
लेखक : संजय राणा
लेखक ख्यात समाज विज्ञानी एवं पर्यावरणविद हैं।




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भारत आज स्वयं को वैश्विक मंच पर पर्यावरण-संवेदनशील राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करता है। नवीकरणीय ऊर्जा, कार्बन न्यूट्रैलिटी और सतत विकास राष्ट्रीय नीतियों के प्रमुख शब्द बन चुके हैं। किंतु इन दावों की वास्तविक परीक्षा देश के सुदूर अंचलों में हो रही है। राजस्थान के बीकानेर क्षेत्र में 560 दिनों से अधिक समय से नोखा दइया में और बीकानेर जिला कलेक्टर के कार्यालय के सामने 7 दिनों से अधिक समय से जारी शांतिपूर्ण महापड़ाव रूपी यह.जन-आंदोलन इसी परीक्षा का प्रत्यक्ष उदाहरण है। यह आंदोलन किसी एक परियोजना या स्थानीय असंतोष का परिणाम नहीं है। यह उस विकास मॉडल पर गंभीर प्रश्न है, जिसमें “हरित” शब्द जोड़ते ही पर्यावरणीय और सामाजिक सरोकारों को गौण मान लिया जाता है।
एक बलिदान, जो भारतीय चेतना का हिस्सा है
गौरतलब है कि सितंबर 1730 ईस्वी में राजस्थान के खेजड़ली गाँव में अमृता देवी विश्नोई और 363 ग्रामीणों ने खेजड़ी के वृक्षों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया था। यह घटना विश्व के पहले संगठित पर्यावरणीय प्रतिरोध के रूप में जानी जाती है। यह केवल एक अनूठी घटना नहीं, एक इतिहास ही नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की वह चेतना है, जिसमें प्रकृति को संसाधन नहीं, जीवन का आधार माना गया। आज तीन सौ वर्ष बाद वही धरती एक बार फिर कटाई, अधिग्रहण और स्वीकृतियों के दबाव में है। अंतर सिर्फ इतना है कि तब कुल्हाड़ी प्रत्यक्ष थी, आज वह फाइलों और परियोजना रूपी दस्तावेज़ों के माध्यम से चल रही है।
बीकानेर अंचल : नीति और यथार्थ का टकराव
देखा जाये तो बीकानेर तथा उसके आसपास के क्षेत्र—नोखा, दईया, लूणकरणसर, डूंगरगढ़, श्रीडूंगरगढ़, कोलायत, खेजड़ला रोही, आहू, टेनानाडी, बज्जू और खाजूवाला—हाल के वर्षों में बड़े सोलर पार्कों, ऊर्जा कॉरिडोर और ट्रांसमिशन लाइनों के केंद्र बन गए हैं। इन परियोजनाओं को राष्ट्रीय ऊर्जा लक्ष्यों के लिए आवश्यक बताया जा रहा है। लेकिन स्थानीय समुदायों का अनुभव कुछ और कहता है। उनका कहना है कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है, ग्राम सभाओं की सहमति औपचारिक बन गई है और हजारों खेजड़ी के वृक्ष आज तक विकास की समिधा बन चुके हैं और खेजड़ी सहित अन्य देशज वृक्षों पर संकट बरकरार है। यही कारण है कि यह विरोध 560 दिनों से थमा नहीं है अनवरत जारी है।
खेजड़ी : रेगिस्तान की जीवनरेखा
असलियत में शुष्क और अर्ध-शुष्क भारत में खेजड़ी केवल एक वृक्ष नहीं है। यह मिट्टी को बाँधती है, भूजल संरक्षण में सहायक होती है, पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है तथा अत्यधिक तापमान के विरुद्ध प्राकृतिक संतुलन बनाए रखती है। यह इसकी विशेषता है। वैज्ञानिक अध्ययन भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि खेजड़ी जैसे देशज वृक्षों की भरपाई कृत्रिम वृक्षारोपण से संभव नहीं होती।
इस संदर्भ में खेजड़ी की कटाई को विकास की अनिवार्य कीमत बताना पारिस्थितिकी की बुनियादी समझ से टकराना है।
दरअसल इस विरोध का आशय क्या है? बीकानेर में उठ रही आवाज़ें विकास के विरोध में नहीं हैं। वे उस सोच को चुनौती दे रही हैं जिसमें यह मान लिया गया है कि राष्ट्रीय हित और स्थानीय हित अलग-अलग दिशाओं में चलते हैं। यह आंदोलन पूछ रहा है कि यदि नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएँ भी स्थानीय पर्यावरण और जीवन-तंत्र को नष्ट करती हैं, तो क्या उन्हें बिना पुनर्विचार स्वीकार कर लिया जाना चाहिए? 560 दिनों का नोखा दइया में शांतिपूर्ण प्रतिरोध और जिला कलेक्टर कार्यालय के समक्ष बीते दिनों से जारी महापड़ाव इस बात का संकेत है कि नीति-निर्माण और ज़मीनी वास्तविकताओं के बीच संवाद की
कमी बढ़ती जा रही है। दुख इस बात का है कि इस खाई को पाटने के सवाल पर सरकार और नीति नियंताओं का मौन समझ से परे है।
नीति-निर्माताओं के लिए स्पष्ट संदेश
भारत को ऊर्जा संक्रमण की आवश्यकता है, इसमें कोई विवाद नहीं। लेकिन यह संक्रमण तभी टिकाऊ होगा जब परियोजनाओं का स्थान-विशिष्ट पर्यावरणीय मूल्यांकन के आधार पर निर्धारण किया जाए। देशज वृक्षों और पारिस्थितिकी को वास्तविक कानूनी संरक्षण मिले और स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाए। अन्यथा ‘हरित विकास’ केवल शब्दों का आवरण बनकर रह जाएगा, जिसकी कीमत पर्यावरण और समाज दोनों को चुकानी पड़ेगी।
मां अमृता देवी की विरासत यह सिखाती है कि विकास और प्रकृति को आमने-सामने खड़ा करना भारतीय परंपरा नहीं है। बीकानेर में जारी आंदोलन उसी विरासत की आधुनिक अभिव्यक्ति है। यह केवल राजस्थान का प्रश्न नहीं, बल्कि पूरे देश के विकास पथ से जुड़ा नैतिक प्रश्न है।
*अब सवाल यह नहीं है कि हमें ऊर्जा चाहिए या नहीं? सवाल यह है कि क्या हम अपनी साँसों की कीमत पर विकास स्वीकार करेंगे? इस प्रश्न का उत्तर आज बीकानेर में नहीं, पूरे देश में लिखा जा रहा है।अब विकास की परिभाषा पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है, विकास वह होना चाहिए: जहां मानव, प्रकृति और जीव जंतु सभी विकास करें। आओ प्रकृति की ओर लौटें। (लेखक के अपने विचार है)