महा शिवरात्रि का महत्व – ज्ञानेन्द्र रावत

महाशिवरात्रि 15 फरवरी पर विशेष,
लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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शिवरात्रि का पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी की रात्रि को मनाया जाता है। इसीलिए इसे शिवरात्रि की संज्ञा दी गयी है। कहा जाता है कि इसी दिन सृष्टि के आदि में भगवान शंकर का रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष का समय माना गया है, चूंकि भगवान शिव तांडव करते हुए अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से ब्रह्मांड को समाप्त कर देते हैं, इसीलिए इस रात्रि को कालरात्रि भी कहा गया है। असलियत में शिवरात्रि सृष्टि के प्रतीकात्मक अंत व आदि की रात्रि है। महाकवि कालिदास ने उत्तर कालामृत के द्वितीय खण्ड के 45वें श्लोक में महाशिवरात्रि के विषय में कहा है कि ” यह तिथि शिवतिथि है जोकि भगवान शिव को प्यारी है। प्रत्येक मास की चतुर्दशी भगवान शिव का प्रीतिकर है। अत: सांयकाल भगवान शिव तथा पार्वती का अर्चन-पूजन करना चाहिए। महाशिव रात्रि वाले दिन मध्य रात्रि को 2 घंटिका का समय ” महानिशा” कहलाती है। अगर अगोचर अविनाशी शिव को फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि से सम्बंधित किया जाना आध्यात्मिकता तथा ज्योतिष शास्त्र से घनिष्ठ संबंध रखता है। साथ ही गूढ विज्ञान के अनुरूप भी है। ज्योतिष मतानुसार चतुर्दशी तिथि ,कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष के स्वामी शिव हैं। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को सूर्य कुंभ राशि में होता है। कुंभ राशि का स्वामी शनि है। शनि को यम भी कहा गया है। कहने का तात्पर्य यह कि शनि भी शिव की ही भांति संहार के प्रतीक हैं। कृष्ण पक्ष को भी संहार का प्रतीक बताया गया है। शनि एवं कुंभ राशि क्रमश: सन्यास वृत्ति और सर्वोच्च आध्यात्मिकता के द्योतक माने गये हैं। शनि सूर्य पुत्र हैं। आत्मा के कारक सूर्य का सन्यासी पुत्र शनि की आध्यात्मिक राशि कुंभ में होना पूजादि के लिए शुभ माना गया है।
यहां यह विशेष ध्यान देने वाली बात है कि इस तिथि पर ज्योतिष मतानुसार एक स्थिति और बनती है। मन रूपी चंद्रमा आत्मानुरूपी सूर्य के साथ परम आध्यात्मिक-साधना राशि कुंभ में एकाकार होने को तत्पर होता है। वैसे जब भी कोई ग्रह सूर्य के दिव्य स्वरूप के निकट होता है तो अस्त यानी दीप्तहीन हो जाता है। मन रूपी चंद्र अस्त न हो,इस हेतु प्रलय के बाद भी शेष रहने वाले यानी अस्त न होने वाले संहार देव की साधना, यम स्वरूप शनि के मास में, संहार पक्ष (कृष्ण पक्ष) की शिव प्रिय तिथि चतुर्दशी निस्संदेह श्रेष्ठ ही है।

