
लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
www.daylifenews.in
दक्षिण में कर्नाटक के अलावा तेलंगाना एक मात्र राज्य है जहाँ कांग्रेस पार्टी की अपनी सरकार है। दिसम्बर 2023 में हुए विधान सभा चुनावों से पहले लग रहा था कि राज्य में तीसरी बार भी भारत राष्ट्र समिति की सरकार बनेगी। चुनावों से एक साल पहले तक राजनीतिक स्थिति बिलकुल कांग्रेस के पक्ष में नहीं थी। चुनावों से लगभग एक साल पहले कांग्रेस पार्टी की आला कमान ने पार्टी के राज्य नेतृत्व में परिवर्तन किया। अपेक्षाकृत एक नए और युवा चेहरे के रूप में रेवंत रेड्डी को राज्य पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया। इसको लेकर पार्टी में कई तरह की फुसफुसाहट हुई। पार्टी के कई पुराने और सीनियर नेताओं ने इस बदलाव पर उंगली उठाई। इसका कारण रेवंत रेड्डी की राजनीतिक पृष्ठभूमि थी। उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के नेता के रूप में शुरू की थी। यह छात्र सगंठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक माना जाता है। बाद में वे कुछ समय तक बीजेपी में भी रहे। लेकिन कुछ समय बाद वे तेलुगु देशम पार्टी में आ गए। जहाँ से जल्दी ही कांग्रेस में शामिल हो गए।
बताया जाता है कि रेवंत रेड्डी लोकसभा में विपक्ष के नेता तथा कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी की मर्जी से तेलंगाना प्रदेश पार्टी के अध्यक्ष बनाये गए थे। तेज तरार रेड्डी ने जल्दी ही इस पार्टी में अपनी पैठ बढानी शुरू कर दी। धीरे ध्रीरे वे सोनिया गांधी तथा प्रियंका गाँधी वाड्रा के नज़दीक हो गए। उस समय किसी को उम्मीद नहीं थी कि राज्य विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस पार्टी सरकार में आयेगी। चुनावों की कमान पूरी तरह से रेड्डी को सौंपी गई थी। उम्मीदवारों के चयन में भी उनकी बड़ी भूमिका थी। राज्य की राजनीति के जानकारों का कहना है कि उन्होंने ऐसा धुंआधार चुनाव प्रचार किया कि सारे चुनाव की दिशा ही बदल गई। चुनावी आंकलनों को जानकार रहे लोग बताते रहे कि भारत राष्ट्र समिति जीत रही है। लेकिन इसके विपरीत कांग्रेस पार्टी को राज्य में बहुमत मिला और पार्टी की सरकार बनी। लेकिन कांग्रेस पार्टी 2024 के लोकसभा चुनावों में अपने विधानसभा के प्रदर्शन को दोहरा नहीं पाई। पार्टी को राज्य की कुल17 सीटों में से आधी से भी कम यानि केवल 8 सीटें मिली। इसके बाद रेवंत रेड्डी ने पार्टी को फिर से मजबूत करने का बीड़ा उठाया इसी दौरान भारत राष्ट्र समिति से 10 विधायक अपनी पार्टी छोड़ कर कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। दल बदल कानून के अनुसार विधानसभा के अध्यक्ष को उनकी सदस्यता समाप्त कर देनी चाहिए थी लेकिन अध्यक्ष ने अब तक इसे दल बदल के रूप स्वीकार नहीं किया है। पार्टी में भारत राष्ट्र समिति के ये विधायक रेड्डी के नज़दीक माने जाते है। इनमें से हाल ही में तीन को कांग्रेस पार्टी के विधायक मंडल का सचेतक बनाया गया है। इसी प्रकार पार्टी के विधानसभा तथा विधान परिषद् दल के मुख्य सचेतक भी रेड्डी के नज़दीक समझे जाने वाले विधायक ही है पार्टी और सरकार में समन्वय बनाने के लिए बनाई समिति में रेड्डी के समर्थक नेताओं का दबदबा है. इनमें से कई सदस्यों को राज्य कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष महेश कुमार गौड की इच्छा के विरुद्ध शामिल किया गया था। रेड्डी के समर्थकों का कहना कि रेवंत रेड्डी ने ये नियुक्तियां पार्टी आला कमान, विशेषकर राहुल गाँधी तथा प्रियंका गाँधी वाड्रा की सहमति के बाद ही की थी। ऐसा, आना जाता है कि रेवंत रेड्डी पुराने नेताओं को पीछे कर ऐसे लोगों की नियुक्तियां कर रहे हैं जो अपेक्षाकृत युवा है। रेड्डी ऐसे युवा नेताओं को आगे बढ़ा कर पार्टी की एक नई पीढी का निर्माण कर रहे है। इसका एक अन्य पहलू यह है कि वे इस प्रकार अपने समर्थकों की फौज खड़ी कर रहे हैं। इसका लाभ पार्टी को कुछ महीने पहले हुए पंचायत राज संस्थानों तथा स्थानीय निकायों के चुनावों में हुआ। इसमें पार्टी ने सभी जगह भारी जीत दर्ज की। भारत राष्ट्र समिति, जो नंबर दो बनकर समाने आई। लेकिन इस पार्टी की जीत सीमित इलाकों में ही थी। इस जीत के बाद राज्य की तथा कांग्रेस की भीतरी राजनीति में रेवंत रेड्डी का दबदबा बढ़ गया। सरकार पर भी उनकी पकड़ पहले से कहीं मज़बूत हो गई। अब वे कई बड़े निर्णय वे अपने स्तर पर ही कर रहे है। पार्टी और सरकार में यह सन्देश है कि रेवंत रेड्डी ऐसे सभी बड़े फैसले गाँधी परिवार के निदेश या उनकी सहमति से ही कर रहे है। इसलिए पार्टी के संगठन के और सरकार में उनके निर्णयों पर कोई उंगली नहीं उठाई जाती। उनका विरोध करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। (लेखक के अपने विचार हैं)