जैव विविधता का गहराता संकट – ज्ञानेन्द्र रावत

लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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“प्राकृतिक वनों का विकल्प नहीं है वृक्षारोपण और जंगल सिर्फ पेड़ नहीं, एक जीवित तंत्र है”
आज समूची दुनिया में जैव विविधता का संकट गहराता जा रहा है। इस बारे में यदि अंतर सरकारी विज्ञान नीति मंच आन बायोडायवर्सिटी एण्ड ईकोसिस्टम सर्विसेज और विश्व जैव विविधता प्राधिकरण की मानें तो दुनिया में 10 लाख पशु और पादप प्रजातियों पर विलुप्ति का संकट मंडरा रहा है।जैव विविधता में गिरावट की यह दर मानव इतिहास में किसी भी अन्य समय की तुलना में सर्वाधिक है। इससे पारिस्थतिक तंत्र, खाद्य सुरक्षा और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है। यही नहीं संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम सम्मेलन की रिपोर्ट के अनुसार मानवीय गतिविधियों ने धरती की 70 फीसदी जमीन को तो पहले ही बदल दिया है जिससे इसका 40 फीसदी हिस्सा खराब हो गया है। और तो और मानव की कारगुजारियों के चलते महासागर के 87 फीसदी हिस्से को भी बदलकर रख दिया है। वैश्विक स्तर पर देखें तो 1970 से 2016 के बीच स्तनधारियों, सरीसृपों और मछलियों की आबादी में 68 फीसदी की कमी आई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसकी पुष्टि की है। यह खतरनाक संकेत है।

जहांतक भारत का सवाल है, हमारी सरकारें जैव विविधता संरक्षण के दावे -दर-दावे कर रही है और वृक्षारोपण के माध्यम से जैव विविधता के क्षरण को पाटने का अभियान चला रही है। ऐसे समय यहां वृक्षारोपण और प्राकृतिक वन के बीच पारिस्थितिक अंतर को समझना आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। आधिकारिक रिपोर्टें भले कुल वन आच्छादन में स्थिरता या मामूली वृद्धि का संकेत दें, किंतु विशेषज्ञ लगातार यह रेखांकित कर रहे हैं कि वृक्षारोपण से तैयार हरियाली और प्राकृतिक, बहुस्तरीय, जैविक रूप से समृद्ध वन एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। प्राकृतिक वन सैकड़ों वर्षों में विकसित होते हैं, जिनमें पेड़-पौधों, सूक्ष्मजीवों, कीटों, पक्षियों और स्तनधारियों का जटिल पारिस्थितिक जाल मौजूद रहता है। इसके विपरीत, एकल प्रजाति आधारित वृक्षारोपण या वाणिज्यिक प्लांटेशन अक्सर जैव विविधता की दृष्टि से सीमित होते हैं। इसी बुनियादी अंतर को नजरअंदाज करने का परिणाम है कि देश जैव विविधता के गहराते संकट से जूझ रहा है और दिनोंदिन इसके स्तर में क्षरण हो रहा है ।
सच तो यह है कि विकास की दौड़ में हांफती प्रकृति, तेजी से बढ़ता प्रदूषण, भयावह स्तर तक फैलता शहरीकरण और अनियोजित विकास ने प्राकृतिक वनों पर व्यापक दबाव डाला है। पश्चिमी घाट क्षेत्र—जिसमें गोवा, केरल और कर्नाटक के हिस्से शामिल हैं—लंबे समय से जैव विविधता का वैश्विक हॉटस्पॉट माने जाते हैं। विभिन्न अध्ययनों में संकेत मिला है कि इस क्षेत्र के मूल वनों और विशिष्ट पारिस्थितिक तंत्रों का बड़ा हिस्सा खनन, कृषि विस्तार, बांधों और शहरीकरण से प्रभावित हुआ है। परिणामस्वरूप अनेक स्थानिक प्रजातियाँ संकटग्रस्त हुई हैं। उत्तर-पूर्वी भारत में भी वनों की कटाई, अवैध शिकार और भूमि उपयोग परिवर्तन ने पारिस्थितिक संतुलन को कमजोर किया है। यहां हिमालय, पश्चिमी घाट, इंडो-बर्मा और सुंडालैंड क्षेत्र चार प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉट माने जाते हैं। भारत विश्व के 17 मेगा जैव विविधता संपन्न देशों में शामिल है।
