प्रकृति से खिलवाड़ रुके तभी आद्र भूमि का संरक्षण संभव – ज्ञानेन्द्र रावत

लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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आज विश्व आद्र भूमि दिवस है। दावे भले कुछ भी किये जायें, हकीकत यह है कि आद्र भूमि के नामपर देश में कुछ ही इलाके ऐसे हैं, जिन्हें हम आद्र भूमि की संज्ञा दे सकें। अधिकांश भूमि पर अवैध कब्जे हो चुके हैं। जो कुछ बची हुयी है, वह अनुपयोगी है। दरअसल जमीन और नमी का सम्बंध सदियों पुराना है और आर्द्र भूमि का हमारे जीवन में क्या महत्व है, इससे हमारे बुजुर्ग भलीभांति परिचित थे। उन्हें जलवायु, बारिश और किसी क्षेत्र विशेष में तापमान के निर्धारण में नमी की भूमिका का बखूबी ज्ञान था। यह सर्वविदित है कि नमी नहीं होगी, तो जमीन तो फटेगी ही, सारा कुछ उलट-पुलट हो जायेगा। हमारे तालाब, नदी, झील और समुद्र शुष्क रेगिस्तान में बदल जायेंगे। और जब जमीन की ऊपरी परत में नमी ही नहीं होगी, तो बीज कैसे पनपेंगे और जब फसल नहीं होगी तो जाहिर है हम खायेंगे क्या। बहुतेरे पेड-पौधे अपनी जरूरत का पानी मिट्टी से नहीं, हवा से लेते हैं।यदि हवा में नमी न हुयी तो धरती तापघर में तब्दील हो जायेगी। जिस तरह मौजूदा समय में जैव विविधता का आंकड़ा दिन ब दिन घटता जा रहा है, यदि यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब जैव विविधता के साथ ही साथ हमारी जिंदगी और हमारी सेहत का भी खात्मा हो जायेगा। यह बात हमारे बुजुर्ग अच्छी तरह जानते-समझते थे तभी वह तालाब बनवाते समय उसके किनारे खासकर दक्षिणी-पश्चिमी किनारों पर छायादार पेड़ लगवाते थे।
विडम्बना है कि आज तालाब ही नहीं रहे हैं, वे ही निजी स्वार्थ की भेंट चढ़कर विलुप्ति के कगार तक पहुंच गये हैं। जबकि तालाब हमारी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के तहत जल संचय प्रक्रिया के आधार थे। लेकिन आज भौतिकवाद और निजी स्वार्थ के चलते हमने अपनी उस पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था को खण्ड खण्ड कर दिया है। एक समय देश में छोटे बडे तकरीब 5 से 6 लाख गांव-शहर थे और अमूमन 30 लाख के करीब तालाब थे। प्रख्यात पर्यावरणविद और जल विज्ञानी अनुपम मिश्र जी ने ‘आज भी खरे हैं तालाब’ नामक अपनी पुस्तक में इसका उल्लेख भी किया है। खेद है कि हमने अपनी उस धरोहर को अपने लोभ की खातिर उनमें से तकरीब 20 लाख से अधिक तालाबों का अस्तित्व ही मिटा दिया।

आज बमुश्किल देश में 8 से 9 लाख तालाब ही बचे हैं। उनमें से भी ज्यादातर पर भी भूमाफियाओं ने कहीं गगनचुम्बी अट्टालिकायें तो कहीं व्यावसायिक काम्प्लेक्स बना लिये हैं। कहीं वे सरकारी कूड़ाघर बना दिये गये हैं। सरकार दावा तो उनके संरक्षण का करती है लेकिन कार्य उसके बिल्कुल उलट करती है। सरकार अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं के तहत तालाबों के पुनरुद्धार की,उनके पुनर्जीवन की बात तो करती है लेकिन सीवर के पानी के भरने से तालाब के ऐतिहासिक और पारंपरिक सामाजिक महत्व को ही खत्म करने का काम कर रही है। ऐसी स्थिति में जो तालाब हमारे जल संचय के आधार थे, जिनकी खेती में अहम भूमिका थी, जल जीवों के संरक्षण में, पशुपालन और मछली पालन में जो अपना अहम योगदान देते थे, जो हमारे पारिस्थितिकीय तंत्र में सबसे अहम किरदार की भूमिका निबाहते थे, उसको ही उसने जमींदोज करने का काम किया है। ऐसे हालात में पशुपालन, मछलीपालन, जलजीवों के जीवन, कृषि और जलसंचयन की कल्पना ही बेमानी है।
यही व्यवहार सरकार झीलों के साथ भी कर रही है। इन हालातों में भूजल शुद्ध रह पायेगा, इसकी उम्मीद ही बेमानी है। समझ नहीं आता सरकार करना क्या चाह रही है। हजारों करोड की राशि इस तरह की योजनाओं और सौंदर्यीकरण के नाम पर बर्बाद करने का सरकार का औचित्य समझ से परे है। यह सरकार के अविवेकी रवैय्ये का प्रतीक है।

जहां तक देश की राजधानी दिल्ली का सवाल है, एनजीटी की मानें तो दिल्ली में तालाब केवल कागजों में ही बचे हैं। कहीं तालाबों को समतल कर उनपर व्यावसायिक काम्प्लेक्स बना दिये गये हैं, कहीं वे बदबूदार गंदे पानी से लबालब भरे हैं और कहीं वह कूड़े-करकट के डंपिंग ग्राउंड बन चुके हैं। अब सरकार सीवर के पानी को ट्रीट करके तालाबों को भरने की योजना बना रही है। यहां यह जान लेना जरूरी है कि तालाब एक जीवित पारिस्थितिकीय तंत्र है। जबतक इसका जलग्रहण क्षेत्र मुक्त नहीं होगा और वहां प्राकृतिक बहाव नहीं होगा, तबतक सीवर के पानी से तालाबों को भरने के प्रयास से तालाबों का वास्तविक स्वरूप वापस नहीं आ सकता। अमृत सरोवरों की दयनीय हालात देश में भ्रष्टाचार के चलते क्या हो गयी है, यह किसी से छिपा नहीं है। कहीं गड्ढे हैं, कहीं उनमें पानी ही नहीं है और कहीं वह दलदल और कीचड से भरे पड़े हैं। कहीं उनका नामोनिशान ही नहीं है।यदि इसकी पड़ताल के लिए गांव जाते हैं, तो गांव के प्रधान ,सरपंच और ग्रामीण विकास विभाग के संबंधित कर्मचारी नदारद मिलते हैं। यह अमृत सरोवरों की हकीकत है।
आद्र भूमि को लें, आद्रभूमि का संरक्षण बेहद जटिल समस्या है। अनुमानत: देश की लगभग 27 से अधिक फीसदी जमीन बंजर हो चुकी है और उसमें दिनोंदिन बढो़तरी हो रही है। देश के प्रधानमंत्री जी भी इस तथ्य से भलीभांति परिचित हैं।आद्रभूमि का संरक्षण बुजुर्गों के पारंपरिक ज्ञान के प्रयोग के बिना असंभव है। फिर विकास के नामपर जब प्रकृति के साथ सरकार ही खिलवाड कर रही है, उस दशा में आद्रभूमि का संरक्षण कैसे संभव है। यह समझ से परे है। ऐसी स्थिति में आद्र भूमि संरक्षण की राह बेहद कठिन है। इसमें दो राय नहीं है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)

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