भारत की सोलर फैक्ट्रियाँ पकड़ रहीं रफ़्तार, पर आधी क्षमता अब भी ठप

निशांत की रिपोर्ट
लखनऊ (यूपी) से
www.daylifenews.in
भारत में सोलर मैन्युफैक्चरिंग का माहौल इन दिनों अजीब तरह की दो आवाज़ें सुन रहा है. एक तरफ जश्न, क्योंकि देश ने पहली बार polysilicon और wafer जैसे मुश्किल हिस्सों में भी वास्तविक क्षमता खड़ी करना शुरू किया है. दूसरी तरफ एक चिंता, क्योंकि ये क्षमता अभी अपनी पूरी ताकत से चल ही नहीं पा रही.
यह दोहरी तस्वीर सामने रखी है IEEFA (Institute for Energy Economics and Financial Analysis) और JMK Research की नई संयुक्त रिपोर्ट ने, जिसे आज जारी किया गया।
रिपोर्ट कहती है कि सरकार की Production Linked Incentive यानी PLI स्कीम ने सोलर सेक्टर को नई गति ज़रूर दी है. 2021 के 4,500 करोड़ रुपये से शुरू होकर, 2022 में 19,500 करोड़ रुपये और फिर कुल 24,000 करोड़ के पैकेज ने उद्योग को लंबे समय बाद ऐसा प्रोत्साहन दिया जिसकी कमी बरसों से महसूस हो रही थी।
लेकिन जमीन पर तस्वीर उतनी सरल नहीं. PLI में जितनी क्षमता का दावा किया गया था, उसका आधा हिस्सा ही अभी ऑपरेशनल है. रिपोर्ट के मुताबिक जून 2025 तक देश ने 3.3 GW polysilicon, 5.3 GW wafer, 29 GW solar cell और करीब 120 GW module क्षमता खड़ी कर ली है. पहली बार upstream वैल्यू चेन में ये प्रगति नोट करने लायक है।
पर IEEFA–JMK Research साफ कहती है कि यह उपलब्धि अपनी पूरी ताकत में तब बदलेगी जब घोषित 65 GW मॉड्यूल क्षमता के मुकाबले महज़ 31 GW की चालू क्षमता जैसी खाइयों को भरा जाएगा. निवेश के लक्ष्य और वास्तविक निवेश के बीच का फर्क भी बड़ा है. अनुमानित 94,000 करोड़ के मुकाबले अब तक 48,120 करोड़ रुपये ही लगे हैं।
यह रिपोर्ट, जिसे लिखा है आईईईएफ़ए की विभूति गर्ग और जेएमके रिसर्च के प्रभाकर शर्मा, चिराग तेवानी और अमन गुप्ता ने, यह भी चेतावनी देती है कि अगर विस्तार समय पर नहीं हुआ तो कंपनियाँ 41,834 करोड़ रुपये तक का संभावित नुकसान झेल सकती हैं।
रिपोर्ट के लेखकों का तर्क स्पष्ट है. भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती upstream से आ रही है, जहाँ polysilicon और wafer जैसे हिस्सों के लिए देश अब भी लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर है. global कीमतों में तेज गिरावट भारतीय निर्माताओं की लागत-प्रतिस्पर्धा को और मुश्किल बनाती है. ऊपर से तकनीकी उपकरणों और skilled मनपावर की कमी तस्वीर को और जटिल बनाती है।
IEEFA और JMK Research का आकलन है कि भारत ने दिशा सही पकड़ ली है, पर रास्ता आसान नहीं. दुनिया की सोलर सप्लाई चेन जिस तेज़ी से बदल रही है, उसमें भारत के पास मौका भी है और चुनौती भी. मौका इस बात का कि वह वैश्विक खिलाड़ी बन सके. चुनौती इस बात की कि ऐसा तभी होगा जब upstream, downstream, तकनीक, वित्त और नीति—सभी स्तंभ एकसाथ मजबूत हों।
रिपोर्ट का निचोड़ यही कहता है कि PLI ने दरवाज़ा खोल दिया है, पर कमरे को रोशन करने के लिए अभी काफी काम बाकी है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)

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