
हिमालयी ग्लेशियर :
लेखक : संजय राणा
लेखक ख्यात समाज विज्ञानी एवं पर्यावरणविद हैं।
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जैसे जैसे शरद ऋतु अपने ढलान पर है और ग्रीष्म ऋतु दस्तक दे रही है, ऐसे में हिमालय की गोद में बसे भारत, नेपाल, भूटान और तिब्बत के पर्वतीय क्षेत्रों पर विनाश का खतरा मंडराने लगा है। मौजूदा हालात इसकी गवाही देते दिखलाई देने लगे हैं। इनमें भारत के उत्तराखंड और सिक्किम जैसे राज्य सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं। दुनिया के शोध – अध्ययन इस बात के जीते – जागते सबूत हैं। दरअसल जलवायु परिवर्तन की बढ़ती रफ्तार अब हिमालय की गोद में भी चिंता का विषय बन चुकी है। नवीनतम वैज्ञानिक सी डब्ल्पू सी अध्ययन बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्र में 426 ग्लेशियर-स्रोतित झीलें बन चुकी हैं। इनमें से कई को “संभावित रूप से खतरनाक” यानी पोटेशियम डेनमार्क ग्लेशियर लेक्स की श्रेणी में रखा गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इनमें से कोई झील फटती है, तो कुछ ही मिनटों में नीचे की घाटियों में तबाही मच सकती है। हालात इसके सबूत हैं कि पिघलते ग्लेशियरों से बनने वाली नई झीलों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। असलियत यह है कि हिमालय के ग्लेशियर लगातार पीछे हट रहे हैं। इनसे निकलने वाला पानी जब घाटियों में जमा होता है, तो मोराइन या बर्फीले अवरोध के पीछे वह झील का रूप ले लेता है। समय के साथ दिनोंदिन इन झीलों का आकार और गहराई बढ़ती चली जाती है, जिससे उनमें जल-दबाव भी बढ़ता जाता है।
यदि किसी कारण—जैसे भूकंप, भूस्खलन या भारी वर्षा से ये प्राकृतिक बाँध टूट जाएं, तो ग्लेशियर झील फूटने से उत्पन्न बाढ़ नीचे की बस्तियों, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं को तबाह कर सकती है। ल्होन्सक झील का हादसा इसका जीता-जागता सबूत है।
केदारनाथ – चमोली हादसे ने हमें चेतावनी दे दी है कि अब भी समय है,संभल जाओ। चेतावनी की दृष्टि से 2013 के केदारनाथ-चमोली हादसे ने हमें भावी खतरे के प्रति सचेत किया है। अभी तक उसकी हृदयविदारक स्मृतियां स्मृति पटल से ओझल होने का नाम नहीं ले रहीं।
इस घटना ने समूचे देश को हिला कर रख दिया था। गौरतलब है कि चमोली जिले में 7 फरवरी 2021 को धौलीगंगा घाटी में आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे देश को झकझोर दिया था। उस घटना में कई दर्जन लोगों की जान गई और दो जलविद्युत परियोजनाएँ बह गईं।
विशेषज्ञों का मानना है कि उक्त घटनाएं हिमालय में हो रही भौगोलिक अस्थिरता और ग्लेशियर-संबंधी परिवर्तनों की चेतावनी थी।
सीमापार खतरा: पाँच देशों के प्रभावित होने का खतरा :
देखा जाये तो हिमालय केवल भारत तक ही सीमित नहीं है। यह पर्वत-श्रृंखला नेपाल, भूटान, चीन (तिब्बत) और पाकिस्तान तक फैली है। इन सभी देशों में ग्लेशियर झीलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यदि किसी ऊँचाई वाली झील का बाँध टूट जाए, तो उसका पानी सीमाओं को पार कर नीचे के क्षेत्र में बाढ़ ला सकता है। इनमें भारत, नेपाल और भूटान के कई हिस्से ब्रह्मपुत्र और गंगा बेसिन में आने के कारण सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। वैज्ञानिकों और पर्यावरण विज्ञानियों की चिंता का सबब यही है। हकीकत में भारत के पर्वतीय राज्य सबसे अधिक संवेदनशील हैं। उनमें
