़ी राज्य जाने की सलाह दे रहे हैं। विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र की मानें तो दिल्ली में हानिकारक जहरीली गैसों यथा नाइट्रोजन डाय आक्साइड और कार्बन मोनोक्साइड का स्तर लगातार बढ़ रहा है। राजधानी के प्रदूषण में लगभग 51.5 फीसदी योगदान वाहनों के उत्सर्जन का है। इसके बाद आवासीय उत्सर्जन और दूसरे कारक जिम्मेदार हैं। राजधानी में मुख्य रूप में प्रदूषण वाहनों और दहन स्रोतों से हो रहा है। हकीकत में दिल्ली के तकरीबन 11 से अधिक स्थानों पर एक्यूआई 400 के पार है। सीपीसीबी इसकी पुष्टि करता है। जबकि जैसा कि अक्सर प्रदूषण के लिए पराली को जिम्मेदार ठहराया जाता है लेकिन पिछले पांच सालों में पराली 70 फीसदी कम जली है। इस बार तो पराली के धुएं का योगदान पांच फीसदी से भी कम रहा है। इससे जाहिर होता है कि दिल्ली एनसीआर में जहरीली हवा के पीछे अब पराली नहीं है, जबकि अभीतक इसका ठीकरा पड़ोसी राज्यों के किसानों पर फोड़ा जाता रहा है, बल्कि इसके लिए स्थानीय प्रदूषण के बढ़ते स्रोत जिम्मेदार हैं। उन्हीं के चलते राजधानी की आबोहवा खराब हुयी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि कोरोना के दौरान भी पराली जलायी जा रही थी, तब राजधानी का आसमान कैसे नीला दिख रहा था। वायु गुणवत्ता प्रबंधन के अनुसार दिल्ली की 35 मुख्य सड़कों पर सबसे ज्यादा धूल मौजूद है। इनमें अधिकांश सड़कें दिल्ली नगर निगम के अंतर्गत आती हैं। टूटे फुटपाथ और गड्ढे वाली सड़कें धूल से अटी रहती हैं। यह धूल वाहनों के पहियों से लिपट कर उड़ती है और पूरे वातावरण में भर जाती है। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत व न्यायमूर्ति जायमाल्या बागची की आला पीठ ने सही ही कहा है कि वायु प्रदूषण की समस्या को अब सिर्फ सर्दियों की मुसीबत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। वायु प्रदूषण अब एक गंभीर समस्या का रूप ले चुका है। अब इसका फौरी निदान के बजाय दीर्घकालिक उपाय ढूंढना जरूरी हो गया है। सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि कि मामला बेहद गंभीर है,इसलिए कोर्ट इस बाबत हर महीने दो बार सुनवाई करेगी।
गौरतलब यह है कि राजधानी समेत देश के तमाम बड़े शहर प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। उस हालत में जबकि बरसों के इस बाबत प्रयास और करोड़ों-करोड की राशि स्वाहा होने के बाद भी राहत की कोई किरण दिखाई नहीं दे रही। आखिर क्यों ? यह समझ से परे है। ठीक गंगा-यमुना की निर्मलता के दावे की तरह, बीते चार दशक इसके जीते जागते सबूत हैं। जबकि शुद्ध हवा और शुद्ध पानी दोनों जीवन के अनिवार्य तत्व हैं। जाहिर है इनकी अनिवार्यता का कोई विकल्प नहीं है। जाहिर है इसके लिए संकीर्ण राजनीति और तंत्र की नाकामी जिम्मेदार है। इसे नकारा नहीं जा सकता। साथ ही इसके लिए देश का आमजन भी कम जिम्मेदार नहीं है। उसके योगदान को भी नकारा नहीं जा सकता। यहां इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता कि आज जब दुनिया के कई शहर प्रदूषण मुक्त हो चुके हैं और वहां की नदियां प्रदूषण मुक्त होकर कलकल बह रही हैं, उस दशा में हम क्यों नाकाम हो रहे हैं। यह चिंतनीय तो है ही, विचार का भी विषय है। हालात को देखते हुए तो ऐसा लगता है कि तंत्र तो इस बाबत फेल हो चुका है या उसने इसे अपनी कमाई का जरिया बना लिया है। इसीलिए वह कुछ करना नहीं चाहता और देशवासियों को मौत के मुंह में ढकेल रहा है। अब तो आखिरी उम्मीद सुप्रीम कोर्ट से ही है जिसपर देशवासियों को स्वस्थ व गरिमामयी जीवन देने की जिम्मेदारी है। बीता इतिहास गवाह है कि उसने दशकों लम्बे विवादों को निपटाने में पिछले बरसों में अहम भूमिका निबाही है। उम्मीद है कि आने वाले समय में देशवासी सुप्रीम कोर्ट के जरिये खुली और साफ हवा में सांस ले सकेंगे। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)