
लेखक : संजय राणा
लेखक ख्यात सामाजिक कार्यकर्ता एवं पर्यावरणविद हैं।
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40 वर्ष पहले लिखा गीत, आज के माहौल में बिलकुल सटीक बैठता है।
दरअसल वर्ष 2024 की कार्तिक पूर्णिमा का पर्व भी संपन्न हुआ, बड़ी संख्या में समाज ने गंगा स्नान कर अपने को धन्य बनाया होगा और वापस घर लौट गये। मगर आज मुझे सन् 1985 की एक फिल्म “राम तेरी गंगा मैली” का एक गाना बहुत याद आ रहा है, संभवतः आप सब ने भी इसे अवश्य ही सुना होगा । मगर एक गाने की ही तरह, याद नहीं आया होगा। चलो हम आज उसे आप के सामने शब्दों के साथ रख देते हैं :-
“सुनो तो गंगा ये क्या सुनाए
के मेरे तट पर जो लोग आए
जिन्होंने ऐसे नियम बनाए
के प्राण जाए पर वचन न जाए
गंगा हमारी कहे बात ये रोते रोते।
राम तेरी गंगा मैली हो गई
पापियों के पाप धोते धोते
हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है।
ऋषियों के संग रहनेवाली पतितों के संग रहती
ना तो होठों पे सच्चाई नही दिल मे सफ़ाई
करके गंगा को खराब देते गंगा की दुहाई
करे क्या बिचारी इसे अपने ही लोग डुबोते …
राम तेरी गंगा मैली हो गई
पापियों के पाप धोते धोते
वही है धरती वही है गंगा बदले है गंगावासी
सबके हाथ लहू से रंगे हैं मुख उजले मन काले
दिये वचन भुलाके झूठी सौगंध खाके
अपनी आत्मा गिराके चलें सरको उठाके
अब तो ये पापी गंगा जल से भी शुद्ध न होते …
राम तेरी गंगा मैली हो गई
पापियोंके पाप धोते धोते”
अब अवश्य ही याद आ गया होगा, यह गाना आज से 40 साल पहले लिखा गया और फिल्माया गया था। एक एक शब्द नश्तर की तरह चुभते है, क्या गजब की शब्दों द्वारा भविष्यवाणी की गई, एक-एक लाईन और शब्दों को विस्तार में खोला जाए तो आज के समाज और राज की शत प्रतिशत सच्चाई निकल कर सामने आ जाती है। समाज जो लोगों के समूह से बनता है जिसमें आम लोग भी है, तथाकथित संत समाज भी है, उद्योगपति भी हैं, नौकरशाह भी हैं और जिनमें गंगा की कसम खा कर राज करने वाले नेता भी है।
आईए चलिए इन शब्दों की सच्चाई को सबसे पहले अपने से अर्थात आम इंसान से ही समझने का प्रयास करते हैं:
“सुनो तो गंगा ये क्या सुनाए
के मेरे तट पर जो लोग आए
जिन्होंने ऐसे नियम बनाए
के प्राण जाए पर वचन न जाए”
समाज:- आम इंसान
आज के दौर में नजर और वचनों की कीमत सबसे ज्यादा गिरी है, इन दोनों की महत्ता क्या है यह किसी से छिपी नहीं है, तभी तो
*सड़कों पर हम जय श्री राम का नारा लगाते है मगर भाई से कचहरी में मुलाकात होती है।
*सार्वजनिक मंचों से नैतिकता का भाषण दिया जाता है और अपने माता-पिता वृद्धाश्रम में।
*तथाकथित गौ सेवक गाय के नाम पर धंधा करते पकड़े जाना आम सा हो गया है, इसीलिए हमारा देश गौ मांस के निर्यात में विश्व के प्रथम 5 देशों में शुमार है, इसके बावजूद भी गाय हमारी मां है।
*मित्रता की पहचान करनी हो तो एक बार उधार रुपया दे दो फिर देखो जुबान की कीमत।
*चरित्र हीनता का आलम यह है कि बेटियों की कोई उम्र सुरक्षित नहीं, ऐसी-ऐसी घटनाएं सुनने और पढ़ने को मिल रही है कि मन करने लगा है कि सृष्टि का अंत हो जाय।
*वचनों की कीमत रिश्तों में तौलिए, कोई गरीब है तो कोई रिश्तेदार संबंध रखने को राजी नहीं और अगर धनवान है तो अंजन भी रिश्ता बनाने में शान समझते हैं।
वाह क्या गजब का इंसान है और हां उन्होंने भी आज गंगा जी में स्नान कर मां को धन्य किया होगा साथ ही मां गंगा में अपने पहने कपड़ों का दान अवश्य किया होगा जिससे मां गंगा निर्वस्त्र न रहे। अपने जन्म देने वाले माता-पिता वृद्धाश्रम में दूसरों के दान से दिए कपड़े पहनते हैं और यहां कपड़े से लेकर सिक्को तक का दान, शाबाश।
हम उस देश के वासी हैं जिस देश मे गंगा बहती है,
ऋषियों के संग रहनेवाली पतितों के संग रहती हैं,
ना तो होठों पे सच्चाई नहीं, दिल में सफ़ाई है,
