सिंघानिया विश्विद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर (डॉ.) सोहन राज तातेड़ आधुनिक युग के एक प्रमुख शिक्षाविद्, योगवेत्ता, पर्यावरण सर्जक, विशिष्ट वक्ता और अध्यात्म गुण गौरव युक्त शिक्षा जगत से जुड़े हुए मूर्धन्य विद्वान है। इनके आलेख आपको हमारे वेबपोर्टल पर समय-समय पर पढ़ने के लिए मिलते रहेंगे। हमने तातेड़ साहब से अपने सुधि पाठकों के लिए ये आग्रह किया था, जिसको उन्होंने सम्मानपूर्वक मानते हुए अपने आर्टिकल पब्लिश हेतु भेजे। हम आभारी हैं प्रोफेसर (डॉ.) सोहन राज तातेड़ जी के। -संपादक

लेखक : प्रोफेसर (डॉ.) सोहन राज तातेड़
पूर्व कुलपति सिंघानिया विश्वविद्यालय, राजस्थान
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मोती प्राप्त करने के लिए मानव को समुद्र की गहराई में जाकर उसे ढूंढना पड़ता है। समुद्र के अन्दर अनेक घातक जीव रहते है जो मानव को पलक झपकते ही अपना निवाला बना सकते है। परन्तु अगर सुरक्षित समुद्र से निकल आये तो गोताखोर मोती को प्राप्त कर लेते है। इसी प्रकार किसी भी अच्छी चीज को प्राप्त करने के लिए मानव को प्राण का भय भी रहता है और वस्तु के प्राप्त हो जाने पर मालामाल हो जाने का सौभाग्य भी प्राप्त रहता है। अतः बिना जोखिम के अच्छी चीजों को प्राप्त नहीं किया जा सकता। जो लोग प्राण जाने के भय से डरकर समुद्र के किनारे बैठे रहते है या किसी भी प्रकार का रिस्क नहीं लेते सफलता उनसे कोसों दूर रहती है। जीवन के हर पहलू पर इसे आजमाकर देखा जा सकता है। विद्यार्थी जब प्रतियोगात्मक परीक्षा की तैयारी के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर कर संलग्न हो जाते है तो उनके सामने यही उक्ति रहती है। यदि वे परीक्षा में सफल हो गये तो जीवनभर आनन्द ही आनन्द है और यदि परीक्षा में सफलता नहीं मिली तो जीवन कष्टप्रद रह सकता है। पपीहा पक्षी बड़ा ही स्वाभिमानी होता है। वह केवल स्वाती नक्षत्र के जल को ही पीता है और अन्य नक्षत्रों में जो वृष्टि होती है उसके जल को वह पान नहीं करता। उसको यह भरोसा रहता है कि वृष्टि अवश्य होगी और उसकी प्यास बुझेगी। आशा की किरण लेकर वह जीता है और उसको यह भरोसा रहता है कि स्वाती नक्षत्र की जल की बूंद उसके मुख में जायेगी और वह जल से तृप्त होगा। स्वाती नक्षत्र में सीप के मुंह में गीरा हुआ जल मोती बन जाता है। मनुष्य को किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ता है। यदि परिश्रम सार्थक दिशा में होता है तो सफलता अवश्यंभावी है। यदि किसी कारणवश सफलता न भी मिले तो यह देखना चाहिए कि हमारे परिश्रम में क्या कमी रह गयी। लक्ष्य का निर्धारण करते समय मानव को अपनी शक्ति और संकल्प पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए उसे निराश नहीं होना चाहिए। मानव जीवन पृथ्वी के सम्पूर्ण जीव योनियों में सर्वश्रेष्ठ है। मानव जीवन सुकर्म करने से प्राप्त होता है। अतः सदाचार पूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहिए। चोरासी लाख जीव योनियों में स्थान, योनि, गति, नारक, तिर्यक, मनुष्य और देव योनि प्रमुख है। पृथ्वी के गर्भ में नारकिय जीवों का निवास है। जो कुत्सित कर्म या बुरा