कर्नाटक में जातीय जनगणना पर घोर विवाद

लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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दक्षिण के कर्नाटक राज्य में हाल ही में दूसरी बार करवाई गई जातीय जनगणना पूरी हो गई है . लेकिन इसको लेकर शुरू हुई राजनीति खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है . यह मामला कर्नाटक हाई कोर्ट तक भी पहुँच गया था . लेकिन कोर्ट ने इस पर स्थगन देने से इंकार कर दिया. पर कर्नाटक पिछड़ा वर्ग आयोग, जिसने यह जातीय जनगणना करवाई है, को सारी प्रक्रिया में कुछ बदलाव करने का निदेश दिया था ताकि इसे पूरी तरह समाहित बनाया जा सके।
संविधान में प्रदत्त शक्तियों के अनुसार देश में जनगणना अथवा जातीय जनगणना का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है . इसलिए पतली गली के जरिये राज्य सरकार ने इसे सामाजिक , आर्थिक और शैक्षणिक सर्वेक्षण का नाम दे दिया . जबकि इसका वास्तविक उद्देश्य राज्य में विभिन्न जातियों तथा उप जातियों की सही संख्या का अंदाज़ लगाना था . इसके पीछे मुख्य उद्देश्य राजनीतिक था . इस जातीय जनगणना के पीछे असल बात यह है कि जातीय संख्या के आधार पर चुनावों में उम्मीदवारों का चयन किया जा सके . यह भी कहा गया कि प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग की संख्या को कम आँका गया है जबकि इन समुदाय की वास्तविक संख्या पुराने चले आ रहे आंकड़ों से कहीं अधिक है . इसलिए सरकारी कल्याणकारी योजनायों का सब को लाभ नहीं मिल रहा।
राज्य में इस प्रकार की जातीय जन जनगणना दूसरी बार हुई है . पहली जातीय जनगणना 2015 में हुई थी . इस समय राज्य में कांग्रेस पार्टी की सरकार थी और वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारामिया ही राज्य के मुख्यमंत्री थे . वे कुरबा समुदाय से आते हैं जो राज्य का एक बड़ा पिछड़ा समुदाय है . राज्य में पिछड़ा वर्ग की संख्या लगभग 60 प्रतिशत या इससे भी कम मानी जाती रही है जबकि इस समुदाय का कहना है की सही संख्या 70 प्रतिशत से कम नहीं।
पिछली जातीय जन गणना की रिपोर्ट 2018 में आ गई थी . इस काम पर कुल 260 करोड़ रूपये खर्च हुए थे . उस समय राज्य में विधानसभा के चुनाव सिर थे इसलिये सरकार के पास इसे स्वीकार करने का समय नहीं था . इन चुनावों के बाद राज्य में बीजेपी की सरकार आ गई विधान सभा में कभी मुख्य विपक्षी दल रही बीजेपी ने सत्ता में आने के बाद इस आयोग के रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया. हालाँकि इसके आंकड़े लीक होकर अखबारों की सुर्खियाँ बन चुके थे . 2023 में जब कांग्रेस फिर सत्ता में आई और सिद्धारामिया फिर मुख्यमंत्री बने तो उन पर दवाब था कि अब आयोग की रिपोर्ट को जारी किया जाये. राज्य में लिंगायत तथा वोक्कालिंगा दो बड़े समुदाय है . दोनों ही पिछड़ा वर्ग में आते है. इन दोनों समुदायों का राज्य की राजनीति पर वर्चस्व बना हुआ है . इन दोनों समुदायों का दावा था की राज्य में उनकी संख्या 17 तथा 15 प्रतिशत है . जब कि आयोग की जातीय रिपोर्ट में ये मात्र 13 और 12 प्रतिशत ही है।
सरकार ने इस साल फ़रवरी में इस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया इसको लेकर बड़ा बवाल हुआ . न केवल बीजेपी बल्कि कांग्रेस के कई नेताओं ने इस रिपोर्ट के आंकड़ों को गलत बताया. उन्होंने मांग की यह जातीय गणना को फिर से करवाया जाये . लम्बे समय तक दवाब में रहने के बाद सिद्धरामिया ने फिर से जातीय जनगणना करवाने के घोषणा की . जनगणना की शर्तों , नियमों तथा प्रक्रिया को लेकर कई बैठकें हुई .अंत में कुल मिलाकर लगभग 1500 से जातियों और उप जातियों को इस सर्वेक्षण में शामिल करने का निर्णय किया गया . राज्य में ईसाई समुदाय संख्या लगभग 10 लाख है . इन्हें 33 उप जातियों में बांटा गया . उनको जनगणना के फार्म में लिखना जरूरी था कि वे किस समुदाय से धर्म परिवर्तन कर ईसाई बने हैं . ऐसे ही लिंगायत समुदाय को यह छूट दी कि वे अपने आपको गैर हिन्दू कह सकते है . हाई कोर्ट के आदेश के बाद यह छूट भी दे दी गई कि अगर कोई चाहे तो वह अपने आप को इस जनगणना से अलग रख सकता है . लगभग 4 लाख परिवारों ने अपने आप को इस गणना से अलग रखा , इसमें प्रमुख आईटी इनफ़ोसिस कंपनी के नारायण मूर्ति और उनका परिवार भी था . केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने भी अपने को इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया. इनका कहना था कि इस क्रिया का मूल उद्देश्य उच्च जातियों को कमतर दिखाना है. आयोग ने जनगणना का काम पूरा कर लिया है तथा अगले कुछ महीनों में अपनी रिपोर्ट सरकार को दे देगा . इसके बाद क्या राजनीति होगी इसको लेकर अभी कुछ कहना कठिन है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)

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