समूचे संसार में शिव ही ऐसे देव हैं जिनकी निराकार और साकार स्वरूप में पूजा-अर्चना की जाती है।
उनको शास्त्रों में परम ईश्वर कहा गया है। क्योंकि वे देवाधिदेव हैं, सर्व शक्तिमान हैं, मृत्युंजय हैं, कामदेव के एकमात्र शत्रु हैं एवं सभी देवताओं में अद्भुत हैं, विरोधाभास और रहस्य के प्रतीक हैं। वे सरल हृदय भी हैं और परम रहस्यमयी भी हैं। जहां वे संसार को वैभव प्रदान करने वाले करुणा के सागर हैं, वहीं वह संहार के देव महाकाल भी हैं। समुद्र के महामंथन से निकले हलाहल विष को पीकर प्रलय को रोकने वाले और प्रलय के लिए तांडव नृत्य करने वाले भी शिव ही हैं। काव्य शास्त्र के सभी रसों के रसराज भी शिव ही हैं। संस्कृति के विभिन्न आयामों जैसे वेश – भूषा, वीभत्स, रौद्र और भयावह रस अद्भुत प्रतीक हैं, वहीं श्रृंगार रस के भी सबसे बड़े मूर्तिमान स्वरूप शिव ही हैं। वे सर्व व्यापी ब्रह्मस्वरूप होने से निष्फल-निराकार के कारण सकल साकार हैं। इसलिए शिवलिंग उनके ज्योतिर्मय निराकार का स्वरूप है। उन्हें समूचे विश्व-ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है, इसीलिए लिंगरूप में उनकी सर्वत्र पूजन-अर्चना की जाती है। विश्व की विभिन्न संस्कृतियों में भगवान विश्वनाथ कहें, शिव कहें या अर्द्धनारीश्वर कहें, की विभिन्ना नामों से पूजा-अर्चना की जाती है। यहूदियों का देव बेलफेगो, यूनान का देवता फुल्लुस, अमरीका में एक जनजाति में सिंबू, अरबों का लिंगाकार देवता लाट, बेबीलोनिया में शिउन आदि ये सब नाम अर्थ स्वरूप मानें या दूसरी विशेषताओं में शिव के साथ आश्चर्यजनक रूप से साम्य रखते हैं। यह भी तथ्य है कि विश्व में सबसे बड़ा शिवलिंग मुस्लिम देश टर्की में है। यही नहीं कम्बोडिया में भी अगोरथोग नामक शहर में एक विशाल विख्यात शिवमंदिर है। रूस में भी कश्यप सागर के तट पर बाकू नामक स्थान पर शिव मंदिर है जिसकी रक्षा का जिम्मा वहां के प्रशासन पर है। यहां रोज सैकड़ों विदेशी भक्त दर्शन को आते हैं।
यह सर्वविदित है कि मनुष्य अपनी बौद्धिक क्षमताओं की सीमाओं में अनादि काल से साहित्य, कला एवं दर्शन के माध्यम से शिव की पूजा कहें या स्तुति करता रहा है। यही वह अहम कारण है कि भारतीय संस्कृति के साहित्य, पुरातात्विक अभिलेखों, ताम्रपत्र, मंदिरों और मूर्तियां शिवमय हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि शिव की पूजा सर्वव्यापी है और सर्वव्यापी सत्ता के कारण शिव पूजा लिंग रूप में सर्वत्र प्रचलित रही है। चूंकि अन्य देवता साक्षात ब्रह्मांड नहीं हैं, अत: उनकी पूजा निराकार और लिंग रूप में नहीं होती है। शिव पुराण से यह सिद्ध होता है कि लिंग का मूल तात्पर्य औंकार ( प्रणव ) के सूक्ष्म रूप से है अर्थात यह रूप समान रूप से सर्वत्र व्यापक है।
शिवरात्रि पर किये जाने वाले पूजन में शिवलिंग की पूजा अवश्य की जाती है। यह विशेषरूप से अर्थपूर्ण है। वेदों में ब्रह्म को निराकार माना गया है किन्तु उसी समय से यानी वैदिक काल में शिवलिंग की पूजा की जाती रही है। यह ब्रह्मांड के निराकार रूप का विरोध या खंडन नहीं है अपितु यह मनुष्य की एक मनोवैज्ञानिक दुर्बलता को पहचान कर उसको दूर करने का एक व्यावहारिक उपाय है। निराकार ब्रह्म की योगी तो ध्यान-साधना कर सकते हैं लेकिन मनुष्य नहीं। इसीलिए एक प्रतीक के रूप में शिवलिंग का निर्माण कर ब्रह्म के कल्पित, निराकार रूप को स्पष्ट किया गया है। यथार्थ में शिवलिंग सृष्टि व संहार का स्रोत है। ‘लय’ से लय तथा ‘ग’ से आगमन अर्थात विकास का बोध होने के कारण लिंग सृष्टि के अव्यय पद का बोधक है। लिंग पुराण, 9918 खण्ड में कहा भी गया है कि – ” लाभं गच्छंति भूतानि संहारे निखिल यत:। सृष्टिकाले पुन: सृष्टि स्तरमाल्लिड्गमुदाहुतम। । शिवोपनिषद में भी लिंग का प्रतीकात्मक विश्लेषण किया गया है। ‘ अधोभागे स्थित: स्कंद: स्थिता देवो च मध्यत: । उर्ध्व रुद्र: क्रमाद्वापि ब्रह्माविष्णुमहेश्वर: ।।’
शिवरात्रि में किये जाने वाले पूजन में बेलपत्र का भी विशेष महत्व है। इसका अहम कारण यह है कि बेलपत्र में तीन पत्ते होते हैं, जो शिव के तीन नेत्रों, तीन गुणों तथा त्रिपक्षीय क्रियाओं के प्रति हमारी कृतज्ञता के द्योतक हैं। त्रिगुणात्मक होने के कारण भगवान मृत्युंजय शिव स्वयं प्रकृति अर्थात सृष्टि का दृव्य कारण और निमित्त कारण दोनों हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि सभी जानते हैं कि सृष्टि में निरंतर आविर्भाव व तिरोधान हो रहा है। अत: सर्वोच्च सत्ता अपने शिव रूप में ही असहाय व्यक्ति को सर्वाधिक अपनी ही लगती है और वह स्वाभाविक रूप से सबसे पहले भगवान शिव की ही स्तुति-आराधना करता है। चूंकि वह यह भी भलीभांति जानता-समझता है कि शिव सातों ग्रहों के अधिष्ठाता हैं, इसलिए उनकी पूजा-अर्चना, साधना- आराधना करने से सभी ग्रहों के अनिष्ट पल शनै-शनै समाप्त हो जाते हैं। शिव को प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग है, शुभकार्य करते जाना और शुभ कार्य करने का अर्थ है स्वयं शुभ बनते जाना। अत: शिवरात्रि को सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया के आरंभ की रात्रि भी माना गया है। असलियत में शिव लोक आस्था में औघड़ दानी आशुतोष हैं। वे एक अंजलि जल, आक, धतूरे के फल व बेल के पत्तों से रीझ जाने वाले शिव जितने दिव्य हैं, उतने ही मानवीय हैं। निष्कर्षत: वह भारतीय लोकजीवन में वर्णित व्यक्तित्व के सभी आयामों में समाहित हैं, इसीलिए वह सर्वत्र पूजनीय हैं। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)

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