
लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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दक्षिण के बड़े राज्य तमिलनाडु में विधान सभा चुनाव अगले साल अप्रैल मई में होने वाले है। इन चुनावों को लेकर सत्तारूढ़ द्रमुक अभी से अपना वोट बैंक मजबूत करने में लगी है। इसी को लेकर वह मुस्लिम तुष्टिकरण को और आगे बढ़ा रही है। इस साझा सरकार में द्रमुक के सहयोगी दल कांग्रेस तथा वाम पंथी दल मामले में साथ दे रहे है। राज्य में प्रमुख विपक्षी दल अन्नाद्रमुक तथा बीजेपी मिलकर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। द्रमुक हर कीमत पर फिर सत्ता में आना चाहती है इसलिए वह हर ऐसा कदम उठा रही है जिससे उसका सत्ता में फिर आना सुनिश्चित हो सके।
राज्य के मदुरै जिले में एक सदियों पुराना सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर है। यह दो पहाड़ियों की तलहटी में बना हुआ है। यहाँ बड़ी संख्या में तीर्थ यात्री आते है। कार्तिक के महीने में इन तीर्थ यात्रियों की संख्या बढ़ जाती है। सदियों से चली आ रही परम्परा के अनुसार भगत गण मंदिर में पूजा अर्चना करने के बाद मंदिर के ठीक पीछे वाली पहाडी पर बने दीपथून (पत्थर से बना दीप स्तम्भ) पर दीपक जलाने आते है। इस परम्परा को कार्तिक दीप कहा जाता है क्योंकि या विक्रम सम्वंत्सर के कार्तिक महीने में आता है। इस पहाडी से लगती एक दूसरी पहाड़ी पर सिकंदर बादशाह की दरगाह है जो 17वीं सदी में बनी बताई जाती है ऐसा माना जाता है कि हिन्दू संगठन इस बार दीप उत्सव को और बड़ा करना चाहते थे, क्योंकि यहाँ आने वाले तीर्थ यात्रियों की संख्या में लगातार इजाफा हो। रहा है. यह दीप उत्सव 4 दिसम्बर से शुरू होना था। लेकिन अचानक द्रमुक सरकार ने जिला तथा पुलिस प्रशासन को यह निदेश दिया कि इस बार पहाडी पर जा कर दीप जलाने पर रोक लगा लगा दी जाये क्योंकि इसको लेकर साप्रदायिक तनाव हो सकता है। हालांकि दरगाह की प्रबंध समिति ने स्थानीय प्रशासन को यह लिखित में दे दिया था कि उन्हें दीप स्तभ पर दीपक जलाने की परंपरा पर कोई ऐतराज़ नहीं है।
इसके बावजूद प्रशासन ने अपना निर्णय बदलने से से इंकार कर दिया। शहर में हिन्दू समाज की ओर से प्रदर्शन और धरने भी दिए गए। पुलिस के साथ कुछ झड़पें भी हुई तथा कुछ हिन्दू नेताओं को गिरफ्तार भी किया गया।मामला मद्रास हाई कोर्ट में गया जहाँ कोर्ट की एक सदस्यों वाली पीठ ने सरकार को निदेश दिया कि सदियों से चली आ रही इस परंपरा को रोका नहीं जाना चाहिए। सरकार के निदेश पर जिला प्रशासन ने इस निर्णय को कोर्ट की एक बड़ी बेंच चुनौती। लेकिन बड़ी बेंच ने पहले के निर्णय को बदलने से इंकार कर दिया। फिर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पंहुचा। जहां जिला प्रशासन की याचिका को स्वीकार तो कर लिया लेकिन इस पर तुरंत सुनवाई से इंकार कर दिया।
उधर हिन्दू संगठनों ने दीप उत्सव को और बड़ा कर दिया। उनका कहना है कि द्रमुक शुरू से हिन्दू अथवा सनातन विरोधी रही है इसलिए वह ऐसे सभी कदम उठाती है जिससे हिंदुयों की आस्था और विश्वास कि ठेस पहुँचती हो। सरकार खुलकर मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर चल रही है। राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 6 प्रतिशत है। कुछ महीने पहले मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के बेटे उदयनिधी स्टालिन, जो मंत्री भी हैं, ने तो यहां तक कहा था कि देश में सनातन धर्म पर पाबंदी लगा दी जानी चाहिए। जब इसको लेकर हो हल्ला हुआ तो उन्होंने कहा कि उनकी बात को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है जबकि उनका आशय सनातन अथवा हिंदु धर्म का अपमान अथवा निरादर करना नहीं था।
तमिलनाडु में द्रमुक को पहला नाम द्रविड़ कड़गम ( डी के ) था। इसकी स्थापना पेरियार ने की थी। वे एक ब्रहामिन थे लेकिन उनका दल ब्रहामिनो के खिलाफ था वे उम्र भर इस समुदाय का विरोध करते रहे। धीरे-धीरे इस पार्टी का ब्रहामिन विरोध हिन्दू अथवा सनातन विरोध के रूप में बदल गया। जब राज्य में पहली बार द्रमुक सरकार बनी तथा अन्नादुरई को मुख्यमंत्री का पद मिला। तो द्रमुक ने अपने हिदू अथवा सनातन विरोधी स्वर को और धार देनी शुरू कर दी। राज्य में छोटे बड़े लगभग 30000 ऐसे मंदिर है जिनका प्रबंधन राज्य सरकार के धर्मस्थल बोर्ड के पास है। सरकार ने कि कि ऐसा जरूर नहीं के मंदिरों के पुजारी ब्रहामिन ही हो। सरकार ने धर्मस्थल बोर्ड के प्रबंधन वाले मदिरों में गैर ब्रहामिन पुजारी नियुक्त कि करना शुरू कर दिया। इनको लेकर हिन्दू सगठनों ने विरोध किया जो अभी भी किसी न कसी रूप में जारी है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)