निपाह वायरस : खतरनाक संकेत, बचाव ही एकमात्र उपाय – ज्ञानेन्द्र रावत

लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
www.daylifenews.in
देश में निपाह वायरस ने दस्तक दे दी है। साल 2026 के शुरूआती दो हफ्तों में पश्चिम बंगाल के बारासात और कोलकाता में दो स्वास्थ्य कर्मियों के निपाह वायरस से संक्रमित होने का मामला सामने आया है। उसके बाद से अभीतक पश्चिम बंगाल में इसके पांच मामले सामने आये हैं। संक्रमित होने वालों में डाक्टर और नर्स शामिल हैं। एक की हालत ज्यादा खराब है। वह कोमा में है और दो वेंटिलेटर सपोर्ट पर हैं। पुणे की नेशनल इंस्टीट्यूट आफ वायरोलाजी ने इसकी पुष्टि कर दी है। 10 लोगों को क्वारांइटाइन में रखा गया है। बर्द्दमान और नादिया में जहां होटल में ये लोग रुके थे और वहां जिन-जिनसे संपर्क किया था, उन कुल 120 लोगों को होम क्वारांइटाइन कर दिया गया है।भारत में इसकी पुष्टि के बाद पाकिस्तान से लेकर मलेशिया तक हड़कंप मच गया है। दक्षिण एशियाई देशों में सतर्कता बढ़ा दी गयी है। सिंगापुर, हांगकांग, थाईलैंड और मलेशिया समेत कई देशों ने हवाई अड्डों पर तापमान जांच और स्वास्थ्य स्क्रीनिंग जैसे कदम उठाने शुरू कर दिये हैं। ताकि इस घातक वायरस के प्रसार को रोका जा सके। सिंगापुर और हांगकांग में भारत से आने वाले यात्रियों की हवाई अड्डों पर गहन जांच की जा रही है। थाईलैंड में निपाह प्रभावित क्षेत्रों से आने वाले विमानों के लिए अलग से पार्किंग वे तय किये हैं और यात्रियों के लिए स्वास्थ्य घोषणा जरूरी कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे एक गंभीर बीमारी माना है। कारण यह जानवरों से इंसानों में फैलती है। खासकर यह फल खाने वाले चमगादड़ों और सूअर जैसे जानवरों से इंसानों में फैलती है।

यह कोविड जैसे हवा से नहीं फैलता है। यह तो चमगादड़ों और सूअर के संपर्क में आने, उनकी लार, मूत्र या मल से दूषित भोजन के इस्तेमाल करने और संक्रमित व्यक्ति के शरीर के तरल पदार्थ के संपर्क में आने से फैलता है। नजदीकी संपर्क के जरिये भी व्यक्ति से व्यक्ति में संक्रमण हो सकता है। यह मस्तिष्क में, फेफड़ों में सूजन और तेज बुखार जैसी गंभीर बीमारी का कारण बनता है। डब्ल्यू एच ओ ने आशंका जतायी है कि यह बीमारी महामारी का रूप ले सकती है। इस बीमारी के संक्रमण की दर 40 से 75 फीसदी तक है। मौसमी संक्रमणों के विपरीत इसमें मृत्युदर अधिक है। फिर सबसे खतरनाक और चिंतनीय स्थिति यह है कि इस बीमारी से बचाव के लिए कोई टीका नहीं है और न ही इसका कोई इलाज ही है। बीमारी की गंभीरता देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यों को सतर्कता हेतु विशेष निर्देश जारी किये हैं और पश्चिम बंगाल में गहन जांच की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी है। केन्द्र सरकार ने इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार को पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया है। पड़ोसी राज्यों में एहतियातन पूर्ण सतर्कता बरती जा रही है। पड़ोसी राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी जिला प्रशासन को गाइडलाइन जारी कर दी हैं और एहतियात बरतने के निर्देश दे दिए हैं। हां इससे इतना जरूर हुआ है कि दूसरे राज्य दहशत में हैं और लोग बड़ी महामारी की आशंका से सहमे हुए हैं।

