
लेखक : राम भरोस मीणा
प्रकृति प्रेमी, एल पी एस विकास संस्थान
www.daylifenews.in
औ माई नैना, कब मुझे अपने नयन दिखाओगे, क्या आंखों से आंखें मिलाओगे।
आंखों से हों ओझल, कहा तुम छुपें हों, दिखा संसार फिर छुपें हों।। औ माई नैना तुम कहां छुपे हो —
तुम्हारे होने से संसार देखा, शुभ लाभ और अपना पराया देखा।
दुख सुख , मान सम्मान देखा, और देखा जीवन का आधार है।। औ माई नैना तुम कहां छुपे हो —
नयन तुम्हारे लोचन सुंदर, नफ़रत की दुनिया में दृष्टि तुम्हारी साफ़ है।
मैला में मेल निकालते, स्वच्छ की अनुशंसा करतीं हों, ना किसी से डरते हों ।। औ माई नैना तुम कहां छुपे हो —
मुझे अंधेरा , उजाला दिखाया, और पावन धरा को दिखाया आप ने।
कष्ट सहना, लिखें कागज़ कों पढ़ना सिखाया, जगत में नफ़रत प्रेम का पाठ पढ़ाया।। औ माई नैना तुम कहां छुपे हो —
मैं तुम्हें संसार में ढूंढूं, मैं तुम्हें हर राह और बाजार में ढूंढता फिरूं।
ना मिलते हों, ना बतियाते हों, ना ही अपने होने का अहसास कराते हो।। औ माई नैना तुम कहां छुपे हो —
दर्पण में देखता हूं, तस्वीर में देखता हूं, दुसरे की आंखों में तुम्हें देखता हूं।
लोगों से सुनता हूं, तूम अच्छी हों, लेकिन मैं कभी ना तुम्हें देखता हूं, बस एक साथ होने का अहसास करता हूं।। औ माई नैना तुम कहां छुपे हो —