
प्रकृति से मानव है न कि मानव से प्रकृति
लेखक : संजय राणा
लेखक ख्यात सामाजिक कार्यकर्ता एवं पर्यावरणविद हैं।
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मध्य हिमालय आज मौन नहीं है, बल्कि बहुत स्पष्ट और डरावने संकेत दे रहा है। यह संकेत केवल पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सीधे-सीधे मैदानी भारत के भविष्य से जुड़े हुए हैं। हाल के वैज्ञानिक तथ्यों, मौसम संबंधी आँकड़ों और ग्लेशियर सम्बंधित अध्ययनों से यह निर्विवाद रूप से स्पष्ट हो चुका है कि मध्य हिमालय जलवायु परिवर्तन के गंभीर और बहुआयामी संकट से गुजर रहा है। उत्तराखंड और हिमाचल जैसे हिमालयी राज्य, जो कभी सर्दियों में बर्फबारी और वर्षा के लिए जाने जाते थे, नवंबर, दिसंबर और जनवरी तक लगभग शुष्क बने हुए हैं। विगत 40 वर्षों के मौसम के आंकड़ों पर नजर डालें तो यह स्थिति असाधारण ही नहीं बल्कि भयावह है। उत्तराखंड राज्य में स्थित ओली जो लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और सर्द ऋतु में स्कीइंग जैसे खेल के लिए विश्व विख्यात है, वहां पिछले तीन वर्षों से बर्फ गायब है, जिस वजह से पर्यटक मायूस तो हैं हीं, इससे पर्यटन और रोजगार भी चौपट हो गया है जिससे सैकड़ों लोगों के भुखमरी वाले हालत हो गए हैं। यह सूखा केवल जल की कमी नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के असंतुलन का संकेत है।
सबसे चिंताजनक पहलू तो यह है कि जंगलों में आग अब केवल गर्मियों की त्रासदी नहीं रही। वह जनवरी जैसे ठंडे महीने में हिमालयी वनों में आग की घटनाएँ सुनना और देखना अपने आप में एक गंभीर चेतावनी है। इसका सबसे ताजा उदाहरण फूलों की घाटी में लगी आग है, जिसे नियंत्रण करने के लिए सेना से मदद मांगी गई है। यह स्पष्ट संकेत है कि वनों की नमी, मिट्टी की आर्द्रता और स्थानीय जलचक्र बुरी तरह प्रभावित हो चुके हैं। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो आगामी मई-जून में मध्य हिमालय एक बार फिर व्यापक वनाग्नि की चपेट में होगा, जिसके परिणाम दूरगामी और विनाशकारी होंगे।
जलवायु असंतुलन का एक और मानवीय पक्ष जंगली पशुओं और इंसानों के बीच बढ़ता संघर्ष है। जंगलों में भोजन और पानी की कमी के कारण वन्यजीव लगातार मानव बस्तियों की ओर आ रहे हैं। इससे जान-माल की हानि तो बढ़ ही रही है, पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन की गति भी तेज हो रही है। यह केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि पर्यावरणीय असंतुलन का प्रत्यक्ष परिणाम है। इन सभी स्थितियों की जड़ में एक महत्वपूर्ण कारक है—पश्चिमी विक्षोभ का कमजोर होना। पश्चिमी विक्षोभ ही हिमालय में शीतकालीन वर्षा और बर्फबारी का प्रमुख स्रोत रहा है। इसके कमजोर पड़ने से न केवल वर्षा और हिमपात में कमी आयी है, बल्कि पूरे जलवायु तंत्र की लय भी बिगड़ गई है। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कर दिया है कि यह परिवर्तन प्राकृतिक कम और मानव-जनित अधिक है।
दरअसल विकास के नाम पर हिमालय को निरंतर जिस तरह छलनी किया गया है, वह चाहे सड़कों का अंधाधुंध निर्माण हो, पहाड़ों की कटाई हो, नदियों पर बनी अविवेकपूर्ण परियोजनाएँ हों, पर्यटन का अनियंत्रित दबाव हो या फिर वनों का क्षरण हो। मानव ने प्रकृति पर विजय पाने की ललक में यह नहीं समझा कि हिमालय कोई निर्जीव पहाड़ नहीं है, बल्कि वह एक जीवंत और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र है। आज मध्य और हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में बर्फ के जमने की प्रक्रिया कमजोर हो रही है, वहां बर्फ के पिघलने की गति तेज हो गयी है और बर्फ के टिके रहने की अवधि लगातार घट रही है। इसका सीधा असर नदियों के प्रवाह, कृषि व्यवस्था, पेयजल आपूर्ति और जैव विविधता पर पड़ेगा। विशेषकर गर्मियों और सूखे महीनों में नदियों का जलस्तर गिरना तय है, जिसका खामियाजा सबसे पहले मैदानी क्षेत्रों को भुगतना पड़ेगा। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता।
यहां यह भी समझना बेहद जरूरी है कि हिमालय केवल पहाड़ों में रहने वालों का ही नहीं है, वह करोड़ों-करोड़ लोगों की जीवनरेखा भी है। गंगा, यमुना, सतलुज जैसी नदियाँ हिमालय की ही देन हैं। यदि हिमालय का जलस्रोत कमजोर पड़ा तो मैदानी इलाकों में जल संकट, खाद्यान्न संकट और सामाजिक अस्थिरता स्वाभाविक है। इन सूचनाओं को बार-बार समाज के सामने रखने का उद्देश्य भय फैलाना नहीं है, बल्कि चेताना है कि यह समय आत्ममंथन का है। क्या हमारा विकास वास्तव में टिकाऊ है? क्या हम हिमालय को केवल संसाधन मानकर उसका दोहन करते रहेंगे या उसे संरक्षित विरासत मानकर सम्मान भी देंगे?
समय की मांग है कि व्यवस्थाएं, वैज्ञानिक समुदाय और समाज, तीनों द्वारा मिलकर ठोस कदम उठाये जायें। इसके साथ-साथ हिमालयी क्षेत्रों में विकास की परिभाषा भी बदलनी होगी। दरअसल विकास तो वह होना चाहिए जिसमें प्रकृति, जीव – जंतु और मानव का समान रूप से विकास हो, न कि सिर्फ और सिर्फ मानव का ही विकास हो। स्थानीय समुदायों की भागीदारी, पारंपरिक ज्ञान, वनों और जलस्रोतों का संरक्षण तथा जलवायु के अनुकूल नीतियाँ अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता हैं।
हमें यह ध्यान देना होगा कि प्रकृति हमें संकेत नहीं, स्पष्ट चेतावनी दे रही है। बीते दशक की घटनायें इसकी जीती-जागती मिसाल हैं। यदि हिमालय सुरक्षित नहीं रहा, तो यह केवल पहाड़ों की ही त्रासदी नहीं होगी, मैदानी भारत सबसे पहले उजड़ेगा। अभी भी समय है कि हम सुनें, समझें और अपनी दिशा बदलें। यही हिमालय के प्रति हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा कर्तव्य भी है। इसलिए — आओ प्रकृति की ओर लौटें। (लेखक के अपने विचार हैं)