भारत का पानी युद्ध और अगली पीढ़ी के लिए चेतावनी – संजय राणा

जल देवता से जल संकट तक :
देश के कर्णधारों की नज़र में ‘घंटा प्रश्न’
लेखक : संजय राणा
लेखक ख्यात सामाजिक कार्यकर्ता एवं पर्यावरणविद हैं।
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भारत की सभ्यता जल से जन्मी, जल से पली और जल से ही पहचानी गई है। नदियाँ यहाँ केवल भौगोलिक संरचनाएँ नहीं रहीं, वे संस्कृति, आस्था और जीवनदायिनी शक्ति रहीं हैं। “जल ही जीवन है” कोई नारा नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन का मूल था। किंतु आज, इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में, यही भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ पानी पूजा का विषय नहीं, बल्कि संघर्ष और व्यापार का साधन बन चुका है। यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ, बल्कि वर्षों की उपेक्षा, अदूरदर्शी नीतियों और सामाजिक उदासीनता का परिणाम है। इसी वजह से सम्पूर्ण देश में नदियां और जल स्रोत दूषित हैं। हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिंघल कर अस्तित्व खोते जा रहे है, भूमिगत जल स्रोत दूषित होता जा रहा है।
पानी का व्यापार : संकट का सबसे बड़ा संकेत
आज भारत में बोतलबंद पानी, आर ओ-फिल्टर, जल उपचार संयंत्र और निजी जल आपूर्ति को मिलाकर पानी से जुड़ा बाजार लगभग 5 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच चुका है। यह आँकड़ा किसी आर्थिक सफलता का प्रमाण नहीं, बल्कि इस सच्चाई का उद्घाटन है कि स्वच्छ और सुरक्षित पानी अब सहज उपलब्ध नहीं रहा। जब किसी देश में पानी का कारोबार इतना बड़ा हो जाए, तो यह मान लेना चाहिए कि वहाँ पानी की कमी, असमान उपलब्धता और भय मौजूद है। भारत में पानी अब अधिकार नहीं, खरीदने योग्य वस्तु बनता जा रहा है।
दूषित पानी : मूक हत्यारा
जल संकट केवल सूखे या कमी तक सीमित नहीं है, इसका सबसे भयावह चेहरा दूषित पानी है। उपलब्ध स्वास्थ्य आँकड़ों के अनुसार—

  • भारत में असुरक्षित पानी, खराब स्वच्छता और गंदे पर्यावरण के कारण हर वर्ष लगभग 4 से 5 लाख लोगों की मृत्यु होती है।
  • डायरिया, टाइफाइड, हैजा और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियाँ आज भी लाखों भारतीयों को प्रभावित करती हैं।
  • अनुमान है कि हर वर्ष 3 से 4 करोड़ लोग जलजनित रोगों से बीमार पड़ते हैं, जिनमें सबसे अधिक संख्या बच्चों और गरीब वर्ग की है।
  • विश्व स्वास्थ्य आँकड़ों के अनुसार, भारत में असुरक्षित जल के कारण होने वाली मृत्यु दर कई विकसित देशों की तुलना में तीन गुना से अधिक है।
    यह आँकड़े केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि जल प्रबंधन की राष्ट्रीय विफलता का प्रमाण हैं।
    *जल संकट : भविष्य की नहीं, वर्तमान की समस्या
    अक्सर जल संकट को भविष्य का खतरा बताकर टाल दिया जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि भारत में जल संकट वर्तमान का यथार्थ बन चुका है।
  • देश के कई बड़े शहरों में भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे चला गया है।
  • ग्रामीण भारत के हजारों गाँवों में हैंडपंप और कुएँ सूख चुके हैं।
  • प्रति व्यक्ति उपलब्ध जल मात्रा निरंतर घट रही है।
  • नदियाँ सीवेज और औद्योगिक कचरे से प्रदूषित हो चुकी हैं।
    जल संकट अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि कृषि, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता का प्रश्न बन चुका है।
    *देश के कर्णधार और ‘घंटा प्रश्न’
    सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह संकट नीतिगत प्राथमिकताओं में ‘घंटा प्रश्न’ बनकर रह गया है।
    विकास की परिभाषा सड़कों, इमारतों और डिजिटल सूचकांकों तक सीमित कर दी गई, जबकि पानी जैसे मूल संसाधन को हाशिये पर छोड़ दिया गया।
  • जल संरक्षण योजनाएँ काग़ज़ों तक सीमित रहीं।
  • नदियों की सफाई राजनीतिक नारों में सिमट गई।
  • वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जल संरचनाएँ और सामुदायिक प्रबंधन उपेक्षित रहे।
    जब तक पानी को राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवाधिकार के रूप में नहीं देखा जाएगा, तब तक यह संकट और गहराएगा।
    *अगली पीढ़ी के लिए क्या छोड़ रहे हैं?
    यह प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि नैतिक और व्यावहारिक है।
    क्या हम अगली पीढ़ी को—
  • सूखी नदियाँ
  • ज़हरीला भूजल
  • महँगा बोतलबंद पानी
  • और जल के लिए आपसी संघर्ष
    देकर जाना चाहते हैं?
    आज का बच्चा पानी को नदी या कुएँ से नहीं, बल्कि प्लास्टिक की बोतल से पहचान रहा है। यह बदलाव केवल आदत का नहीं, बल्कि संस्कृति के क्षरण का संकेत है।
    अभी नहीं तो कभी नहीं
    *भारत में जल संकट का समाधान असंभव नहीं है, बशर्ते—
  1. जल को सार्वजनिक अधिकार के रूप में देखा जाए, न कि केवल बाजार के उत्पाद के रूप में।
  2. जल स्रोतों की रक्षा और पुनर्जीवन को प्राथमिकता दी जाए।
  3. वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण को जन आंदोलन बनाया जाए।
  4. जल शिक्षा को विद्यालयों से समाज तक व्यवहार में उतारा जाए।
  5. विकास योजनाओं में जल प्रभाव मूल्यांकन अनिवार्य किया जाए।
    जल देवता से जल संकट तक की यह यात्रा भारत के लिए चेतावनी है। 5 लाख करोड़ का जल व्यापार, लाखों मौतें, और सूखते जल स्रोत — ये सब मिलकर बता रहे हैं कि अगर अब भी पानी को केवल “घंटा प्रश्न” समझा गया, तो आने वाले वर्षों में यह देश के लिए सबसे बड़ा अस्तित्व का संकट बन जाएगा।
    इतिहास हमें माफ़ नहीं करेगा यदि हमने यह प्रश्न अगली पीढ़ी पर छोड़ दिया—
    “जब पानी था, तो आपने उसे बचाया क्यों नहीं?”
    अब भी समय है,
    पानी को फिर से देवता बनाने का — सिर्फ पूजा में नहीं, नीति, व्यवहार और जीवन में।
    आओ प्रकृति की ओर लौटें। (लेखक के अपने विचार हैं)

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