विश्व के कुल भूभाग का लगभग 2.4 प्रतिशत हिस्सा होने के बावजूद यहाँ वैश्विक प्रजातियों का लगभग 7 से 8 प्रतिशत पाया जाता है। जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अभिलेखों के अनुसार देश में 96,000 से अधिक जीव-जंतुओं और लगभग 47,000 पौधों की प्रजातियाँ दर्ज हैं। देश के 10 प्रमुख जैव-भौगोलिक क्षेत्रों—वर्षावन, रेगिस्तान, मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियाँ, घासभूमियाँ और पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र—में विशिष्ट जैविक संपदा मौजूद है।

जैव विविधता पर मंडराता खतरा

प्रकृति की चेतावनी को समझें
पेड़ और जंगल केवल हरियाली का प्रतीक नहीं, बल्कि पृथ्वी की जीवन रक्षक प्रणाली का आधार हैं। स्थलीय जैव विविधता का बड़ा हिस्सा वनों पर निर्भर है। प्राकृतिक वन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर जलवायु को संतुलित रखते हैं, मृदा अपरदन रोकते हैं, जलस्रोतों को संरक्षित करते हैं और असंख्य प्रजातियों को भोजन व आश्रय देते हैं। किंतु जब प्राकृतिक वन कटते हैं और उनकी जगह एकल प्रजाति के वृक्षों का रोपण किया जाता है, तो पारिस्थितिकीय जटिलता और जैविक विविधता का वह स्तर पुनर्स्थापित नहीं हो पाता। यही कारण है कि “नेट फॉरेस्ट कवर” में वृद्धि के बावजूद जैव विविधता में गिरावट की चिंता व्यक्त की जा रही है जो खतरनाक संकेत है। दुनिया के वैज्ञानिक बार-बार कह रहे हैं कि इंसान जैव विविधता के खात्मे पर आमादा है। अब तो वह समृद्ध जैव विविधता वाली भूमि कब्जाने में लगा है। 87 फीसदी विविधता से समृद्ध भूमि पर कब्जे की होड इसका जीता-जागता सबूत है।
जलवायु परिवर्तन इस संकट को और गहरा कर रहा है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित नहीं किया गया तो इस सदी के अंत तक प्रवाल भित्तियों का बड़ा हिस्सा समाप्त हो सकता है। सुंदरवन के मैंग्रोव वन, समुद्र-स्तर वृद्धि और चक्रवातों से जूझ रहे हैं। हिमालयी क्षेत्र में हिम तेंदुए जैसी प्रजातियाँ आवासीय क्षेत्र में बदलाव और मानवीय दबाव के कारण संवेदनशील स्थिति में हैं। कीट-पतंगों और परागण तंत्र के जीवनचक्र में बदलाव के संकेत मिले हैं, जो कृषि उत्पादन पर भी प्रभाव डाल सकते हैं। विकास परियोजनाओं के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है। देवभूमि के नाम से विख्यात उत्तराखंड में राज्य निर्माण के बाद सड़क, रेल और सुरंग परियोजनाओं को लेकर व्यापक सार्वजनिक बहस छिडी हुई है। यहां विकास के नाम पर देवदार, बांज, बुरांश, खरसू, मौरूं, फर, कैल, मुरेंडा प्रजाति के छोटे बड़े 10 लाख हरे पेड़ों को काट डाला गया है। बीते 8-9 सालों के दौरान ढाई लाख से ज्यादा पेड काट दिये गये हैं जिनमें से एक लाख से ज्यादा पेड आल वैदर रोड के नाम पर, शेष पर्यटन, देहरादून से लेकर दिल्ली तक सड़क चौडी़करण, ऋषिकेश – कर्णप्रयाग रेल परियोजना, सुरंग आधारित परियोजनाओं के नामपर बांज, राई, कैल और चीड जैसी प्रजातियों का तो अस्तित्व ही मिटा दिया गया है। हर साल सरकार वाणिज्यिक प्रयोग के नामपर 3 से 4 लाख पेड कटवाती है। इनमें सबसे ज्यादा राई, कैल, देवदार और चीड के पेड शामिल हैं। इससे भूस्खलन और बाढ का खतरा मंडरा रहा है। आने वाले बरसों में विकास योजनाओं के नामपर 5 हजार फीट की ऊंचाई से