



चित्तौड़गढ़ दुर्ग में उत्तर दिशा की ओर स्थित है ।रतन सिंह महल भी कहा जाता है। जिसका निर्माण राणा सांगा के पुत्र महाराणा रतन सिंह द्वितीय ने (1527-1531) में शाही परिवार के लिए भीषण गर्मी से बचने के लिए शीतकालीन निवास हेतु कराया था। इसकी संरचना आयताकार है। आंगन, झरोखे, बालकनी, मंडप और पत्थर पर सुंदर व जटिल नक्काशी है जो राजपूताना शासको की जीवन शैली, वीरता और स्थापत्य कला को दर्शाती है।




अलाउद्दीन खिलजी ने रावल रतन सिंह की रानी पद्मिनी को पाने के लिए रावल रतन सिंह को धोखे से गिरफ्तार कर लिया था। रानी पद्मिनी ने अपने दो वीर सरदारों गोरा और बादल के साथ मिलकर एक योजना बनाई और अलाउद्दीन खिलजी को संदेश भेजा कि पद्मिनी अपनी दासियों के साथ पालकी में बैठकर आएगी। इन पालकियों में सैनिक थे, इन सैनिकों ने अलाउद्दीन खिलजी की सेना पर हमला किया और रावल रतन सिंह को छुड़ा लिया। गोरा ने इस युद्ध में वीरगति पाई। तब भी अलाउद्दीन खिलजी ने किले की घेराबंदी जारी रखी धीरे-धीरे रसद खत्म होने लगी तब रावल रतन सिंह व राजपूत योद्धाओं ने केसरिया बाना पहनकर युद्ध किया। रावल रतन सिंह ने इस युद्ध में वीरगति पाई और रानी पद्मिनी ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने की बजाय अलाउद्दीन खिलजी के किले में घुसने से पहले ही 16000 रानियों के साथ जिंदा आग में जलकर जौहर कर लिया।
संकलन : लता अग्रवाल, चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)।