हिमालय के किनारे बसे भारत के पाँच राज्य इस खतरे की सीधी जद में हैं। उत्तराखंड को लें, यहां धौलीगंगा और अलकनंदा घाटियाँ पहले से ही जोखिमग्रस्त श्रेणी में मानी जाती हैं। हिमाचल प्रदेश में चंद्रा, भागा और स्पीति घाटियों में कई झीलें तेजी से फैल रही हैं।
सिक्किम में पूर्वी हिमालय की झीलें आकार में बढ़ रही हैं, जहाँ कई जलविद्युत परियोजनाएँ स्थित हैं। अरुणाचल प्रदेश में ब्रह्मपुत्र की ऊपरी सहायक नदियों में संभावित बाढ़ का खतरा बना ही रहता है। लद्दाख और जम्मू-कश्मीर में कराकोरम और ज़ंस्कार घाटियों में भी कई अस्थिर झीलें पाई गई हैं। दरअसल वैज्ञानिक गंगा बेसिन, ब्रह्मपुत्र बेसिन और इंडस बेसिन में सबसे ज्यादा खतरे की आशंका व्यक्त कर रहे हैं। इनमें गंगा बेसिन में उत्तराखंड से निकलने वाली अलकनंदा, धौलीगंगा और भागीरथी नदियाँ, ब्रहमपुत्र बेसिन में सिक्किम, भूटान और अरुणाचल प्रदेश की ऊँचाई वाली झीलें और इंडस बेसिन के तहत लद्दाख और जम्मू-कश्मीर की सहायक नदियाँ सर्वाधिक प्रभावित हैं। इन घाटियों में घनी आबादी और जलविद्युत परियोजनाएँ होने के कारण संभावित नुकसान का खतरा अधिक हो सकता है।
विशेषज्ञों की सलाह है कि ऐसी स्थिति में इस समूचे अंचल में निगरानी तंत्र और चेतावनी प्रणाली बेहद जरूरी है। वैज्ञानिकों का तो यह भी कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में हर वर्ष उपग्रह-आधारित सर्वे से झीलों की स्थिति की निगरानी की जानी चाहिए। सेंट्रल वाटर कमीशन यानी सी डब्ल्यू सी और आईसीआईएमओडी जैसी संस्थाओं ने खतरे को देखते हुए कुछ झीलों को ‘अत्यधिक संवेदनशील’ श्रेणी में रखा है। विशेषज्ञों की सलाह है कि संभावित खतरनाक झीलों की पहचान कर वहाँ लोकल अलार्म सिस्टम स्थापित किए जाएँ।
जोखिम मानचित्रण किया जाए ताकि नीचे बसे गाँवों और परियोजनाओं को समय रहते चेताया जा सके। इंजीनियरिंग उपायों से कुछ झीलों से नियंत्रित जल- निकासी की व्यवस्था की जाए। क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाया जाए, क्योंकि यह समस्या सीमाओं से परे है। असली समस्या तो जलवायु परिवर्तन की है। पिछले तीन दशकों में हिमालय के औसत तापमान में लगभग 0.4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। इससे ग्लेशियरों का पिघलना तेज हुआ है और झीलों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यह रुझान जारी रहा तो आने वाले दो दशकों में ऐसी झीलों की संख्या दोगुनी हो सकती है। हमें यह गौर करने की बात है कि हिमालय की सुरक्षा, मानवता की सुरक्षा है। और हिमालय केवल बर्फ की चोटियों का एक समूह नहीं है, बल्कि वह दक्षिण एशिया की करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है। गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियाँ इसी से जन्म लेती हैं। यदि हिमालय का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता है, तो इसका असर मैदानों में बसे करोड़ों लोगों पर पड़ेगा। 426 झीलों की यह चेतावनी हमें याद दिलाती है कि जलवायु परिवर्तन अब दूर का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान का भीषण संकट बन चुका है। इसकी अनदेखी भयावह विनाश का सबब बनेगी। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)