
लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और सत्तारूढ़ तेलुगु देशम पार्टी के सुप्रीमो चन्द्र बाबू नायडू इस बात को पुख्ता कर देना चाहते है कि अमरावती स्थाई रूप से राज्य की राजधानी होगी तथा इसमें बदलाव की कोई गुंजाईश नहीं होगी . इसके लिए उनके सुझाव पर केंद्रीय सरकार जल्द ही संसद में 2014 बने आंध्र प्रदेश पुनर्गठन कानून में संशोधन कर यह जोड़ा जायेगा कि राज्य की राजधानी अमरावती होगी . मूलतः यह कानून राज्य का विभाजन कर एक अलग प्रदेश तेलंगाना बनाने के लिए बनाया गया था . इस कानून के अंतर्गत अविभाजित आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद तेलंगाना के हिस्से में आई थी। यह कहा गया था कि आंध्र प्रदेश को अगले दस साल के भीतर अपनी अलग राजधानी बना लेनी होगी . तब तक हैदराबाद दोनों प्रदेशों की राजधानी बनी रहेगी।
विभाजन के बाद नायडू आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रहे .उनकी सरकार ने राज्य की राजधानी बनाये जाने की कवायद शुरू भी कर दी। लम्बी कवायद के बाद अमरावती को राज्य की राजधानी बनाये जाने के लिए चुना गया . उस समय तेलुगु देशम पार्टी एन डी. ए. का हिस्सा थी। बाद नायडू ने अपनी पार्टी को इस गठबंधन से अलग कर लिया . नायडू ने कहना था कि राजधा नी हरित होगी तथा यह एक विश्व स्तरीय शहर होगा। विदेशों से बुलाये गए वास्तुकारों ने इस परियोजना को अंतिम रूप दिया . इसे दो चरणों में बनाया जाना था . पहले चरण पर लगभग पचास हज़ार करोड़ रूपये खर्च होने का अनुमान था . राज्य विधानसभा ने नई राजधानी के लिए एक विधिवत कानून भी पारित किया गया ताकि भूमि अधिग्रहण में कोई अड़चन नहीं आये , किसानों को न केवल बाज़ार भाव से उनकी जमीनों का मुयावाज़ा मिला बल्कि उनको नए शहर में एक आवासीय घर बनाने का वायदा भी किया गया। उस समय नायडू सरकार को यह उम्मीद थी कि उन्हें केंद्र सरकार से इस ओर से इस परियोजना के लिए वित्तीय सहायता मिलेगी। पहले चरण का काम अगले पांच साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन केन्द्र् से अपेक्षित राशि नहीं मिलने तथा भूमि अधिग्रहण में विलंब के चलते योजना का काम धीमा हो गया। विदेशी वित्तीय संस्थायों ने भी इस परियोजना को धन उपलब्ध करवाने से हाथ खींच लिया। फिर भी राज्य सरकार ने अपने स्रोतों से इस योजना के लिए धन जुटा कर 2019 तक इस योजना पर कुल 15 ,000 करोड़ रूपये खर्च किये। विधानसभा भवन, सचिवालय तथा हाई कोर्ट सहित कई अन्य सरकारी भवनों का लगभग एक तिहाई काम पूरा हो गया . नायडू के पार्टी को भरोसा था कि 2019 के चुनावों के बाद वह फिर सत्ता में आयेगी . लेकिन इन चुनावों में वाई एस आर पी सत्ता में आई तथा जगन मोहन रेड्डी राज्य के मुख्यमंत्री बने . उनकी सरकार ने सत्ता संभालते ही पहला काम इस परियोजना को रोकने का किया . रेड्डी ने कहा कि वे शासन का विकेंद्रीकरण किया जाने पर विश्वास करते है . उन्होंने कहा कि राज्य की एक नहीं बल्कि तीन राजधानियां होगी. अमरावती विधायी कुरनूल न्यायनिक तथा विशाखापतनम प्रशासनिक राजधानी होगी. इसी अधर पर विधान सभा में एक कानून भी पारित करवा लिया गया . इस पर काम शुरू होने से पहले ही इस नए कानून को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई . हाई कोर्ट ने इस नए कानून को गैर कानून घोषित कर दिया . राज्य सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जहाँ मामला लम्बे समय तक लंबित रहा . इसी बीच विधानसभा के चुनाव आ गए . नायडू और एन डी. ए. फिर सत्ता में आ गए . चुनावों में यह . उन्होंने सत्ता में आते ही कहा कि राज्य की राजधानी अमरावती ही होगी . रेड्डी सरककर के समय तीन राजधानियों के कानून को रद्द कर दिया गया . उधर केंद्र में तीसरी बार सत्ता में आई एन. डी. ए. सरकार ने अपने पहले ही बजट में इस परियोजना के लिए 15,000 ककरोड़ रूपये देने की घोषणा की. नायडू ने घोषणा की कि पहले चरण का काम तीन साल में पूरा कर लिया जायेगा।
नायडू सरकार के भय सता रहा था कि अगर अगली बार तेलुगु सरकार सत्ता में नहीं आई तो अगली साकार उनकी इस योजना को बंद कर सकती है .उन्होंने केंद्रीय सरकार को से आग्रह किया कि 2014 के आंध्र प्रदेश पुनर्गठन कानून में संशोधन कर करके यह जोड़ दिया जाये कि आंध्र प्रदेश की नई राजधानी अमरावती ही होगी . इसके चलते राज्य में आने वाली कोई भी सरकार इस योजना को आसानी से रोक नहीं पायेगी . कानून प्रारूप तैयार है तथा उम्मीद की जा रही है संसद कि बजट सत्र पारित करवा लिया जायेगा। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)