कोल्हापुरी चप्पल को विश्व बाज़ार मिला

लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
www.daylifenews.in
महाराष्ट्र और कर्नाटक में चमड़ा कारीगरों द्वारा पारम्परिक रूप से बनाई जाने वाली कोल्हापुरी चप्पल को अब विश्व बाज़ार मिल गया है .हाल ही में इटली के प्रसिद्ध लग्ज़री ब्रांड प्राडा कंपनी ने इन चप्पलों को बनाने और बेचने वाली दो सहकारी व्यवसायिक संस्थायों से समझौता किया है . अगली गर्मी के मौसम से ये चप्पलें इस ब्रांड के 40 स्टोरों में बिकनी शुरू हो जायेंगी . कंपनी ने एक जोड़ी चप्पल की कीमत लगभग 84 हज़ार रूपये रखी है . इनको समर (गर्मी सैडल) का नाम दिया गया है . इन पर यह टैग भी होगा कि इनका डिजाईन भारत की प्रसिद्ध और पारम्परिक कोल्हापुरी चप्पल से प्रेरित है।
ये चप्पले महाराष्ट्र के कोल्हापुर तथा आस पास के जिलों में पारम्परिक चमड़ा कारीगरों दवारा बनाई जातीं हैं.इसके अलावा महाराष्ट्र की सीमा से लगते कर्नाटक के आधा दर्ज़न जिलों में भी यह चप्पलें बनती हैं . लेकिन इसका लोकप्रिय नाम कोल्हापुरी चप्पल ही है . यह भूरे और मोटे चमड़े से बनती हैं तथा इसे पालिश करने की जरूरत नहीं होती . इसमें लगे चमड़े को नर्म रखने के लिए आम तौर पर सरसों का का तेल लगाया जाता है।
इतिहासकारों का कहना है कि इस चप्पल का आविष्कार लगभग 8वीं शताब्दी में हुआ था . इसके रूप और डिजाईन में लगातार परिवर्तन होता रहा है . लेकिन इसके मूल डिजाईन में कोई विशेष बदलाव नहीं आया . बाज़ार में इनकी कीमत मोटे तौर पर 1000 से 1500 रूपये के आस पास है हालाँकि कुछ खास डिजाईन वाली चप्पल की कीमत 3000 रूपये तक भी होती है.लेकिन इनको बनाने वाले पारम्परिक करीगारों को बमुश्किल लगभग 500 रूपये ही मिलते हैं . मोटे तौर पर इनको बनाने वाले कारीगरों तथा इनकी बिक्री से जुड़े परिवारों की संख्या लगभग 20,000 के आस पास बताई जाती है. दोनों राज्यों की सरकारों ने इस पारम्परिक हस्त उद्योग को संरक्षण और बढ़ावा देने के लिए समय समय पर कई कदम उठाये है . इनके सहकारी संगठनों को भी सरकार का सरंक्षण है . इस उद्योग को भौगोलिक संकेत भी मिला हुआ है . इसका मतलब यह है कि जो चप्पल इस इलाके में बनती है केवल उसे ही कोल्हापुरी चप्पल का टैग मिल सकता है. जैसे बीकानेर में बनने वाले भुजिये को केवल बीकानेरी भुजिया माना जायेगा.अगर यह भुजिया कहीं और बनता है तो इसके बीकानेरी भुजिया का नाम नहीं दिया जा सकता।
इन चप्पलों को विश्व बाज़ार मिलने की कहानी कुछ महीने पहले शुरू हुई थी . इटली के प्राडा लक्ज़री ब्रांड ने इसे एक व्यवसायिक प्रदर्शनी में अपने पंडाल में रखा था . इसे सैंडल की श्रेणी में रखा गया था . इसकी कीमत 930 डॉलर , जो लगभग 84 हज़ार रूपये होती है ,रखी गई थी. यह भी कहा गया था इसकी बिक्री 2026 के गर्मियों के मौसम से शुरू हो जायेगी , इसकी खबर जल्दी ही इस उद्योग से जुड़े हुए संगठनों तक पहुँच गई . उन्होंने कर्नाटक तथा महाराष्ट्र की सरकारों के साथ उठाया . उनको कहना था कि चूँकि इसे कोल्हापुर का भौगोलिक चिन्ह मिला हुआ है इसलिए लिए केवल इस इलाके में बनी चप्पल को ही कोल्हापुरी कहा जा सकता है . इससे मिलीजुली चप्पल को यह टैग नहीं मिल सकता . भौगोलिक चिन्ह का कानून केवल भारत में ही लागू हो सकता है फिर भी दोनों राज्यों की सरकारों ने इस कंपनी के अधिकारियों के साथ यह मामला उठाया।
पिछले महीने इस कंपनी के अधिकारियों का एक दल भारत आया . राज्य सरकारों के माध्यम से इस व्यवसाय से जुड़े दो बड़े संगठनो के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए . इस समझौते के अनुसार यह कंपनी इन इलाकों के कारीगरों से ही चप्पलें बनवाएगी . कंपनी के डिज़ाइनर इस चप्पल में जरूरत के मुताबिक कुछ बदलाव भी करवा सकते है . बदलाव बाहर के देशों में मौसम के अनुकूल होंगे . लेकिन इसके मूल रूप में कोई बदलाव नहीं होगा . शुरू में केवल 2000 जोड़ी चप्पलें को इस ब्रांड के विश्व के अलग अलग भागों में अपने 40 स्टोरों में रखा जायेगा, यह बिक्री अगले साल गर्मियों के मौसम से शुरू हो जाएगी. इनकी बिक्री को देखते हुए यह कंपनी यह और चप्पलें बनाने का आर्डर कोल्हापुर के व्यापारियों को दे सकती है।
इस व्यवसाय से जुड़े लोगों को लगता है कि जब एक बार ये चप्पलें अन्तराष्ट्रीय बाज़ार में पहुँच गई तो अन्य विदेशी कंपनिया भी इनकी बिक्री कर करना शुरू कर देगी . वे इटली की कम्पनी के साथ हुए समझौते को आशा की किरण से देख रहे हैं . क्योंकि कम कीमत मिलने के कारण ये चप्पलें बनाने वाले पारम्परिक कारीगर इस व्यवसाय को छोड़ते जा रहे है . मांग बढ़ने पर यह व्यवसाय फिर तेजी पकड़ सकता है। (लेखक के अपने विचार हैं)

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