
गुहिल शासक कुमार सिंह के शासनकाल में कीर्ति स्तंभ का निर्माण 12 वीं शताब्दी में भगैरवाला जाति के जैन श्रेष्ठी जीजा द्वारा बनवाया गया था। पहले जैन तीर्थंकर ऋषभ (आदिनाथ) को समर्पित है।
यह सात मंजिला स्तंभ गुजरात की चालुक्य शैली में निर्मित है। 22 मीटर (72 फीट) ऊंचा है। यह जैन मूर्तियो व नक्काशी से भरा हुआ है।
सबसे नीचे की मंजिल में आदिनाथ भगवान की खड़ी प्रतिमा है। ऊपर की मंजिल में जैन देवताओं की सैकड़ों मूर्तियां हैं।अंदर 54 चरणों वाली एक संकीर्ण सीढ़ी है जो शीर्ष तक पहुंचाती है। कीर्ति स्तंभ विजय स्तंभ से भी पुराना है। नग्न तीर्थंकर की प्रतिमाए दिगंबर संप्रदाय का प्रतीक है। शुभ कीर्ति के शिष्य धर्म कीर्ति का उल्लेख एक शिलालेख में मिलता है।

इसके पास एक जैन मंदिर बना हुआ है। जिसमें मुख्य देवता के रूप में मल्लिनाथ 19 वे तीर्थंकर की मूर्ति स्थापित है। जिसकी प्रतिष्ठा विक्रम संवत 1352 में हुई थी। भगवान शांतिनाथ की भी एक पुरानी मूर्ति विराजित है।
महाराणा फतह सिंह के शासनकाल में बिजली गिरने से कीर्ति स्तंभ क्षतिग्रस्त हो गया था। तब उदयपुर के महाराणा फतह सिंह ने क्षति ग्रस्त क्षेत्र का पुनर्निर्माण करवाया था। (लेखिका के अपने विचार है)
संकलन : लता अग्रवाल, चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)।