लगभग साढे आठ हजार ऊंचाई के जंगल के 3 लाख शंकुधारी प्रजाति के पेड़ों को काटे जाने की योजना है। मध्य प्रदेश में नई रेल लाइन के लिए 1.24 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है। सिंगरौली में कोयले की भूख के चलते घिराली कोल ब्लॉक के जंगलों में हजारों हरे-भरे पेड़ों का सफाया कर दिया गया है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में खनन और सड़क परिवहन योजनाओं से जंगल सिमटते जा रहे हैं और स्थानीय आजीविका का संकट पैदा हो गया है। यहां वन्यजीव भटक रहे हैं और जलस्रोत सूख गये हैं। गुस्साये ग्रामीण परियोजना बंद करने की मांग कर रहे हैं। कर्नाटक में हाल के वर्षों में 3 लाख से ज्यादा हरे-भरे वृक्षों को विभिन्न योजनाओं के नामपर काट दिया गया है। तेलंगाना में हाई वे चौडी़करण आदि विभिन्न परियोजनाओं के लिए हजारों हरे-भरे पेड़ों की कटाई को स्वीकृति दी गयी है। इससे गर्मी बढ़ेगी, बारिश कम होगी और हवा जहरीली होगी। अंडमान-निकोबार में ग्रेट निकोबार विकास परियोजना के नामपर 130 किलोमीटर के दायरे में एक से दस मिलियन तक पेडों के काटे जाने की योजना है। झारखंड की कारो ओपन कास्ट परियोजना के लिए भी लगभग 35 हजार पेड़ों की कटाई को मंजूरी मिली है, जिससे वन्यजीव आवास, पर्यावरण संतुलन और स्थानीय जीवन पर गहरा संकट खड़ा हो गया है।
हरियाली की गिनती या पारिस्थितिकी?
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार 1990 से 2020 के बीच भारत में करोड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र का शुद्ध ह्रास हुआ है। 2015 से 2020 के बीच के पांच सालों में 6,68,400 हेक्टेयर वनों का खात्मा हुआ। यह आंकड़ा दुनिया में ब्राजील के बाद दूसरा सबसे ज्यादा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 1990 से 2020 के बीच 42 करोड हैक्टेयर जंगलों का सफाया हुआ। भले इसके प्राकृतिक कारण रहे हों या मानवीय। देश में खनन, सड़क, उद्योग के नामपर साल 2014 से 2019 तक एक करोड नौ लाख पचहत्तर हजार आठ सौ चवालीस पेड काटे गये। आंकड़ों की मानें तो इस दौरान 20 गुणा से अधिक जंगल विकास यज्ञ की समिधा बने हैं। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल इस मामले में सर्वाधिक प्रभावित राज्य हैं। हकीकत यह है कि हर साल तकरीबन 22 लाख से ज्यादा पेड़ों की बलि विकास यज्ञ में दी जा रही है। यही नहीं राजस्थान में विकास के नाम पर कहें या सोलर ऊर्जा के नाम पर पिछले वर्षों से खेजड़ी के हजारों – लाखों पेड़ों की हर साल बलि दी जा रही है और यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है। वहां बीकानेर में नोखा दइया में खेजड़ी के पेड़ों की कटाई के विरोध में साल 2024 की जुलाई 18 से विरोध स्वरूप धरना जारी है। बीकानेर कलक्ट्रेट पर भी 18 जुलाई 2025 से धरना दे रहे किसान खेजड़ी की कटाई बंद किये जाने और इसका कानून बनाये जाने की मांग पर अड़े हैं। राज्य के लाखों किसान फरवरी माह की 2 तारीख से बीकानेर में महापड़ाव और हजारों महिलाओं का खेजड़ी के पेड़ों के साथ कलश प्रदर्शन कर चुकी हैं। गौरतलब है खेजड़ी के पेड़ों को विश्नोई समुदाय पूजता है।