गणतंत्र दिवस : उत्सव से उत्तरदायित्व तक – संजय राणा

लेखक : संजय राणा
लेखक प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता एवं पर्यावरणविद हैं।
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आज देश अपना 77वाँ गणतंत्र दिवस मना रहा है। यह दिन केवल एक संवैधानिक तिथि नहीं, बल्कि देश की आत्मा, उसकी लोकतांत्रिक चेतना और नागरिक जिम्मेदारियों का प्रतीक है। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी देश के कोने-कोने में उल्लास और गर्व का वातावरण है। राजधानी दिल्ली के कर्तव्यपथ पर देश की सैन्य शक्ति, सांस्कृतिक विविधता और तकनीकी सामर्थ्य का प्रदर्शन हो रहा है। झांकियाँ भारत की समृद्ध परंपराओं और प्रगतिशील सोच को दर्शा रही हैं, वहीं प्रत्येक प्रदेशों की राजधानी में भारतीय संस्कृति का दर्शन हो रहा है।
देश के अन्य हिस्सों में युवा वर्ग मोटरसाइकिल रैलियों के माध्यम से अपने जोश और देशप्रेम को अभिव्यक्त कर रहा है। विद्यालयों में बच्चों द्वारा देशभक्ति गीत, नृत्य, नाट्य प्रस्तुतियाँ हो रही हैं। किसान ट्रैक्टर रैलियों के माध्यम से लोकतंत्र में अपनी भागीदारी और आवाज़ दर्ज करा रहे हैं। कुल मिलाकर हर वर्ग, हर आयु और हर क्षेत्र गणतंत्र के इस महापर्व में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। परंतु उत्सवों की इस चमक के बीच एक गंभीर प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है— क्या हमारी देशभक्ति केवल आयोजनों, नारों और परेड तक ही सीमित है?
गणतंत्र का शाब्दिक अर्थ है— लोगों का तंत्र। यानी यह देश केवल सरकार या संस्थाओं से नहीं, बल्कि हम नागरिकों के आचरण, सोच और जिम्मेदारियों से चलता है। जब सत्ता का मूल स्रोत जनता है, तो देश की स्थिति का उत्तरदायित्व भी जनता का ही होना चाहिए। ऐसे में यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि क्या हम अपनी भूमिका को केवल दर्शक की तरह निभा रहे हैं, या फिर सहभागी नागरिक की तरह?
यदि यह देश हमारा है, तो इसके गाँव-शहर, गलियाँ-सड़कें, नदियाँ – तालाब, खेत-खलिहान,जंगल-पर्वत, हवा-पानी और पूरी प्रकृति भी हमारी ही धरोहर है। फिर ऐसा क्यों है कि हमारी नदियाँ नालों में बदलती जा रही हैं, हवा ज़हर बन रही है, जंगल कट रहे हैं और जलस्रोत सूखते जा रहे हैं? क्या यह सब किसी और की जिम्मेदारी है, या फिर हमारी सामूहिक उदासीनता का परिणाम?
यदि यह समाज हमारा है, तो फिर बेटियाँ असुरक्षित क्यों हैं?
प्रदूषण से हर वर्ष लाखों लोग असमय मृत्यु के शिकार क्यों हो रहे हैं? नशे की गिरफ्त में फँसकर हमारी युवा पीढ़ी अपना भविष्य क्यों बर्बाद कर रही है? जिन माता-पिता ने हमें जीवन दिया, वे वृद्धाश्रमों में अपने ही बच्चों के प्रेम से वंचित क्यों हैं? सड़कों पर बेसहारा पशु कचरा खाने को मजबूर क्यों हैं?मिलावटखोरी और लालच के कारण आम आदमी का जीवन क्यों संकट में है? ये सभी प्रश्न केवल सामाजिक समस्याएँ नहीं हैं, बल्कि हमारी नागरिक चेतना और देशभक्ति की परीक्षा भी हैं। प्रकृति का संरक्षण न करना, महिलाओं और बुज़ुर्गों के प्रति असंवेदनशील होना, नशे को सामान्य मान लेना, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना—क्या यह सब गणतंत्र के मूल मूल्यों के विरुद्ध नहीं है?
सच्ची देशभक्ति वह नहीं है जो केवल साल में एक-दो दिन ही दिखाई दे। सच्ची देशभक्ति तो वह है जो हमारे रोज़मर्रा के जीवन में झलके— जब हम कचरा सड़क पर न फेंकें, पानी और बिजली की बचत करें, पेड़ लगाएँ और बचाएँ, बेटियों को सम्मान और समान अवसर दें, नशे से दूर रहें, बुज़ुर्गों का आदर करें, ईमानदारी से अपने कार्य करें और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील रहें।
गौरतलब है कि गणतंत्र हमें यह अधिकार देता है, लेकिन साथ ही कर्तव्य भी सौंपता है। जब तक अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों को नहीं अपनाया जाएगा, तब तक गणतंत्र केवल कागज़ों में ही जीवित रहेगा। इस गणतंत्र दिवस पर हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम केवल उत्सव मनाने वाले नागरिक नहीं, बल्कि जिम्मेदार और जागरूक गणतंत्र के प्रहरी बनेंगे।
क्योंकि जब हर नागरिक अपने हिस्से की देशभक्ति निभाएगा, तभी भारत वास्तव में स्वच्छ, सुरक्षित, समरस और सशक्त राष्ट्र बनेगा। यही गणतंत्र का वास्तविक उत्सव है और यही देशप्रेम का सच्चा अर्थ भी। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)

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