
लेखक : रमेश जोशी
प्रधान सम्पादक, ‘विश्वा’, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, यू.एस.ए.
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सब उत्सव हुड़दंग भगत जी
पड़ी कुएं में भंग भगत जी
शर्ट उतारें चिढ़ जाता है
बाबा नंग धड़ंग भगत जी
दिन में दस-दस रंग दिखाए
पर सारे बदरंग भगत जी
उछल उछलकर ताली पीटें
सारे नकटे नंग भगत जी
जैसा मौका वैसा चोला
सारे गिरगिट दंग भगत जी
चोरी का मतला कहता है
सभी काफिये तंग भगत जी