हमारी पहचान “अनेकता में एकता” है – सुरेश भाई

लेखक : सुरेश भाई
लेखक, प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता, गांधीवादी विचारक एवं पर्यावरणविद हैं।
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अनेकता में एकता” भारत की एक पहचान है। जहां किसी भी धर्म, जाति और भाषा के मतभेदों को भुलाकर लोग भाईचारा और आपसी सहयोग का अटूट संदेश देते हैं। इतिहास में ऐसी अनेकों घटनाएं हैं, जिसने सामाजिक सद्भावना के साथ विकसित और मजबूत समाज का निर्माण किया है जो राष्ट्र की प्रगति के लिए भी समानता को सुरक्षित करती हैं। समाज भी वैमनस्य, अलगाव, अविश्वास और उपेक्षा से दूर रहकर शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की मांग करता है जो किसी भी देश की तरक्की में बाधक नहीं बनता है। दीपावली, ईद, होली जैसे अनेकों त्यौहार हैं जो आपसी भाईचारे के साथ मनाये जाते हैं, जहां लोग अपनी धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठकर साथ-साथ जीने की अनूठी मिसाल प्रस्तुत करते हैं।
संविधान में वर्णित हर धर्म के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा भी तभी हो पाती है जब एक दूसरे के बीच में प्रेम, करुणा, अहिंसा और सुख-दुख में भागीदारी बनी रहे।
भारत की विश्व गुरु के रूप में उसी स्थिति में पहचान बनी रहेगी जबकि यहां के लोग दुनियां के सामने अपनी एकता और अखंडता को बचा कर रखेंगे। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार देखेंगे तो भारत में 51.54 प्रतिशत पुरुष, 48.46 प्रतिशत महिलाएं हैं। इनमें 79.8 प्रतिशत हिंदू ,14. 02 प्रतिशत मुस्लिम, 2.3 प्रतिशत ईसाई, 1.7 प्रतिशत सिख, 0.7 प्रतिशत बौद्ध और 0.37 प्रतिशत जैन समाज के लोग शामिल हैं। हिंदू समाज में भी अनुसूचित जाति के 16.6 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति के 8.6 प्रतिशत लोग हैं जिनकी संख्या करोड़ों में है।
हमारे देश के सभी धर्म के लोग आपसी सहयोग व मैत्री भाव को महत्व देते हैं जिसमें हिंसा के लिए कहीं कोई स्थान नहीं है। हमारे देश की महान विभूतियों, बुद्धिजीवियों, राजनेताओं और समाज के प्रबुद्ध मनीषियों ने भी ऐसा ही संविधान बनाया जिसमें प्रत्येक धर्म को समान अधिकार दिये गये हैं। यह अधिकार भी इसीलिए मिले कि भारतीय समाज में लोग एकजुटता का प्रदर्शन करते रहते हैं। सबसे बड़ा उदाहरण तो आजादी का संघर्ष है, जहां हर धर्म के लोगों ने देश की खातिर अपने को बलिदान कर दिया।
विडम्बना यह है कि इस सबके बावजूद समाज की सच्चाई यह भी है कि लोग एक साथ रहने की जितनी कसमें खाते हैं उनके बीच में कोई न कोई ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं जिसमें सामाजिक सौहार्द्रता को आघात पहुंचता है जिससे सामाजिक रचना का ताना-बाना ध्वस्त होता दिखाई देता है। यह तभी संभव होता है जब किसी कंधे का सहारा लेकर अपनी अस्मिता के सामने दूसरे धर्म के लोगों को बहुत निम्न स्तर का आंकने का प्रयास किया जाता है। इस तरह के लक्षण आजादी से पहले और आजादी के बाद भी प्रभावी रूप से दिखाई दिये हैं। 1857 की क्रांति का भी मुख्य कारण यही था कि अंग्रेजों ने हमारे देश के हिंदू- मुसलमान सैनिकों के धर्म की उपेक्षा करके कारतूस पर सुअर और गाय की चर्बी लगा दी थी जिसके कारण भारतीय सैनिक भड़क गये थे और वहीं से लोगों ने अंग्रेजों को हटाने के लिए भारत की आजादी का जो सपना देखा था, अंतत: वह 1947 में साकार हुआ।
देखा जाये तो भारतीय समाज में उंच- नीच की भावना भी गहरे तक अपनी पैठ बनाये हुए है जिसका उन्मूलन करने के लिए महात्मा गांधी जी ने आजादी के बाद एक सपना देखा था। उसका प्रयास आज भी सरकारी और गैर सरकारी प्रयासों से देश में निरंतर चलता रहता है। लेकिन दुख की बात है कि हिंदू धर्म में ही पूरी तरह से समानता नहीं आ सकी है। धर्मांतरण की समस्या भी बढ़ रही है। इसी को ध्यान में रखकर डॉ ० अंबेडकर ने अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था की है। वे कहते थे कि समाज में जब तक असमानता रहेगी तब तक उन्हें इस मानसिकता से नौकरी में स्थान नहीं मिलेगा। इसलिए आरक्षण दिया गया था। अल्पसंख्यकों के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी भारत के संविधान का एक हिस्सा है। इसलिए किसी को धर्म विशेष के आधार पर अलग करने की चेष्टा संवैधानिक नहीं है। महात्मा गांधी ने सन् 1929 में कहा भी था कि किसी भी अल्पसंख्यक के एक भी न्याय सम्मत अधिकार को कुचलने से स्वराज मिलता है तो भी मैं उसे पाने की इच्छा नहीं करूंगा।
देश की संसद हो या सुप्रीम अदालत में भी धर्म में विभेद करने जैसी बातों को महत्व नहीं दिया जाता है। इसलिए सभी धर्म के अपने-अपने मठ, मंदिर, मस्जिद, चर्च आदि हैं। यह भी देखने में आया है कि लोगों में अपने-अपने धर्म को बचाने की बहुत अभिलाषा रहती है और इस हेतु वह निरंतर संघर्षरत भी रहते हैं। कोई भी एक दूसरे के धर्मस्थल को नहीं छेड़ सकते हैं। विपरीत परिस्थितियों में कानून अवश्य अपना काम करता है। लेकिन सभी को अपने-अपने धर्म के अनुसार रीति रिवाज और व्यवहार की स्वतंत्रता है। हमारा यह विशाल देश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित है। यहां 2025- 26 में जो आंकड़े सामने आये हैं उनमें 17 राज्यों में घृणास्पद वाक्यों के आंकड़े प्रस्तुत किये गये हैं जिसमें उत्तर प्रदेश में 266, महाराष्ट्र में 193, मध्य प्रदेश में 172, उत्तराखंड में155, दिल्ली में 74 घटनाएं दर्ज की गई हैं जो चिंताजनक इसलिए हैं कि इससे कहीं न कहीं उस मानसिकता को बढ़ावा मिलता है जो किसी भी तरह से समाज की एकता को खंडित कर सकते हैं। अतः एकता और अखंडता के लिए समाज और सरकार को मिलकर शांति और सद्भावना के लिए संवैधानिक प्रयास करने होंगे। (लेखक के अपने विचार है)

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