
लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)
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डिपफेक तकनीकसे फैलने वाली जानकारी समाज और देश के माहौल को नकारात्मक तक की ओर ले जाती है इसे रोकने के लिए सख्त कदम उठाने चाहिए।कानूनी, तकनीकी और व्यावहारिक रूप से प्रयास करने चाहिए। कंटेंट क्रिएटर के लिए लाइसेंस अनिवार्य होना चाहिए। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के सिंथेटिक कंटेंट को मेटा डेट से लेबल कर दिया जाए। एआई द्वारा जेनरेटेड की गई किसी भी सामग्री को वाटर मार्क या मेटाडेटा होना चाहिए ताकि उत्पत्ति का पता चल सके कि इसकी शुरुआत कहां से हुई।
एआई टूल्स आधारित ऐसे टूल्स विकसित किए जाएं जिससे सूक्ष्म विसंगति औरअजीब स्क्रीन बनावट को पहचाना जा सके। डिजिटल तकनीक में ब्लॉकचेन तकनीकी का इस्तेमाल कर इस बात की जानकारी ली जा सकती है कि यह सामग्री असली है या नहीं है। संदिग्ध वीडियो और फोटो की जांच के लिए रिवर्स इमेज सर्च का उपयोग करना चाहिए।
एल्गोरिदम का उपयोग करके सक्रिय मॉडरेशन से डीपफेक को ऑटोमेटिक तरीके से अलग करना और वायरल होने से पहले ही हटा दिया जाना चाहिए।
जन जागरूकता अभियान चलाया जाए और आम जनता को उसके बारे में समझाया जाए और बताया जाए।
इसके अलावा प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह हर बात के लिए सरकार को दोषी न ठहराएं स्वयं अपनी जिम्मेदारी को भी समझे अपने हाई क्वालिटी वीडियो और फोटो को सोशल मीडिया पर अपलोड ना करें एआई तकनीक से इनका दुरुपयोग किया जा सकता है। आपको ब्लैक मेल के जरिए सामाजिक और आर्थिक प्रताड़ना झेलनी पड़ सकती हैं। तमाम सावधानी के बावजूद भी अगर आपको लगे कि कोई वीडियो संदिग्ध है तो तुरंत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रिपोर्ट करें। आपकी जागरूकता ही आपको बचा सकती हे। (लेखिका के अपने विचार हैं)