अब केरल में स्कूलों में हिजाब पहनने पर विवाद

लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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लगभग तीन वर्ष पूर्व कर्नाटक में स्कूलों की छात्रओं द्वारा हिजाब पहन कर आने पर एक बड़ा विवाद हुआ था। अब केरल में भी ऐसा ही एक विवाद सामने आया है। लेकिन दोनों राज्य की न केवल सरकारों बल्कि दोनों राज्य के हाई कोर्ट ने एक दूसरे के विपरीत निर्णय दिए थे।
कुछ सप्ताह पूर्व केरल के पल्लुरूथी के एक मिशनरी स्कूल सैंट रीता पब्लिक स्कूल ने वहां पढ़ रही मुस्लिम छात्रओं को यह निर्देश दिया वे स्कूल में हिजाब, जो मुस्लिम समुदाय के महिलायों द्वारा पहना जाता है, पहन कर नहीं आये। उन्हें स्कूल के ड्रेस कोड को मानते हुए अन्य छात्रओं की तरह स्कूल की निर्धारित यूनिफार्म में आना होगा। स्कूल के इस फैसले को लेकर एक छात्रा के अभिभावक ने राज्य के शिक्षा निदेशालय से शिकायत की। उनका कहना था कि हिजाब मुस्लिम महिलायों की वेशभूषा का अभिन्न अंग है इसलिए स्कूल का प्रबन्धन मुस्लिम छात्रओं को हिजाब पहनने को रोक नहीं सकता। इस शिकायत के बाद निदेशालय ने स्कूल के प्रबंधन को यह आदेश दिया कि वे मुस्लिम छात्रओं को स्कूल में हिजाब पहन कर आने के अनुमति दें।
शिक्षा निदेशालय के इस आदेश को स्कूल के प्रबन्धन समिति ने केरल हाई कोर्ट में चुनौती दी। सरकार के ओर से शिक्षा निदेशालय ने हाईकोर्ट ने को अपने आदेश को सही बताया तथा कहा कि स्कूल प्रबंधन का आदेश संविधान के अनुसार धार्मिक निजता का उल्लंघन है। कोर्ट का आदेश अंतरिम था तथा मामले की अभी आगे सुनवाई होनी है। इस विवाद के चलते कुछ मुस्लिम छात्रओं के अभिभावकों ने अपनी लड़कियों को स्कूल से निकालने का फैसला किया। यहाँ यह कहना समीचीन होगा कि केरल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाले वाममोर्चे की सरकार है। सत्ताधारी पार्टी अपने आपको धर्म निरपेक्ष कहती है यानि सबको अपनी-अपनी धार्मिक आस्थाएं रखने का अधिकार है।
उधर लगभग तीन साल से कुछ महीने पहले कर्नाटक में इसके विपरीत हुआ था। यह मामला मार्च 2022 का है। राज्य के तटीय इलाके, जहाँ घनी मुस्लिम आबादी है, के एक स्कूल ने अपने यहाँ मुस्लिम छात्राओं को कक्षा में हिजाब पहन कर आने पर रोक लगा दी, इसके देखा देखी कुछ और स्कूलों ने भी ऐसे आदेश जारी कर दिए। इसको लेकर कुछ मुस्लिम सगठनों ने आन्दोलन शुरू कर दिया, इसके विरोध में कई हिन्दू संगठन भी उतर आये। राज्य के शिक्षा निदेशालय को गुहार लगाई। अपनी ओर से निदेशालय ने अपने एक पुराने निर्देश का उल्लेख किया जिसमेंकहा गया था कि स्कूलों के छात्रों को कक्षा में ड्रेस कोड के अनुसार आना अनिवार्य है। उस समस्या राज्य में बीजेपी की सरकार थी तथा शिक्षा विभाग के अधिकारी ऊपर से आये निदेशों की पलना कर रहे थे।
मामला कर्नाटक हाई कोर्ट में पंहुचा। मुस्लिम पक्ष का कहना था हिजाब इस्लाम का हिस्सा है इसलिए कोई शिक्षा संस्थान मुस्लिम छात्राओं को कक्षा में हिजाब पहन कर आने पर रोक नहीं लगा सकता। उनको यह भी तर्क था कि पिछले काफी समय से मुस्लिम छात्राएं स्कूल में हिजाब पहन कर ही आ रही है। अचानक इस पर रोक लगाने का कोई औचित्य नहीं हैं। हाई कोर्ट में कई दिन तक बहस चली। सरकार के ओर से यह दलील दी गई कि पिछले कई दशकों से शिक्षा निदेशालय हर साल कक्षाएं शुरू होने से पहले स्कूलों को ड्रेस कोड के बारे सर्कुलर जारी करता करता आ रहा है। कोर्ट में लम्बी बहस हुई। कोर्ट ने शिक्षा निदेशालय के आदेश पर रोके लगाने से मन कर दिया। कोर्ट ने यह भी कहा हिजाब किसी भी रूप में इस्लाम का हिस्सा नहीं है। इसलिए इस आधार पर मुस्लिम पक्ष के तर्क मान्य नहीं है। कर्नाटक हाई कोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले पर रोके लगाने से इंकार कर दिया। कोर्ट का कहना था कि प्रथम दृष्टि से हिजाब किसी भी प्रकार से इस्लाम का हिस्सा नहीं है। कोर्ट का आदेश अंतरिम था तथा यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
इस मुद्दे को लेकर कर्नाटक के तटीय इलाके में मुस्लिम समुदाय का विरोध अभी भी बना हुआ हैं। जब यह मामला शुरू हुआ तब वार्षिक परीक्षाएं नज़दीक थी। सभी स्कूलों कम प्रबंधनों ने यह निर्देश जारी कर दिए कि परीक्षा के दौरान हिजाब पहन कर आने की अनुमति नहीं होगी। यह मामला इतना आगे बढ़ा कि इसने अन्तराष्ट्रीय रूप ले लिया। उस साल बड़ी संख्या में मुस्लिम छात्रओं ने परीक्षा नहीं दी तथा स्कूल छोड़ दिए। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)

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