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दहेज प्रथा का इतिहास भारतीय परंपराओं में से एक है इसका सूत्रपात अच्छे उद्देश्य के लिए किया गया था कि पुत्र अपने पिता की संपत्ति का उत्तराधिकारी है तो पुत्री को भी कुछ उपहार या धन विवाह के समय दिया जाए। वर्तमान में इसका उद्देश्य तो समाप्त हो गया और इस प्रथा ने विकृत रूप ले लिया इसके उद्देश्य और औचित्य में कालांतर में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते गए।
(१) उत्तर वैदिक काल
अथर्ववेद के अनुसार इस काल में “वहतु” के नाम से इस प्रथा का प्रचलन शुरू हुआ। वधू पक्ष अपनी पुत्री को अपने सामर्थ्य के अनुसार कुछ उपहार व धन राशि विवाह के समय भेंट स्वरूप देता था। वर पक्ष इसे सहर्ष स्वीकार कर लेता था । धर्म ग्रंथो व पौराणिक ग्रंथो में इसका कहीं भी उल्लेख नहीं है।
(२) मध्यकाल
इस समय तक दहेज को स्त्री धन के रूप में मान्यता मिलने लगी थी इसका उद्देश्य यह था कि विवाह के समय दिया जाने वाला धन संकट के समय उसकी पुत्री या उसके ससुराल वालों के काम आएगा, लेकिन अब इस प्रथा को महत्व दिया जाने लगा विशेष कर राजस्थान के उच्च व संपन्न राजपूतो ने इसे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा व संपन्नता का प्रतीक बना लिया बेटी को ज्यादा से ज्यादा उपहार व धन दिया जाने लगा यहीं से दहेज शब्द की उत्पत्ति हुई। अब हर समाज में यह संपन्नता का प्रतीक बन गया है।
(3) आधुनिक काल
इस समय में यह वधू पक्ष के सम्मान का प्रतीक बन गया है प्रत्येक पिता यह सोचता है कि ज्यादा से ज्यादा धन देकर अपनी बेटी के लिए सुयोग्य वर व धनी परिवार में रिश्ता किया जाए। वर पक्ष भी सरेआम अपने बेटों का सौदा करते हैं और अब यह वैवाहिक संबंधों का मापदंड बन गया है ।मध्यम वर्ग भी कर्ज लेकर अपनी सामर्थ्य से ज्यादा खर्च करता है ।इस प्रथा का नकारात्मक आधुनिकीकरण हुआ है। दहेज की पूर्ति नहीं होने पर लड़की को शारीरिक व मानसिक यातनाएं दी जा सकती है। कई घरों में तो नौकरानियों की तरह रखा जाता है । फटे पुराने कपड़े और रूखा सुखा खाना दिया जाता है । दहेज की आपूर्ति नहीं होने पर बहू को जिंदा तक जला दिया जाता है यह एक सामाजिक अभिशाप है।
दहेज के लिए जिंदा जलाने के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि हम किस मानसिकता में जी रहे हैं आए दिन अखबार में खबरें आती है और कुछ प्रकरण तो सुर्खियों में आते ही नहीं है।
(४) दहेज प्रथा के प्रति जागरूकता
भारतीय समाज पुरुष प्रधान समाज है भारतीय समाज में हमेशा ऐसी परंपराओं को बढ़ावा दिया जिसके अंतर्गत पुरुष को श्रेष्ठ साबित कर स्त्री को उसके अधीन करना था। दहेज प्रथा ऐसी ही कुप्रथा है। यह एक पारिवारिक व सामाजिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है इसे हम अपने निजी बलबूते, एवं मजबूत दृढ़ इच्छा शक्ति द्वारा ही समाप्त कर सकते हैं । यह एक सामूहिक सामाजिक दायित्व भी है कि इस प्रथा का विरोध करें, वह अपनी बेटी को जिंदा जलने से बचाए।
अपनी बेटियों को बोझ ना समझे उन्हें शिक्षित करें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाएं जब भी कोई वैवाहिक रिश्ता आए तो उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि की पूरी खोजबीन करें। वर पक्ष से बात के जरिए पता लग जाता है कि यह परिवार किस प्रवृत्ति का है अगर लालची प्रवृत्ति है तो ऐसा रिश्ता हरगिज ना करें ।यह जीवन भर आपको तकलीफ देगा अपने ही स्तर पर किसी सामान्य परिवार में रिश्ता करें जहां आपकी बेटी सुख से रह सके । उसका आत्मसम्मान बना रहे। इसके बावजूद भी अगर उसको प्रताड़ित किया जाता है तो आप कानूनी मदद ले सकते हैं।
(१) इसके लिए पीड़िता न्यायालय में परिवाद पेश कर सकती है।
(२) राष्ट्रीय महिला आयोग राज्य महिला आयोग आंगनबाड़ी केंद्र की सहायिका को भी सूचित किया जा सकता है।
(३) पीड़िता की प्रार्थना पर नि:शुल्क विधिक सहायता मिलेगी।
(४) इसमें अभियुक्त को जमानत नहीं मिलती है।
(५) दहेज प्रकरण में राजीनामा नहीं होता है।
(६) पुलिस बिना किसी गिरफ्तारी वारंटी के आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है।
(७) परिवाद पेश करने पर प्रसंज्ञान लेकर न्यायालय में अन्वीक्षा की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
1985 मैं दहेज निषेध नियमों को तैयार किया गया इसके अंतर्गत शादी में दिए जाने वाले उपहार की हस्ताक्षरि त सूची बना ली जाए ।लेकिन व्यावहारिक रूप से यह नियम लागू नहीं हुआ। (लेखिका का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)
लेखिका : लता अग्रवाल, चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)।