
लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
www.daylifenews.in
पिछले वर्ष प्रयागराज हुए महाकुम्भ में त्रिवेणी संगम पर 60 करोड़ से भी अधिक हिन्दू तीर्थ यात्रियों ने स्नान किया था। इस महाकुम्भ को सभी प्रमुख विदेशी टीवी चैनलों ने प्रसारित किया था। तब कहा गया था कि यह विश्व का सबसे बड़ा उत्सव था .इसी से प्रेरणा लेकर इस बार केरल में भी कुम्भ मेले का आयोजन किया जो 18 जनवरी से 3 फ़रवरी तक चला। इसमें बड़ी संख्या में हिन्दू तीर्थ यात्रियों ने भारतपुजा नदी में स्नान किया. इसका नाम महामाघम रखा गया था .लेकिन आम तौर पर इसे कुंभ मेला कहा गया। राज्य की वाम मोर्चा सरकार ने यात्रियों की सुविधा के लिए राज्य परिवहन के विशेष बसें भी चलाई। हालाँकि पहले सरकार का रुख इस मेले के खिलाफ था। यहाँ तक कि मेले के आयोजन की दी गई अनुमति भी वापिस ले ली . लेकिन हिन्दू संगठनों के दवाब के चलते यह अनुमति फिर दे दी गई . इस इलाके के मुस्लिम लीग के विधायक मोईदीन ने भी इस मेले में सहयोग दिया . इन सब का कारण यह था कि राज्य में अप्रैल – मई में विधानसभा के चुनाव होने वाले है इसलिए कोई भी राजनीतिक दल किसी भी कीमत पर राज्य के मतदातायों को नाराज़ नहीं करना चाहता।
यह इलाका केरल के मुस्लिम बहुल मल्लपुरम जिले में पड़ता है। इस नदी के किनारे प्रसिद्ध और प्राचीन तिरुनावाया मंदिर है। ऐसा माना जाता है लगभग 250 वर्ष पूर्व तक यहाँ हर वर्ष महामाघम का आयोजन होता था। फिर पता नहीं किन कारणों से यह प्राचीन परम्परा बंद हो गई।
इस परम्परा को पुनर्जीवित करने का निर्णय पिछले साल प्रयागराज में हुए महाकुम्भ के समय किया गया था। देश के सबसे बड़े अखाड़े के नाम से जाने जाने वाला जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर और अखाड़े अन्य जुड़े संतो, महंतों ने यह फैसला किया था। हालाँकि कि प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक तथा उज्जैन में कुम्भ मेले का आयोजन राज्य सरकारें करती है। लेकिन इस आयोजन में बड़ी भूमिका जूना अखाड़े की होती है। पहले शाही स्नान की अगुवाई इस अखाड़े से जुड़े संत ही करते हैं। केरल में महामाघम के आयोजन की जिम्मेदारी स्वामी आनंदवर्णंम को दी गई। मूलतः केरल के रहने वाले ये स्वामी, जिनका पुराना नाम पी सलिल है, को प्रयागराज महाकुम्भ के बाद जूना अखाड़े का महामंडलेश्वर बनाया गया था।
लगभग 80 वर्ष के ये स्वामी दशकों पूर्व राजनीति छोड़ कर सन्यासी बन गए थे। बहुत साल तक वे हिमालय के पर्वतों में विचरण करते रहे .फिर वे वाराणसी में आ कर स्थाई रूप से वहीं रहने लगे। उनका साथ जुड़े लोग दक्षिण से वाराणसी आने वाले तीर्थ यात्रियों की सहायता करते थे। इस काल में उन्होंने धारा प्रवाह रूप से हिंदी बोलना भी सीख लिया। जूना अखाड़े से जुड़ जाने के बाद उन्होंने अन्य बातों के अलावा भीड़ का प्रबंधन सीखा। इसके अलावा मेले की अन्य व्यवस्थाओं भी वे परांगत हो गए।
मार्च में महामंडलेश्वर बनने के कुछ समय बाद केरल आ कर कुम्भ मेले की तैयारियों में लग गए। मेले के तैयारी क ख ग से करनी थी . लोगों को जुटाना था . धीरे धीरे लोग जुटते गए मंदिर से जुड़े प्रबंधन ने इस काम में बड़ी भागीदारी की।
इस महामंडलेश्वर कर पृष्ठ भूमि जान कर आश्चर्य होता है। अपने छात्र काल में वे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के छात्र संगठन स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया के तेज तरार नेता थे। वे प्रखर वक्ता के अलावा कुशल संगठक भी थे। त्रिशूर जिले के वे एक बड़े छात्र नेता थे। उनके पुराने साथियों का कहना है कि अगर वे पार्टी में बने रहते तो पार्टी में उच्च पदों तक पहुँच सकते थे। उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की तथा मलयालम भाषा के एक समाचार पत्र में रिपोर्टर के रूप काम किया . पर ये किसी को पता नहीं कि उन्होंने कैसे सब कुछ छोड़ कर सन्यासी बनने के निर्णय किया।
कुंभ मेले के व्यवस्थायों से जुड़े लोगों का कहना है कि सत्तारूढ़ दल के पुराने नेताओं से सम्बन्ध होने के चलते उन्हें मेले के लिए जरूरी अनुमतियां लेने में आसानी हुई . इस मेले के लिए भारतपुजा नदी पर एक अस्थाई पुल बनाया जाना था। इसकी अनुमति भी मिल गई। लेकिन अचानक इस अनुमति को सुरक्षा के नाम पर वापिस ले लिया गया। उन्होंने तुरंत अपने संपर्कों से बात की तथा फिर अनुमति पा ली। मेले से जुड़े लोगों का कहना है यह कुम्भ मेला बड़ा सफल आयोजन था तथा इस परम्परा को अब जारी रही रखा जायेगा। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)