रोजा इफ्तार

लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)।
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बात पुरानी है पर रमजान का महीना आते ही यह किस्सा याद आ जाता है। मैं उदयपुर से चित्तौड़गढ़ आ रही थी। उदयपुर से 4:00 बजे की बस में बैठी थी। रास्ते में एक स्टॉप मंगलवाड आता है। उस समय जबकि यह घटना है उस जगह पर खाने पीने की, चाय की होटल तक नहीं थी। चित्तौड़गढ़ आने में अभी एक घंटा बाकी था।
पास की सीट पर एक युवक बैठा हुआ था। मुझे नहीं पता था कि वो मुस्लिम है या हिंदू क्योंकि सफर के दौरान यह बातें कोई मायने नहीं रखती। अचानक से युवक बोला- मैडम आपके पास कुछ खाने को है क्या ? मेरा रोजा इफ्तार का समय हो गया है। उस समय में पारले-जी बिस्किट काफी लोकप्रिय थे। मैं रास्ते में अपने खाने के लिए कुछ न कुछ रखती थी। उस वक्त एक बिस्कुट का पैकेट मेरे बैग में था। बिस्कुट का पैकेट निकाल कर उस युवक को दे दिया। उसने उसी बस स्टाप पर केवल बिस्कुट से रोजा खोल लिया।
चित्तौड़गढ़ आने पर स्टॉप पर उतरकर वह युवक मुझे बिस्किट के पैसे देने लगा पर मैंने साफ मना कर दिया और मैंने उससे पैसे नहीं लिए। वह तो बहुत बाद में समझ में आया कि रोजा इफ्तार करवाने से कितना पुण्य मिलता है। आज भी वह घटना दिमाग में वैसी की वैसी अंकित है। ये पता लगने पर कि रोजा इफ्तार करवाने से पुण्य मिलता है उसके बाद से चित्तौड़गढ़ में मेरे घर के आस-पास बहुत मुस्लिम भाइयों का घर है। उसमें से कुछ अच्छे परिचित हैं। मैं कभी कभार अपने परिचित घरों में रोजा इफ्तार करने कि सामग्री रख कर आती हूं। इसे मुझे बहुत खुशी मिलती है। मेरी बेटियां जब छोटी थी तो यह सभी भाई परिवार के साथ घर पर बच्चों को ईदी देने आते थे। सभी धर्मो की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। हिंदू हो या मुसलमान उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इससे सांप्रदायिक सौहार्द बना रहता है। (लेखिका के अपने विचार हैं)

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