
लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)
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दो-तीन वर्ष पुरानी बात है। ईद का त्यौहार था सुबह लगभग 7:00 बजे का समय था। मूसलाधार बारिश हो रही थी। मैं अपने कमरे में आस्था चेनल लगा कर प्राणायाम कर रही थी। तभी एक लंबा सा आदमी रेनकोट पहने अंदर आया बाहर मेरे किराएदार खड़े थे उनसे कुछ कहा कि- हमें चाय पीनी है उसने मना कर दिया कि यहां पर कोई नहीं है। यह सुनकर वह व्यक्ति वापस चला गया। मैं स्पष्ट रूप से नहीं सुन सकी क्योंकि अन्दर टी वी चल रहा था।
यह सब मैं अपने कमरे के अंदर बैठकर खिड़की के बाहर जाली से देख रही थी। मैंने जल्दी से बाहर निकल कर फाटक पर जाकर देखा। मेरा घर मुख्य सड़क पर है और सामने ही चौराहे पर ईद के कारण पुलिस के दो कर्मचारियों की ड्युटी लगी थी। मैं उनके पास गई- सर कुछ चाहिए। एक पुलिसकर्मी बोला-मेडम चाय पीनी है, बारिश हो रही है, कोई भी होटल नहीं खुलीं है और ड्युटी छोड़ कर चाय पीने कहीं नहीं जा सकते।
मैंने कहा- मैं आपके लिए चाय बनाकर लाती हूं। अन्दर आकर दो कप चाय बनाकर ट्रे में चाय के साथ नमकीन और बिस्किट रखकर मैं फाटक के बाहर ले गई क्योंकि ड्यूटी पर होने के कारण वे अन्दर आकर चाय नहीं पी सकते थे। फाटक पर जाकर मैंने आवाज दी वे घर के बाहर आ गए सड़क पर चाय पीना संभव नहीं था कारण मूसलाधार बारिश हो रही थी। घर के फाटक पर बाहर कुछ जगह पर ऊपर छत है, वहीं पर खड़े-खड़े उन्होंने चाय नाश्ता किया, उसी वक्त पुलिस अधिकारियों की गाड़ी गश्त पर निकली, मैंने हाथ से इशारा किया कि ये चाय पी रहै है वे आगे निकल गए। चाय पीने के बाद वे मेरा आभार व्यक्त करने लगे और बोले -मैडम हमें चाय की सख्त जरूरत थी। चाय पीकर जो आत्म संतुष्टि का भाव उनके चेहरे पर आया वो देख कर मेरा मन खुशी से झूम उठा।