




चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर कालिका माता का मंदिर स्थापित है। पहले मूल रूप से सूर्य देव को समर्पित था। आठवीं शताब्दी में महाराणा बप्पा रावल सिंह द्वारा सूर्य देव के मंदिर के रूप में बनवाया गया था। 14 वी शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय इसको खंडित कर दिया गया था।
महाराणा हमीर सिंह ने खंडित मंदिर का पूर्ण निर्माण करवा कर सूर्य देव की मूर्ति के स्थान पर भद्रकाली (कालिका माता) की मूर्ति को स्थापित किया। यह मेवाड़ की इष्ट देवी और रक्षक है। नवरात्रि में यहां पर श्रद्धालुओं की अपार भीड़ रहती है। पुरानी परंपरा के अनुसार आज भी नवरात्रि में उदयपुर से मेवाड़ महाराणा के प्रतिनिधि सदस्य व स्वयं महाराणा भी दुर्ग पर आकर बायण माता मंदिर व कालका माता मंदिर में पूजा करते हैं।


मेवाड़ के महाराणा जब भी युद्ध के लिए जाते तो कालिका माता मंदिर व बायण माता मंदिर में पूजा करके जाते थे। और युद्ध में विजय हासिल कर लौटते थे। दुर्ग पर प्रसिद्ध बायण माता का मंदिर भी है आज भी संध्या की आरती के समय वहां की घंटियां स्वत: बजने लगती है। यह मेवाड़ की शान है और माता का चमत्कार है।
संकलन : लता अग्रवाल, चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)