खेजड़ी उनकी आन-बान-शान और अस्तित्व का प्रतीक है। गौरतलब है खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा की खातिर माता अमृता देवी ने शताब्दियों पहले 363 लोगों के साथ बलिदान किया था। किसान खेजड़ी को बचाने हेतु अपना बलिदान देने को उतारू हैं। इसके अलावा चारागाहों पर बढ़ते मानवीय दखल, दुरुपयोग, शहरों के विस्तार, जनसंख्या वृद्धि, बढ़ती खाद्य और ईंधन की मांग और जलवायु परिवर्तन ने संकट को और भयावह बना दिया है। चारागाहों की 12.1 करोड हैक्टेयर जमीन बेकार होने से पालतू और वन्यजीव के सामने अपना पेट भरने की समस्या पैदा हो गयी है। भारत में आधिकारिक आंकड़े कुल वन आच्छादन में स्थिरता दर्शाते हैं, किंतु विशेषज्ञों का मत है कि प्राकृतिक वनों की गुणवत्ता और जैव विविधता का स्तर कम होने की प्रवृत्ति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वृक्षारोपण और प्राकृतिक वन के बीच यही पारिस्थितिक अंतर नीति-निर्माण के केंद्र में होना चाहिए लेकिन इसका अभाव समस्या का अहम कारण है।
पक्षियों और अन्य वन्यजीवों की अनेक प्रजातियाँ अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की लाल सूची में संकटग्रस्त श्रेणी में दर्ज हैं। देश में पक्षियों की दुर्लभ 25 प्रजातियां खत्म होने के कगार पर हैं। बीते पांच-छह सालों में देश में पीपल, नीम, महुआ, जामुन, शीशम सहित लगभग 53 लाख छायादार पेडो़ं का खात्मा हुआ है। इसके पीछे धान की पैदावार बढ़ाने की किसानों की लालसा है जो इन्हैं बाधा मानकर साफ कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में मुख्यत खनन, वनोन्मूलन और कृषि विस्तार से, असम, अरुणाचल और मेघालय में अवैध शिकार के चलते आर्किड, बांस और दुर्लभ प्रजातियों की तादाद कम हो रही है। तटीय राज्यों खासकर ओडीसा और गुजरात में औद्योगिक विकास के चलते समुद्री जीवन जैसे कछुए और मैंग्रोव वनों पर खतरा मंडरा रहा है। कीट पतंगों के जोड़े बढ़ती गर्मी के चलते न केवल बिछड रहे हैं बल्कि मौसम उनके मिलन में बाधा पहुंचा रहा है।अब तो बाहरी जीवों की आक्रामक प्रजातियों के एक जगह से दूसरी जगह पर घुसपैठ से भी जैव विविधता को नुकसान पहुंच रहा है।आईपीएबी की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। इस तरह की प्रजातियां पर्यावरण, अर्थ व्यवस्था और मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकती हैं। अंतर-सरकारी विज्ञान-नीति मंच ने आक्रामक बाहरी प्रजातियों को जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा बताया है, क्योंकि वे स्थानीय पारिस्थितिक संतुलन, अर्थव्यवस्था और मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं।
गौरतलब है कि जैव विविधता विनिमय योग्य नहीं है जबकि कार्बन विनिमय योग्य है। यदि किसी स्थान से जैव विविधता का एक अंश खो देते हैं या उसका वहां से ह्रास हो जाता है तो आप उसका एक अंश कहीं और नहीं जोड़ सकते। यह ऐसी मुद्रा नहीं है कि जिसका विनिमय किया जा सके। फिर जल, जंगल और जमीन का प्रश्न केवल हरित आच्छादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। वास्तविक चुनौती प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों की संरचना, उनकी जैविक विविधता और उनकी पुनरुत्पादक क्षमता को सुरक्षित रखने की है। वृक्षारोपण महत्वपूर्ण है, परंतु वह प्राकृतिक वनों का विकल्प नहीं हो सकता। जब तक नीति और विकास की प्राथमिकताओं में इस पारिस्थितिक अंतर को समझकर शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक जैव विविधता का संकट गहराता ही चला जाएगा। इसमें दो राय नहीं। (लेखक के अपने विचार हैं)

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