
जाफ़र लोहानी
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मनोहरपुर (जयपुर)। निकटवर्ती ग्राम ताला की ऊँची डूंगरी पर विराजमान हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक हजरत बुर्रहानुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला आलेह का 4 दिवसीय वार्षिक मेला 9 अप्रैल गुरुवार को बुलंद दरवाजे पर झंडे की रस्म के साथ मे शुरू होगा जो कि 12 अप्रैल रविवार को कूल की रस्म के साथ मे शहरी मेला विधिवत सम्पन्न होगा इसके बाद में गुदड़ी मेला भरेगा।
ग्राम पंचायत ताला के सरपंच अमीर खान शेख़ पूर्व सरपंच फखरुद्दीन खान शेख व हाजी शकूर खान शेख़ आदि ने बताया कि मेले की पूर्ण तैयारियां करली गई हैं।
उल्लेखनीय हैं कि जयपुर से 40 किलोमीटर दूर ताला गाँव में स्थित मशहूर सूफी सन्त शेख़ बुरहानुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह आलेह की दरगाह एक छोटी सी पहाड़ी पर मौजूद है। लगभग 80 सीढ़ियों से चढ़कर मुख्य मज़ार तक पहुँचा जा सकता है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार शेख़ हजरत बुर्रहानुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला आलेह 1398 ई. में तैमूर लंग के साथ दिल्ली आए थे। कुछ साल दिल्ली में रहने के बाद वे रायसर पहुँचे और फिर वहाँ से अमरसर होते हुए ताला में एक छोटी सी पहाड़ी पर तन्हाई में इबादत करने के लिए उन्होंने अपनी खानक़ाह बनाई।
शेखावाटी की तारीख (इतिहास) पर लिखी सबसे पुरानी और सही किताबों में से एक ‘माधोवंश-प्रकाश’ के मुताबिक 1428 ई. में दिल्ली से ताला के रास्ते में शेख़ हजरत बुर्रहानुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह आलेह ने कुछ दिनों के लिए आराम करने की खातिर अमरसर के करीब पड़ाव डाला, तब कछवाहा हाकिम बरवाड़ा के राव मोकल जी बेटे की मुराद लिए शेख़ हजरत बुर्रहानुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला आलेह की खिदमत में हाज़िर हुए। शेख़ हजरत बुर्रहानुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला आलेह की दुआ और बरकत से राव मोकल को बेटा नसीब हुआ।
इससे राव मोकल इतने मुतासिर हुए कि उन्होंने अपने बेटे का नाम शेख़ बुर्रहानुद्दीन के नाम पर ‘राव शेखा’ रख दिया। शेख़ हजरत बुर्रहानुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला आलेह की ही दुआओं से राव शेखा बहुत बहादुर और कामयाब राजा बने। इनके खानदान वाले आगे चलकर ‘शेखावत’ कहलाए।
उन्होंने लगातार सफर कर दुखी और परेशान लोगों की तकलीफें दूर कीं। शेखावाटी की तारीख पर लिखी एक और किताब ‘केसरी सिंह समर’ से भी शेख़ बुरहान के बारे में अहम जानकारी मिलती है।
केसरी सिंह समर की कुछ पंक्तियाँ इस तरह हैं:–
तज करि मक्क शरीफ नांव बुरहान सुअल्ली।
उत्तर देश दिखनाव आय पहुँच्यो जिन दिल्ली।।
निरख भाव उमराव खाँ सुल्तान निहारे।
खलक मुलक देखताँ पाँव ढूँढा हड़ धारे।।
दरवेश आय लगाय दम सिंगी नाद मुख उच्चरै।
सुनि कान सबद मोकल नरिंद संमाने बहु आदरै।।
इन पंक्तियों का मतलब यह है कि शेख़ बुरहान अली मक्का शरीफ छोड़कर दिल्ली आए। कई रईस, बादशाह और उमराव उनके दीदार करने को उनके पास आए। ये दरवेश कई मुल्कों से गुज़रते हुए आखिर में ढूँढाड़ इलाके पहुँचे जहाँ राव मोकल ने उनका बहुत एहतराम और इस्तकबाल किया।
शेख़ हजरत बुर्रहानुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला आलेह के ताला स्थित मकबरे की अंदरूनी दीवारों पर खूबसूरत रंगीन काँच की जड़ाई का काम किया गया है। मकबरे की अंदरूनी छत अलग – अलग रंगों के बेलबूटों से सजी हुई है। मकबरे के गुम्बद पर लगा कलश एक खिले हुए फूल की शक्ल में है। दरगाह के अंदर कुछ कमरे बने हुए हैं जिनका इस्तेमाल ज़ायरीनों के ठहरने के लिए किया जाता है।
सभी मजहब के लोगों की शेख़ बुरहान में अकीदत है, खासतौर पर शेखावत राजपूतों की। इनका उर्स बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इनकी दरगाह में मुसाफिरों के ठहरने के लिए कई कमरे बने हैं। मकबरे के ऊपरी हिस्से तक जाने के लिए कई सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। मेन गेट के सीधे हाथ की तरफ मुसाफिरों के रुकने के लिए सराय और उलटे हाथ की तरफ संगमरमर से बनी मुख्य मज़ार है। मज़ार के सामने संगमरमर से बना एक खुला बरामदा है।
इस बरामदे में आठ कोनों वाले खम्भों से बने मेहराबदार खुले दरवाजे हैं। ऊपर की तरफ से जुड़े हुए मेहराबों से बरामदे और मुख्य मज़ार वाले हिस्से को अलग किया जाता है। मकबरे के ऊपर बने गुम्बद पर नक्काशी से फूल-पत्तियों का काम किया गया है। गुम्बद के ऊपरी हिस्से पर बना सोने का कलश (स्वर्ण-कलश) पतली धातु की ब्लेड्स से बने एक गोल गुलदस्ते की तरह है और इसी कलश के बीच में करीब तीन फुट की सोने की मीनार बनाई गई है। गुम्बद पर बना इस तरह का सोने का कलश कहीं और देखने को नहीं मिलता।