इनाया ख़ान की कलम से “बचपन की चीख़”

निजी स्कूल की अमायरा के नाम एक सच्ची पुकार
लेखिका : इनाया ख़ान
ब्रांड एंबेसेडर – बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान, राजस्थान सरकार
महिला अधिकारिता एवं बाल विकास विभाग

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जयपुर के एक निजी स्कूल की दीवारों के पीछे, एक ऐसी चीख़ गूँजी जिसे पूरा देश सुन रहा है —
अमायरा, वो नन्हीं बच्ची जो हर तस्वीर में विक्ट्री ✌️ का साइन दिखा रही थी,
क्या वाकई हार मान सकती थी?
क्या वो मुस्कान, जो दूसरों को हौसला देती थी, इतनी असहाय हो सकती थी?
नहीं!
ये किसी बच्ची की हार नहीं थी —
ये हमारे शिक्षा तंत्र की संवेदनहीनता और स्कूलों की तानाशाही की हार थी।

स्कूल: शिक्षा का मंदिर या व्यापार का अड्डा?”
जहाँ बच्चों को आत्मविश्वास मिलना चाहिए,
वहीं आज कई स्कूलों में डर, दबाव और दिखावे का वातावरण है।
माता-पिता महीने भर मेहनत कर भारी-भरकम फीस जमा करते हैं,
पर बदले में बच्चों को मिलती है मानसिक यातना, बुलिंग और अपमान।
स्कूल में अमायरा के साथ जो हुआ, उसने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
माता-पिता के अनुसार बच्ची को लगातार बुलिंग और मानसिक दबाव झेलना पड़ रहा था,
फिर भी स्कूल प्रशासन ने आंखें मूँद लीं।
जाँच टीम पहुँची तो गेट बंद कर दिए गए,
खून के निशान मिटा दिए गए,
और सच को दीवारों के भीतर दबा दिया गया।
क्या यह वही “प्रगतिशील शिक्षा” है जिस पर हम गर्व करते हैं?

फीस वसूलने में तेज़, इंसाफ देने में धीमे क्यों?
जब किसी बच्चे की जान जाती है,
तो स्कूल प्रशासन की भाषा बदल जाती है —
“हम दुखी हैं” कहना आसान है,
पर जिम्मेदारी लेना किसी को मंज़ूर नहीं।
माता-पिता को चुप करा दिया जाता है,
बच्चों को डराया जाता है,
और मीडिया से सच्चाई छिपाई जाती है।
इंसाफ की माँग करना अपराध नहीं है,
ये हर नागरिक का अधिकार है।
अमायरा सिर्फ एक बच्ची नहीं थी —
वो इस देश के हर उस बच्चे की आवाज़ है
जो “टॉपर” बनने की दौड़ में अपनी मुस्कान खो रहा है।

आज के स्कूल डर के कारखाने बन गए हैं
आज शिक्षा एक ऐसी दौड़ बन गई है जहाँ हर बच्चा थक चुका है।
कॉम्पिटीशन, होमवर्क, ट्यूशन, प्रेशर, बुलिंग —
हर दिशा से बोझ बढ़ता जा रहा है।
इन मासूम कंधों पर सफलता का इतना दबाव क्यों?
क्यों हर गलती को “फेलियर” कहा जाता है?
क्यों स्कूलों में डर को अनुशासन समझ लिया गया है?
सरकार को चाहिए कि इस डर और दौड़ के तंत्र को खत्म करे,
और बच्चों का खोया हुआ बचपन वापस लाए।
क्योंकि यह उम्र अंक लाने की नहीं, जीवन जीने की होती है।

अमायरा की आत्मा अब हर माँ की पुकार है
अमायरा अब एक बच्ची नहीं रही —
वो एक आवाज़ बन चुकी है, जो हर माँ-बाप के दिल में गूंज रही है।
उसकी मौत एक सवाल है —
क्या हमारे स्कूल वाकई सुरक्षित हैं?
क्या बच्चों को शिक्षा के साथ मानसिक सहारा भी मिल रहा है?
या फिर हम बच्चों को सिर्फ एक नंबर बना चुके हैं?
मैं, इनाया ख़ान,
राजस्थान सरकार के बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान की ब्रांड एंबेसेडर
और महिला अधिकारिता एवं बाल विकास विभाग से जुड़ी हुई,
ये संकल्प लेती हूँ कि
अमायरा को इंसाफ दिलाकर ही रहूँगी।
अब हर स्कूल को जवाब देना होगा
क्योंकि बेटी अब चुप नहीं रहेगी।
(लेखिका का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)

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