अतिथि देवता के समान : प्रो (डॉ.) सोहन राज तातेड़

लेखक : प्रो (डॉ.) सोहन राज तातेड़
पूर्व कुलपति सिंघानिया विश्वविद्यालय, राजस्थान
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अतिथि वह होता है जो बिना बताये किसी के घर आकस्मिक आय जाये। भारतीय संस्कृति में अतिथि देवो भव यह वाक्य बहुत ही आदरणीय है। अतिथि से तात्पर्य किसी मेहमान से है और देवो भव का तात्पर्य है देव के समान होना। कहने का भाव यह है कि अतिथि भगवान के समान होता है। और वह पूजनीय होता है। प्रारंभ से ही हमारे देश में अतिथि को भगवान समझा गया है। जब किसी के घर कोई अतिथि आ जाता है तो घर में जो कुछ भी है उसी से उसका सम्मान करना चाहिए। हमारे देश पर अनेक जातियों ने बर्बरता पूर्ण आक्रमण किया। लेकिन हमने उनका भी स्वागत किया। ऐसे बर्बर आक्रमण झंझावात की तरह थे। इनका प्रभाव कुछ समय तक रहा फिर समाप्त हो गया। भारतीय जीवन की विशालता ने उन सबको या तो आत्मसात कर लिया या तो वे भारतीय संस्कृृति में समा गये। भारतीय संस्कृति की आत्मा अपरिवर्तित रही। आधुनिक युग में यह कहावत है कि अतिथि भगवान के समान होता है। बदलते जमाने के साथ इंसान बहुत व्यस्त हो गया है। फिर भी आज हम सभी के घर पर अतिथि जरूर आते है और उनका स्वागत सत्कार करना हमारा कर्त्तव्य होता है, क्योंकि इसको हमने परंपरागत रूप से प्राप्त किया है। भारतीय संस्कृति के संस्कार में समाहित है। जब किसी के घर कोई अतिथि आ जाता है तो सबसे पहले उसे जल देकर हाथ, मुंह, पैर इत्यादि का प्रक्षालन कराते है, इसके बाद उसके जलपान की व्यवस्था करते है। फिर घर में जो कुछ भी प्रसाद रसोई में बना रहता है, उससे उसका भोग लगवाते है और उसके रहने की उचित व्यवस्था कर अपना कर्त्तव्य पूर्ण करते है। वास्तव में अतिथियों का सम्मान करना चाहिए। क्योंकि अतिथि हमेशा के लिए नहीं आते बल्कि कभी-कभी आते है। इस संसार में सभी एक-दूसरे के लिए अतिथि ही है। एक-दूसरे के घर जाने से सम्बन्ध और प्रगाढ़ होता है। इससे बन्धुत्व बढ़ता है। भारतीय संस्कृति में वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना इसी का विस्तृत रूप है। आजकल के युग में ग्लोबलाईजेशन के द्वारा वसुधैव कुटुम्बकम् को बताया जा रहा है। अन्तर केवल इतना ही है कि वसुधैव कुटुम्बकम् विश्व बन्धुत्व को बढ़ावा देता है। जबकि ग्लोबलाइजेशन विश्व का बाजारीकरण है। आजकल के जमाने में हम देखे तो अतिथि के रूप में बहुत सारे ठग और ढ़ोंगी भी घर पर आ सकते है। हमें इस तरह के लोगों को पहचानना चाहिए। आजकल के जमाने में लोग अतिथि का बहाना बनाकर घर में घुसकर हमें नुकसान भी पहुंचा सकते है। संस्कृत में यह कहावत है- अज्ञातकुलशीलस्य वासो देयो न कस्यचित् अर्थात् अज्ञात कुल और शील वाले व्यक्तियों को घर में कभी भी नहीं रखना चाहिए। अगर कोई ऐसे व्यक्तियों को अपने घर में रखता है हो निश्चित ही ऐसे अज्ञात कुलशील वाले व्यक्ति उसे नुकसान पहुंचा सकते है। अतः अतिथि वही होता है जिसका किसी न किसी रूप मंे पारिवारिक सम्बन्ध हो। परिवार का कोई व्यक्ति उसे जानता-पहचानता हो। ऐसे व्यक्ति से ही मैत्रीभाव और पारिवारिक सम्बन्ध रखना चाहिए। कभी-कभी आवश्यकता पड़ने पर कोई व्यक्ति किसी के घर अतिथि के रूप में जाता है। ऐसे व्यक्ति का सम्मान अवश्य होना चाहिए। महाकवि कालीदास ने महाराज रघु की उदारता का वर्णन किया है। महाराज रघु बड़े ही दानी राजा थे। वह दान में सबकुछ न्यौछावर कर देते थे। एक बार वरतन्तु ऋषि के शिष्य कौत्स अपनी सम्पूर्ण विद्या समाप्त कर महाराज रघु के पास पधारे और महाराज रघु ने कौत्स को प्रणाम कर आने का कारण पूछा। कौत्स ने महाराज रघु से आने का कारण निवेदन कर दिया। उस समय महाराज रघु राजकोश को दान देकर पूरी तरह रिक्त कर दिया था। उनके राजदरबार में केवल मिट्टी के पात्र थे। पहले तो कौत्स ने राजा रघु से अपने आने का कारण नहीं बताना चाहा। किन्तु बार-बार आग्रह करने पर आगमन का कारण बता दिया। कौत्स महाराज रघु के दरबार में एक अतिथि के रूप में पधारे थे। कहां तो महाराज रघु और कहां एक छोटा सा शिष्य कौत्स। दोनों में महान् अन्तर। किन्तु महाराज रघु ने अल्पवयवाले शिष्य कौत्स का राजकीय सम्मान के साथ स्वागत किया। जब शिष्य कौत्स ने अपने गुरू की गुरुदक्षिणा के लिए महाराज रघु के सामने प्रस्ताव रखा तो राजकोष के रिक्त रहने पर भी महाराज रघु ने कौत्स के निवेदन को स्वीकार किया और अपने सेनापति को धनाधीश कुबेर पर आक्रमण के लिए आदेश दे दिया। इसी बीच उनके राजकोश में प्रभुत धनवृष्टि हो गयी और सम्पूर्ण धन को महाराज रघु ने शिष्य कौत्स को गुरुदक्षिणा के लिए समर्पित कर दिया। किन्तु कौत्स ने जितनी गुरुदक्षिणा के लिए आवश्यकता थी उतना ही ग्रहण किया। इस प्रकार इस दृष्टांत से यह पता चलता है कि हमारे देश में प्राचीनकाल से ही अतिथियों का कितना अधिक सम्मान होता था। आजकल एक देश को दूसरे देश से सम्बन्ध बनाने के लिए राजनयिकों की नियुक्ति की जाती है। राजनयिक दूसरे देश में अतिथि ही होता है। अतः उनका उस देश की सरकार को पूर्ण रूप से सूरक्षा प्रदान करना और उनके माध्यम से देश के बारे में जानकारी प्राप्त करना आदि क्रियाएं होनी चाहिए। हर प्रदेश और देश के आतिथ्य का ढ़ंग भी अलग-अलग होता है। राजस्थान वासियों का आतिथ्य प्रशंसनीय है। राजस्थान का प्रदेश शुष्क होने के बावजूद भी बहुत ही सरस है। यहां पर जिस प्रकार का आतिथ्य मेहमानों का किया जाता है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)

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