कर्म करते है उन्हीं को यह योनि प्राप्त होती है। पृथ्वी पर मनुष्य और तिर्यक देवलोक में देवयोनि के लोग रहते है। जो जैसा कर्म करता है उसको वह योनि प्राप्त होती है यह शास्त्र सिद्ध है। होनहार विरवान के होत चीकने पात अर्थात् जो पौधा आगे चलकर के विकसित होता है उसके पत्ते छोटे रहने पर भी चीकने और वृद्ध को प्राप्त होते हुए से दिखाये देते है। महापुरूषों की संगति उनके प्रवचन और आशीर्वाद से मानव जीवन सत्कर्मों की और उन्मुख होता है और जो सत्कर्म करता है उसका परिणाम भी अच्छा ही होता है। जिस प्रकार से बाह्य जगत है वेसे ही मानव का आंतरिक जगत भी है। मानव का आन्तरिक जगत् आत्मतत्व प्रधान है। आत्मा सर्वज्ञाता है, उसका ज्ञान सर्वव्यापक है। किन्तु वह दिखायी नहीं देता, केवल उसकी प्रतीति होती है। योगी लोग आत्मतत्व को अपने योग के द्वारा जान लेते है और परोक्ष रूप से उसका दर्शन भी कर लेते है। चर्म चक्षुओं से केवल बाह्य संसार दिखायी देता है। स्थूल से स्थूल को ही देखा जा सकता है, सूक्ष्म को नहीं देखा जा सकता। जिसकी अन्तःप्रज्ञा जागृत होती है केवल वहीं उस सूक्ष्म तत्व को जान सकता है और देख सकता है। द्रौपदी के स्वयंवर की कथा इस संबंध में विचारणीय है। जिस समय द्रौपदी का स्वयंवर रचा गया, उस समय देश-विदेश के बड़े-बड़े राजा महाराजा उपस्थित हुए। सब ने स्वयंवर के लिए जो शर्त रखी गयी थी, उसे पूरा करने का प्रयास किया। किन्तु सब का प्रयास निष्फल गया। धनुर्धर अर्जुन भी स्वयंवर में उपस्थित थे। जब लक्ष्य भेदने के लिए अर्जुन गये तो अर्जुन से पूछा गया कि इस समय क्या देख रहे हो। अर्जुन ने कहा कि मैं इस समय मछली की आंख देख रहा हूं जिसे वाण से भेदना है और सभी योद्धाओं ने इस प्रश्न का यह उत्तर दिया था कि मैं मछली को देख रहा हूं। सभी यौद्धाओं के उत्तर और अर्जुन के उत्तर में महान अन्तर दिखलायी देता है। जब मुकाबला प्रतिस्पर्धा पूर्ण हो तो लक्ष्य के प्रति सजगता बहुत आवश्यक है। अगर सभी राजाओं की तरह अर्जुन भी लक्ष्य के प्रति असावधान होते तो हो सकता है कि सफलता उनका वरण न करती। किन्तु अर्जुन लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पित होकर लक्ष्य का भेदन किये और लक्ष्य प्राप्ति में सफल रहे। इससे यह सिद्ध होता है कि सफलता प्राप्त करने के लिए पूर्ण मनोयोग से लक्ष्यबद्ध होना पड़ता है। तभी सफलता प्राप्त होती है। हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी भी जिस कार्य में सलंग्न होते है, उस कार्य को पूर्ण मनोयोग के साथ करते है और सफल होते है। कोई कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता, कार्य को किस दृष्टि से किया जाता है, यह महत्वपूर्ण होता है। छोटे से कार्य को भी पूर्ण मनोयोग के साथ करना चाहिए। देश के विकास के लिए अनेक योजनाएं चाहे छोटी हो या बड़ी चलायी जा रही है। योजनाओं का सम्बन्ध देश के विकास से है। जब देश का विकास होगा, देश में खुशहाली आयेगी और सभी नागरिकों को आत्मसम्मान के साथ जीवन व्यतीत करने का मोका मिलेगा। अतः कोई भी कार्य हो पूर्ण मनोयोग के साथ करना चाहिए। ऐसा करने से सफलता अवश्य प्राप्त होती है। (लेखक के अपने विचार हैं)