तमिलनाडु में सत्ता में भागीदारी की लड़ाई

लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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तमिलनाडु की धरुवीकरण वाली राजनीति में दो क्षेत्रिय दल द्रमुक और अन्नाद्रमुक पिछले लगभग छः दशकों बारी बारी से सत्ता में आते रहे हैं। हालाँकि दोनों दल एक दूसरे की कट्टर विरोधी हैं। इनकी राजनीतिक सोच भी अलग है। लेकिन इन दोनों में एक समानता भी है। जब भी ये दोनों दल अपने छोटे स्थानीय दलों के साथ सत्ता में आये उन्होंने इन छोटे दलों को सत्ता में हिस्सेदारी नहीं दी। यानि ये दोनों दल सत्ता पर खुद ही काबिज़ रहे। लेकिन आने वाले विधानसभा चुनावों पूर्व पहली बार ऐसा हो रहा है कि इन दोनों दलों के छोटे सहयोगियों ने साफ़ कह दिया है कि एक अगर उनका सहयोग सत्ता में आने के लिए लेना है तो उनको सत्ता में भागीदारी भी देनी होगी। यानि उनके निर्वाचित सदस्यों को भी मंत्री बनाना होगा।
राज्य में कांग्रेस पिछले छः दशकों से सत्ता से बाहर है। इस अवधि के अधिकतर समय इसने द्रमुक के साथ मिलकर ही चुनाव लड़ा। पिछले विधान सभा चुनावों में द्रमुक को कुल 234 सीटों में 133 सीटें मिली। इन चुनावों में कांग्रेस के 18 उम्मीदवार भी जीते। कांग्रेस चाहती थी कि उनके कुछ सदस्यों को मंत्री पद दिया जाये। लेकिन द्रमुक के नेता तथा तमिलनाडु के नए बने मुख्यमंत्री ने एम.के.स्टालिन ने साफ़ मना कर दिया। द्रमुक अपने अन्य कुछ सहयोगी दलों को भी साफ़ कह दिया किउन्हें किसी भी तरह सत्ता में भागीदारी नहीं मिलेगी।
चूँकि इस बार राज्य मेंचुनावी मुकाबला कड़ा होने संभावना है इसलिए कांग्रेस पार्टी के स्थानीय नेता यह बात लगातार दोहरा रहे हैं कि वे इस बार द्रमुक ले साथ मिलकर तभी चुनाव लड़ेंगे अगर द्रमुक वायदा करे अगर वह सत्ता में आती है तो उनके कुछ सदस्यों को मंत्री पद देना जरूरी होगा। उधर द्रमुक के नेताओं भी कहा दिया कि अगर उनकी पार्टी फिर सत्ता में आई तो पहले की तरह कांग्रेस सहित अन्य छोटे सहयोगी दलों कोई मंत्री पद नहीं देगी
कांग्रेस पार्टी आला कमान ने गिरीश चोडनकर के नेतृत्व में एक कमिटी बनाई है जिसका काम द्रमुक के नेताओं के साथ विचार विमर्श करके दोनों दलों के बीच सीटों का बंटवारा करना है . पार्टी के ये बड़े नेता राज्य के प्रभारी भी है . विधानसभा के चुनाब बहुत नज़दीक हैं लेकिन अभी तक सीटों के बारे में कोई गंभीर बातचीत नहीं हुई है . पिछले दिनों एक लम्बी बैठक में उनकी स्थानीय नेताओं के साथ खुलकर बातचीत हुई. बैठक में आमराय यह थी कि द्रमुक के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला तभी किया जाये जब द्रमुक सत्ता में आने पर कांग्रेस को सत्ता में भागीदारी देने पर सहमत हो। यह भी कहा गया कि इस बार पार्टी को अपना अलग से घोषणा पत्र भी जारी करना चाहिए। पिछले विधानसभा चुनावों में पार्टी को लगभग 5 प्रतिशत वोट मिले थे। राज्य कांग्रेस के कुछ नेता इस विचार के है कि अगर द्रमुक सरकार में भागीदारी पर सहमत नहीं होती तो इस बार पार्टी का अपने बल पर चुनाव लड़ना चाहिए।
उधर अन्नाद्रमुक का लम्बे समय से झुकाव बीजेपी की ओर रहा है . बीजेपी एक बार एक लोकसभा सीट जीतने में सफल रही . केंद्र में द्रमुक एन.डी. ए. की घटक हैं जब कि राज्य में बीजेपी के उपस्थिति नगण्य सी है . पिछले विधान सभा चुनावों में अन्नाद्रमुक को 66 सीटें मिली जब कि बीजेपी को 4 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। इसके एक अन्य घटक पी एम के .को पांच सीटें मिली . इस बार अन्नाद्रमुक को भरोसा है कि वह विधानसभा चुनाव जीतेगी . पार्टी के नेताओं ने साफ़ कह दिया है कि अगर वह राज्य फिर सत्ता में आई तो बीजेपी अथवा अन्य सह्योगी दल को सत्ता में भागीदारी नहीं देगी।
बताया जाता है द्रमुक नेताओं द्वारा यह कहे जाने बाद केंद्रीय गृह मंत्री तथा बीजेपी के चाणक्य समझे जाने वाले अमित शाह ने द्रमुक के सभी बड़े नेताओं को साफ़ कहा कअगर गठबंधन में रहना है तो इसकी नीतियों पर भी चलना होगा। उन्होंने साफ़ कह दिया कि सीटों के बंटवारे में बीजेपी को कम से कम 56 सीटें देनी होंगी, इसके साथ यह भी कह दिया कि अगर गठबंधन सत्ता में आने में सफल होता तो बीजेपी के कम से कम 3 विधयाकों को मंत्री पद भी देना होगा . इसके बाद द्रमुक के नेताओं ने इस मामले चुप्पी सी साध ली। ऐसा माना जाता है अन्नाद्रमुक किसी भी कीमत पर एन डी. ए नहीं छोड़ना चाहती इसलिए देरसवेर उनको बीजेपी की यह शर्त माननी होगी। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)

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