गौरतलब है कि निपाह वायरस अपनी उच्च मृत्युदर के कारण वैश्विक स्वास्थ्य के लिए लगातार खतरा बना हुआ है। वैश्विक स्तर पर अभी तक इसके 754 मामले सामने आये हैं। इनमें कुल 435 मौतें हुयी हैं। इस खतरनाक वायरस की पहचान सबसे पहले 1999 में मलेशिया और सिंगापुर में हुयी थी। वहां पर यह बीमारी तब सूअर पालने वाले किसानों में दिमागी बुखार और सांस लेने में परेशानी के रूप में सामने आयी थी। उसके बाद दक्षिण एशियाई देश बांग्लादेश, फिलीपींस और कुछ दूसरे देशों में भी इसके मामले सामने आये। बांग्लादेश में 2001 में देश के पश्चिमी भाग में मेहरपुर में सबसे पहला मामला सामने आया। 2004 में यहां सबसे ज्यादा 67 मामले सामने आये। तब से हर साल निपाह वायरस के मामले यहां सामने आते रहते हैं। 2001 से लेकर 2024 तक बांग्लादेश में कुल 342 मामलों में निपाह वायरस से 245 मौतें हुयी हैं। हमारे देश में सबसे पहले 2001 में पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में मामला सामने आया। 2007 से 2021 तक देश में निपाह वायरस के 90 मामले सामने आये। 2018 – 2019 और 2021 में देश के सबसे दक्षिणी राज्य केरल में भौगौलिक रूप से दूर एक स्थान पर वायरस के कुछ मामले सामने आए। 2018 में यहां कुल 19 मामले सामने आये जिसमें 17 घातक थे। 2023 में सामने आये 6 मामलों में 2 की मौत हो गयी थी। निपाह वायरस के लिए केरल को हाटस्पाट कहा जाता है।

निपाह वायरस से संक्रमित व्यक्ति में बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द, थकान और कमजोरी होती है। कुछ मामलों में खांसी, सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया जैसे लक्षण भी दिखाई देते हैं। इसमें भ्रम, होश में बदलाव, दौरे पड़ना और कोमा की स्थिति भी आ सकती है। यही नहीं इसमें बिना लक्षण के संक्रमण से लेकर गंभीर रूप से सांस लेने की बीमारी हो सकती है। इसका सबसे खतरनाक असर दिमाग पर पड़ता है जिसे एन्सेफिलाइटिस भी कहा जाता है। कुछ मामलों में मैनिन्जाइटिस भी हो सकता है। चूंकि यह बेहद घातक जूनोटिक संक्रमण है,इसीलिए डब्ल्यू एच ओ ने इसे हाई रिस्क पैथोजन करार दिया है। दरअसल होता यह है कि कुछ वायरस रातोंरात सुर्खियां बटोर लेते हैं लेकिन यह वायरस चुपचाप फैलता है। इसकी शुरुआत हल्के बुखार से शुरू होती है जो कुछ ही दिनों में जानलेवा बन जाता है। निपाह वायरस की सबसे बड़ी चिंता इसकी तेजी से फैलने की क्षमता नहीं है लेकिन वह यह है कि यह कितनी जल्दी जानलेवा साबित हो सकता है। गौरतलब है कि कोरोना की तरह ही इस वायरस का स्रोत चीन को ही बताया जा रहा है।

इसके इलाज के लिए कोई विशेष दवा या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। इसका इलाज खासकर लक्षणों के आधार पर किया जाता है। इसमें सबसे पहले बुखार और सांस लेने में आ रही दिक्कत का इलाज किया जाता है। इससे ठीक होने के लम्बे समय बाद भी लोगों में न्यूरोलाजिकल समस्यायें जैसे बार-बार दौरे पड़ने और व्यवहार में बदलाव जैसे लक्षण देखे जाते हैं। कुछ मामलों में तो इसका असर महीनों-सालों बाद भी दिखाई देता है। सबसे अधिक और ध्यान देने वाली अहम बात यह है कि इसका कोई इलाज न होने की स्थिति में केवल बचाव ही सबसे बड़ा उपाय है। कच्चा खजूर का रस या ऐसे फलों का सेवन बिल्कुल ना करें जिनपर चमगादड के काटने या गंदगी के निशान हों। कोई भी फल के इस्तेमाल से पहले उसे अच्छी तरह धो लें, फिर उसका छिलका उतारने के बाद ही उसे खायें। बीमार व्यक्ति या जानवर के शरीर के तरल पदार्थ के संपर्क से बचें। संक्रमित व्यक्ति के करीब बिना सुरक्षा के संपर्क में न आयें और हाथों की सफाई का विशेष ध्यान रखें। सही जानकारी, सजगता और सावधानी ही इससे बचाव का सबसे बड़ा उपाय है। वैसे सरकार इस दिशा में हरसंभव बचाव के प्रयास कर रही है ताकि इस वायरस के प्रसार पर तेजी से अंकुश लगाया जा सके लेकिन सावधानी और बचाव बेहद जरूरी है। कोरोना जैसी महामारी पर अंकुश भारत सरकार के प्रयास का जीता- जागता सबूत है। इस पर भी समय रहते सरकार काबू पा लेगी,इसमें दो राय नहीं। (लेखक के अपने विचार हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *