पक्षियों की प्रजातियां इतिहास न बन जाएं!

लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)
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कभी प्रात: काल चिड़ियों की चहचहाट सुनाई देती थी। कोयल की मीठी बोली हवाओं में गूंजती थी। गौरेया आंगन में फुदकती रहती थी।संध्या समय पक्षियों के घर लौटने का होता था पूरा आसमान पक्षियों के कलरव से गूंज उठता था। विभिन्न प्रकार की छोटी चिड़िया जिनका रंग अद्भुत होता था। कहीं पर भी छोटे से पोखर में तैरते सफेद बगुले चहल कदमी करते रहते थे।बरसात के दिनों में मोर पंख फैलाकर खुशी से झूम उठते थे। अब ये सब कुछ देखने, सुनने को नहीं है। बढ़ते शहरीकरण, जंगलों की अंधाधुंध कटाई, ध्वनि प्रदूषण से पक्षियों की लगभग पन्द्रह प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर है। मुख्य कारण जंगलों की कटाई लगातार जारी है,उस पर सरकार सख्ती से प्रतिबंध लगाये। पेड़ ही नहीं होंगे तो पक्षी अपना घोंसला कहां बनाएंगे और कहां रहेंगे। पेड़ो के अलावा दूसरे पक्षियों के आवास भी सुरक्षित रखे जाएं। अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण से भी पक्षी डरकर उड़ जाते हैं। शहरीकरण से ऊंची ऊंची इमारतें बन गई है। पक्षियों के लिए खुला आसमान भी उनकी उड़ने की क्षमता से दूर हे हर पक्षी एक तय ऊंचाई से ज्यादा नही उड़ सकता है।
खेतों में फसलों में कीटनाशक दवाइयां का अत्यधिक इस्तेमाल होता है और जब पक्षी उन फसलों को चुगने बैठते हैं तो उनकी मौत हो जाती है। अत्यधिक कीटनाशक का प्रयोग नहीं किया जाए। इसकी बजाय किसी ऐसे जैविक तरल पदार्थ की खोज की जाए जो फसलों को कीट से बचाने के साथ साथ हमारे देश की लगभग पन्द्रह तरह की प्रजातियों को बचा सके जो विलुप्त होने के कगार पर है। सरकार को उच्च स्तर पर बाग, उपवन, अभ्यारण का विस्तार करना चाहिए। वन क्षेत्र के निकट पक्षियों के लिए जलप्रबंधन का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। शिकार पर सख्त पाबंदी लगाई जाए कोई गैर कानूनी तरीके से शिकार करे तो भारी जुर्माना लगाया जाए। प्रत्येक नागरिक भी दायित्व है की इन पक्षियों को विलुप्त होने से बचाए।अपने घरों की छत, छज्जे, गैलरी व बालकनी में पक्षियों के लिए दाना व पानी के परिंडे की व्यवस्था रखें। ताकि आबादी क्षेत्र में भी ये भूखे प्यासे न रहे। इससे भी काफी राहत मिलेगी। (लेखिका के अपने विचार हैं)

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