
लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)
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कहा जा रहा है कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा। आबादी के अनुपात में धरती के अंदर पानी कि कमी है। इसका मुख्य कारण है जल का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है। जिन घरों में ट्यूबवेल है वे पानी का अत्यन्त दुरुपयोग करते हैं। रेगिस्तान में पानी की इतनी कमी है कि पीने का पानी मीलों दूर से घड़े भर-भर कर लाना पड़ता है। शहरों, गांवों में ग्रीष्म ऋतु के आगमन के साथ ही पानी की दिक्कत शुरू हो जाती है। सरकार समय रहते जल प्रबंधन की व्यवस्था करें। जहां पर भी बावडिया, कुएं, नदियां हैं उनकी सफाई करवाई जाए ताकि उस पानी को काम में लिया जा सके। निजी ट्यूबवेल खुदवाने का लाइसेंस नहीं दिया जाए। जितने भी सार्वजनिक नल गलियों में, शहरों में लगे हुए हैं उनको ठीक करवाएं जाए। जिन सरकारी नलों में टूटियां नहीं लगी है सबसे पहले इस काम को पूरा किया जाए ताकि व्यर्थ में पानी न बहता रहे। जल आपूर्ति का समय तय करें और निर्धारित समय के बाद पानी की आपूर्ति बंद कर दी जाए। इसके साथ-साथ आमजन का भी दायित्व है कि वह पानी को व्यर्थ में ना बहाएं।
घरेलू स्तर पर भी पानी की बचत की जा सकती हैं। कपड़े रोज नहीं धोए इकठ्ठे कर के धोए जा सकते हैं। पोंछें का पानी गमलों में डाला जा सकता है। बर्तन सीधे सिंक में न धोकर बाल्टी में पानी भर कर धोए इससे पानी की बचत होगी। रसोई में पानी पीने के लिए छोटी गिलासों का इस्तेमाल करें। मेहमान को भी उसी में सर्व करें बड़ी गिलासों में पानी कई बार पूरा खत्म नहीं होता और व्यर्थ जाता है। वाहन को पाइप लगाकर नहीं धोए, गीले कपड़े से साफ कर लें। (लेखिका के अपने विचार हैं)