
लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
www.daylifenews.in
केरल में राज्य विधानसभा चुनाव अगले साल के शुरुआती महीनों में होने है.पर इससे पहले राज्य में स्थानीय निकायों तथा पंचायतों के चुनाव हो रहे है। इन्हें राजनीतिक नजरिये से विधानसभा चुनावों से पहले सेमी फाइनल के रूप देखा जा रहा है। इन स्थानीय निकायों और पंचायत राज संस्थायों के चुनावों की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। चुनाव दो चरणों, दिसम्बर 9 और 11 दिसम्बर, को होने है नतीजे 13 दिसम्बर को घोषित कर दिए जायेंगे। इन चुनावों के नतीजे इस बात की ओर संकेत देंगे कि विधानसभा चुनाव किस दिशा में रुख करेंगे।
राज्य की राजनीति पिछले कुछ दशकों से दो धुरों पर चल रही है। एक ओर कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व वाला वाम लोकतान्त्रिक मोर्चा है तथा दूसरी और कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतान्त्रिक मोर्चा। राज्य में 2020 में हुए विधानसभा चुनावों से पहले का इतिहास यह रहा है कि दोनों मोर्चे हर पांच साल बाद बारी बारी से सत्ता में आते रहे है। लेकिन 2021 के विधानसभा चुनावों में बड़ा बदलाव आया। इससे पहले 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने कुल 20 सीटों में से 19 सीटें जीतीं था तथा वाम मोर्चा को केवल एक सीट जीत कर संतोष करना पड़ा। तब वाम मोर्चे ने अपने स्थिति मज़बूत करने का निश्चय किया। फल यह हुआ कि नवम्बर 2020 के स्थानीय निकायों तथा पंचायत राज संस्थायों के चुनावों में वाम मोर्चा ने बाज़ी पलट दी। राज्य की की कुल 14 में से 10 निगमों पर कब्ज़ा कर लिया। हालांकि वाम मोर्चा कुल 85 नगरपालिकाओं में आधी से कुछ कम, 37, ही जीत पाया लेकिन कुल 941 पंचायतों में से 518 पर कब्ज़ा करने में सफल रहा। इन नतीजों यह संकेत दे दिया था कि 2021 के मध्य में होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस के लिए सत्ता में आना कठिन होगा और वही हुआ 2019 के लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद अतिउत्साहित कांग्रेस को लगा था कि अगले विधानसभा चुनावों के बाद उसका सत्ता में आना निश्चित है .पर ऐसा नहीं हुआ। पिछले राजनीतिक क्रम तोड़ते हुए वाम मोर्चा राज्य में पहली बार लगातार दूसरी बार सत्ता मेंआया। केवल इतना ही नहीं, वाम मोर्चे को 2016 के विधानसभा चुनावों की तुलना सेकहीं अधिक सीटें आईं।
2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने पहली बार एक सीट जीत कर राज्य की राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज की। केवल इतना ही राज्य के राजधानी श्री अनंतपुरम सीट केवल 16,000 मतों से हारी। केंद्र में मंत्री रहे राजीव चंद्रशेखर ने कांग्रेस के उम्मीदवार शशि थरूर को कड़ा मुकाबला देने सफल रहे। चंद्रशेखर इस समय व राज्य पार्टी के अध्यक्ष है। राज्य की राजधानी की नगर निगम में बीजेपी मुख्य विपक्षी दल है। लोकसभा चुनावों में बीजेपी यहाँ के चार विधानसभा चुनाव क्षेत्रों में आगे रही थी। अब उसका लक्ष्य राजधानी की निगम पर कब्ज़ा जमाना है। पिछले निकायों तथा पंचायत राज संस्थायों के चुनावों में बीजेपी दो नगरलिपाकयों पर जीतने में सफल रही थी। इसी प्रकार कुल 22 पंचायतों में इस पार्टी ने जीत दर्ज की थी . ऐसा माना जा रहा है कि बीजेपी इस बार बीजेपी का प्रदर्शन बेहतर रहेगा . लेकिन मुख्य मुकाबला दोनों बड़े मोर्चों में ही रहेगा।
वाम मोर्चे के नेता सरकार चलाने के साथ साथ संगठन को मजबूत बनाने पर पर भी ध्यान देते है। यही एक बड़ा कारण था कि वाम मोर्चा 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद लगातार दूसरी बार सत्ता में आने में सफल रही। उधर कांग्रेस में अभी भी पार्टी में गुट बंदी रुकने का नाम नहीं ले रही। कुछ महीने पहले ही पार्टी आला कमान ने यह नेतृत्व में बदलाव कर सन्नी जोसफ को अध्यक्ष बनाया है। जोसफ राज्य में पार्टी की कतार में बड़े नेता नहीं है। हाँ, वे पार्टी की गुट बंदी दूर है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री तथा राज्य पार्टी अध्यक्ष और दबंग नेता दिवंगत ओमान चंडी की तुलना में वे बहुत कमज़ोर माने जाते है।
राज्य में कांग्रेस का संगठन लगभग बिखरा सा हुआ है। कार्यकर्ता या तो निराश है या फिर सक्रिय नहीं है। जिलों में अध्यक्ष तथा अन्य पदाधिकारी नामज़द है। हालाँकि विधानसभा में कांग्रेस एकल बड़ा विपक्षी दल है तथा लेकिन सरकार पर इसकी आलोचना तथा हमला करने की नजर से कमज़ोर है। राज्य की राजनीति को समझने वालों का कहना है कि कांग्रेस पार्टी के नेता आम जन से कटे से हुए है। ऐसे हालात में यह कहना बहुत कठिन है कि कांगेस पार्टी के नेतृत्व वला संयुक्त लोकतान्त्रिक मोर्चा वाम मोर्चे को कड़ी टक्कर दे पायेगा कि नहीं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)