करके गंगा को खराब देते गंगा की दुहाई हैं,
करे क्या बिचारी इसे अपने ही लोग डुबोते हैं …
समाज,साधु और संत
पौराणिक कथाओं में उल्लेख है कि जिस समय मां गंगा पृथ्वी लोक पर अवतरित हो रही थी तो भगवान शिव से मां ने सवाल किया था कि प्रभु “पृथ्वीलोक पर जब मैं लोगों के पाप धोते -धोते थक जाऊंगी तो मेरी कौन मदद करेगा तब भगवान शिव ने कहा था कि साधु संत समाज मदद करेगा और हां जिस दिन यह समाज अपने कार्य से मुंह फेर लेगा तो गंगा पृथ्वीलोक से विलुप्त हो जाएगी”।
आज का संत समाज संत कम व्यापारी ज्यादा हो गया है, तीर्थ स्थलों पर विराजमान मठाधीशों के मठों का गंदा पानी गंगा में ही प्रवाहित होता है और गजब की बात वही तथाकथित संत समाज गंगा की सफाई के नाम पर करोड़ों रुपया लेकर गंगा आरती का पाखंड करता है, तो कही दीप प्रज्वलित कर मंचों से गंगा की सफाई का आव्हान करता है, है ना गजब? तन पर बेशक गेरुवा वस्त्र धारण किया गया हो मगर हैं भेड़िए।
11 अक्टूबर 2018 में गंगा के सच्चे पुत्र ने 111 दिन के अनशन के बाद अपनी देह त्याग दी थी, उस गंगा पुत्र का नाम स्वामी सानंद / प्रोफ़ेसर जीडी अग्रवाल था। देश के प्रथम पर्यावरणविद जिन्होंने बर्कले विश्वविद्यालय (अमेरिका) से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की थी, उनकी मांग गंगा की अविरलता और निर्मलता ही तो थी, मगर अफ़सोस समाज और सरकार को उनकी बात सुनने की फुर्सत ही नहीं मिली। तथाकथित संतों के मुंह से एक शब्द भी उनके समर्थन में नहीं निकला था, उसका मात्र एक ही कारण था कि कही उनका गंगा के नाम पर धंधा न चौपट हो जाय। इस देश में लाखों स्वैछिक संघटन गंगा और अन्य नदियों के नाम पर अपनी दरिद्रता दूर करने में लगे हैं। मगर अफ़सोस उनमे से चंद को छोड़ कर बाकि स्वामी सानंद जी का नाम भी नहीं जानते।
भगवान शिव की वाणी लगता है अब सत्य होने जा रही है। मां विलुप्ति के कगार पर आ चुकी है।
वही है धरती वही है गंगा बदले है गंगावासी, सबके हाथ लहू से रंगे हैं मुख उजले मन काले हैं
दिये वचन भुलाके झूठी सौगंध खाके
अपनी आत्मा गिराके चलें सर को उठाके
अब तो ये पापी गंगा जल से भी शुद्ध न होते …
समाज, राज अर्थात नेता, नौकरशाह और उद्योगपति
क्या गजब लिखा, आह लेखक की 40 वर्ष पहली दृष्टि, दाद देनी पड़ेगी।
“मुझे ना किसी ने भेजा है और ना मैं आया हूँ, मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है” याद होंगे ये शब्द मगर अब तो गंगावासी ही बदल गए तो बेचारी गंगा क्या करें। 22500 करोड़ रुपया खर्च करने के बाद भी गंगा मैली ही है, अब तो अदालतें भी मान चुकी हैं कि गंगा का पानी स्नान करना तो दूर आचमन लायक भी नहीं रहा। जिन नेताओं और नौकरशाहों का अरबों रुपया खा कर भी भला नहीं हुआ वे किस मुंह से सरकाे उठा कर चल देते हैं। जो मां गंगा को दिया वचन पूरा नहीं कर सका हो, वह कैसे सर उठा कर बात कर सकता है, वास्तव में ये लोग तो गंगा जल से भी शुद्ध नहीं हो सकते।
इनकी गलती नहीं है इन्हें मालूम है कि गंगा पर निर्भर देश की तकरीबन 50 करोड़ जनता मुर्दा हो चुकी है, इन मुर्दों में जान न पड़े इसीलिए देश के कोने-कोने में आज वर्ष 2047 तक देश की नदियों को निर्मल करने का ढोल पीटा जा रहा है।
इस ढोल को पीटने वालों में कुछ चतुर और शातिर किस्म के तथाकथित समाजसेवी, इसी प्रकार के कुछ संत समाज के लोग और इन सब के ऊपर नेता व नौकरशाह तो है ही।
जिस देश में नेता – नौकरशाह -उ द्योगपतियों का गठजोड़ रहेगा, तब तक देश की नदियां स्वच्छ नहीं हो सकतीं। गंगा यमुना के नाम पर व्यवस्थाओं में बैठे लोगों ने 30 हजार करोड़ से अधिक धन खा कर डकार भी न ली तौ नदियां मैली हो गईं।
(यह लेख लेखक ने 2024 में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लिखा था जो आज भी प्रासंगिक है।)